2026 Weather Forecast: इस साल अल नीनो से सूखे और जल का संकट, जानिए कब-कब आता है अल नीनो और ला नीना

Gaon Connection | Apr 07, 2026, 15:56 IST
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स्काईमेट मौसम सेवा ने 2026 के मॉनसून को लेकर गंभीर अलर्ट जारी किया है। अल नीनो के प्रभाव से मॉनसून की बारिश में कमी आने की संभावना है। यह स्थिति देश के कई हिस्सों में सूखा और जल संकट ला सकती है। विशेषकर, मध्य और उत्तर-पश्चिम भारत में किसानों को इसकी तीव्र चिंता सताने की आशंका है।
भारत में मॉनसून कमजोर
भारत में मॉनसून कमजोर
देश में 2026 के मॉनसून को लेकर चिंताजनक संकेत सामने आए हैं। निजी मौसम एजेंसी स्काईमेट वेदर के ताजा पूर्वानुमान के मुताबिक इस साल बारिश सामान्य से कम रह सकती है, जिसकी बड़ी वजह अल नीनो का मजबूत होना बताया जा रहा है। अगर यह अनुमान सही साबित होता है, तो इसका सीधा असर खेती, जल संसाधनों और बिजली उत्पादन पर पड़ सकता है। ऐसे में किसानों से लेकर सरकार तक सभी के लिए समय रहते तैयारी करना बेहद जरूरी हो गया है, ताकि संभावित नुकसान को कम किया जा सके।

मौसम एजेंसी स्काईमेट वेदर ने 2026 के मॉनसून को लेकर चिंता जताई है। उनका अनुमान है कि अल नीनो के मजबूत होने के कारण यह मॉनसून सामान्य से कम रहेगा, जिससे देश के कई हिस्सों में बारिश की कमी हो सकती है। यह अनुमान कृषि, जल संसाधनों और बिजली उत्पादन के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

2026 में सामान्य से कम मॉनसून का अनुमान

मौसम पूर्वानुमान एजेंसी स्काईमेट वेदर ने 2026 के मॉनसून के लिए अपना पूर्वानुमान जारी कर दिया है। एजेंसी का मानना है कि यह मॉनसून सामान्य से कम रहेगा। स्काईमेट के अनुसार, 2026 में मॉनसून की वर्षा लॉन्ग टर्म एवरेज (LPA) का 94% रहने की उम्मीद है, जो कि 868.6mm है। इसमें +/-5% की त्रुटि की गुंजाइश है। बारिश का वितरण भी सामान्य से कम रहेगा, जो LPA का 90-95% तक हो सकता है। स्काईमेट ने जनवरी 2026 में भी ऐसा ही अनुमान लगाया था और अब भी वे अपने इस अनुमान पर कायम हैं।

अल नीनो का प्रभाव और बारिश की कमी का खतरा

स्काईमेट के अनुसार, ला नीना की स्थितियों के डेढ़ साल बाद, प्रशांत महासागर अब ENSO (El Niño Southern Oscillation)-न्यूट्रल के लिए अनुकूल हो गया है। हालांकि, "दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के शुरुआती दौर में अल नीनो की उम्मीद है और यह साल के पतझड़ तक और मजबूत होता रहेगा। अल नीनो की वापसी कमजोर मॉनसून का संकेत हो सकती है। सीजन का दूसरा आधा हिस्सा ज्यादा खराब रहने की आशंका है।" अल नीनो एक ऐसा जलवायु पैटर्न है जो प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह के तापमान में वृद्धि से जुड़ा है। जब अल नीनो मजबूत होता है, तो यह अक्सर भारत में मॉनसून को कमजोर करता है, जिससे सामान्य से कम बारिश होती है। स्काईमेट का अनुमान है कि 2026 में अल नीनो के और मजबूत होने की उम्मीद है, जो मॉनसून पर नकारात्मक प्रभाव डालेगा।

अल नीनो और ला नीना में क्या अंतर?

अल नीनो और ला नीना दोनों ही प्रशांत महासागर से जुड़े जलवायु पैटर्न हैं, जो पूरी दुनिया के मौसम, खासकर भारत के मॉनसून को प्रभावित करते हैं। ये ENSO (El Niño Southern Oscillation) चक्र के दो अलग-अलग चरण हैं।

अल नीनो क्या है?

अल नीनो वह स्थिति है जब प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्र का तापमान सामान्य से ज्यादा बढ़ जाता है।

  1. भारत में मॉनसून कमजोर पड़ता है
  2. बारिश कम होती है
  3. सूखे जैसी स्थिति बन सकती है

ला नीना क्या है?

आधारअल नीनोला नीना
समुद्र का तापमानज्यादा गर्मज्यादा ठंडा
भारत में बारिशकमज्यादा
खेती पर असरनुकसान / सूखाफायदा / अधिक उत्पादन
मौसम प्रभावगर्म और सूखाठंडा और ज्यादा बारिश

मध्य और उत्तर-पश्चिम भारत पर विशेष असर

स्काईमेट ने विशेष रूप से बताया है कि मध्य और उत्तर-पश्चिम भारत में बारिश की कमी का सामना करना पड़ सकता है। जून में स्थिति सामान्य रह सकती है, लेकिन जुलाई से सितंबर तक बारिश कम होने की संभावना है। यह उन क्षेत्रों के लिए चिंता का विषय है जो कृषि पर बहुत अधिक निर्भर हैं। कम बारिश से फसल उत्पादन प्रभावित हो सकता है, जिससे खाद्य सुरक्षा और किसानों की आजीविका पर असर पड़ सकता है।

इंडियन ओशन डाइपोल (IOD) का संभावित प्रभाव

इंडियन ओशन डाइपोल (IOD) भी मॉनसून के सर्कलेशन को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। IOD के दो चरण होते हैं: पॉजिटिव और नेगेटिव। एक मजबूत पॉजिटिव IOD मॉनसून के लिए अनुकूल हो सकता है, क्योंकि यह अल नीनो के नकारात्मक प्रभावों को कुछ हद तक कम कर सकता है। हालांकि, स्काईमेट का अनुमान है कि इस सीजन के दौरान IOD न्यूट्रल या हल्के पॉजिटिव रहने की उम्मीद है। इसका मतलब है कि जबकि मॉनसून की शुरुआत अच्छी हो सकती है, सीजन के दूसरे हिस्से में अल नीनो का प्रभाव अधिक प्रबल हो सकता है, जिससे बारिश में कमी आ सकती है।

संभावित परिणाम और बचाव के उपाय

अगर ऐसी स्थिति बनती है तो ग्राउंडवाटर और जलाशयों में कम पानी रिचार्ज होने का खतरा बढ़ेगा। इससे सिंचाई के साथ-साथ बिजली की समस्या भी पैदा हो सकती है, खासकर उन क्षेत्रों में जो जलविद्युत पर निर्भर हैं। स्काईमेट के अनुसार, ज्यादा बारिश (LPA के 110% से अधिक) होने की संभावना 0% है। सामान्य से अधिक (LPA के 105 से 110% के बीच) होने की संभावना 10% है। सामान्य (LPA के 96 से 104% के बीच) होने की संभावना 20% है। सामान्य से कम (LPA के 90 से 95% के बीच) होने की संभावना 40% है और सूखा (LPA के 90% से कम) पड़ने की संभावना 30% है।

कृषि आधारित क्षेत्रों को अधिक चिंता

यह पूर्वानुमान उन क्षेत्रों के लिए चिंता का विषय है जो कृषि पर बहुत अधिक निर्भर हैं। कम बारिश से फसल उत्पादन प्रभावित हो सकता है, जिससे खाद्य सुरक्षा और किसानों की आजीविका पर असर पड़ सकता है। इसके अतिरिक्त, जलाशयों में पानी का स्तर कम होने से पेयजल की आपूर्ति और बिजली उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है।

यह महत्वपूर्ण है कि किसान और सरकारें इन पूर्वानुमानों पर ध्यान दें और संभावित सूखे की स्थिति से निपटने के लिए योजनाएं बनाएं। जल संरक्षण के उपाय, वैकल्पिक सिंचाई तकनीकों का उपयोग और फसल विविधीकरण जैसी रणनीतियाँ कम बारिश के प्रभाव को कम करने में मदद कर सकती हैं। मौसम की अनिश्चितता को देखते हुए, विभिन्न पूर्वानुमान एजेंसियों के अनुमानों पर नजर रखना और नवीनतम जानकारी के आधार पर अपनी योजनाओं को अनुकूलित करना महत्वपूर्ण होगा।
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