गर्मी, बारिश और अनिश्चितता: 2026 के मौसम को लेकर क्या कहती है विश्व मौसम विज्ञान संगठन की रिपोर्ट
Divendra Singh | Jan 08, 2026, 15:27 IST
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विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की ताज़ा मौसमी रिपोर्ट बताती है कि 2026 की शुरुआत में वैश्विक तापमान, वर्षा और चरम मौसम की घटनाएँ असंतुलित बनी रह सकती हैं। इसका अर्थ है, बढ़ती गर्मी, अनियमित बारिश, खेती पर बढ़ता दबाव और आपदा-तैयारी की नई ज़रूरतें।
<p>वैश्विक मौसमी जलवायु अपडेट (जनवरी–फरवरी–मार्च 2026):<br></p>
जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की चेतावनी नहीं, वर्तमान का अनुभव बन चुका है। मौसम की मार अब सिर्फ आँकड़ों और ग्राफ़ों में नहीं दिखती, बल्कि खेतों में सूखती मिट्टी, शहरों में तपती छतें, अचानक उमड़ती बाढ़ और बढ़ती बीमारियों के रूप में सामने आती है।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की Global Seasonal Climate Update रिपोर्ट 2026 के शुरुआती तीन महीनों के लिए दुनिया के मौसम की एक व्यापक तस्वीर पेश करती है। यह रिपोर्ट केवल तापमान या बारिश का सामान्य अनुमान नहीं देती, बल्कि महासागरों की स्थिति, समुद्री सतह के तापमान, और बड़े पैमाने पर काम करने वाली जलवायु प्रणालियों, जैसे ENSO (ला नीना/एल नीनो) के आधार पर यह समझाने की कोशिश करती है कि आने वाले महीनों में मौसम किस दिशा में जा सकता है। भारत जैसे देश के लिए, जहाँ खेती, पानी, स्वास्थ्य और आपदा प्रबंधन सीधे मौसम पर निर्भर हैं, यह जानकारी बेहद अहम हो जाती है।
WMO के अनुसार, जनवरी से मार्च 2026 के बीच वैश्विक स्तर पर तापमान सामान्य से अधिक रहने की संभावना है। खासतौर पर उत्तरी गोलार्ध में औसत से ज़्यादा गर्म परिस्थितियाँ देखने को मिल सकती हैं। इसका अर्थ यह है कि सर्दियों के महीनों में भी कई क्षेत्रों में असामान्य गर्मी महसूस की जा सकती है। भारत के संदर्भ में यह संकेत महत्वपूर्ण है, क्योंकि हाल के वर्षों में सर्दियों का छोटा होना और जल्दी गर्मी शुरू होना एक लगातार दिखने वाला रुझान बन चुका है।
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समुद्र और ज़मीन दोनों के गर्म रहने से मौसम की गतिविधियाँ तेज़ हो सकती हैं। इसका असर हीटवेव के जल्दी आने, रात के तापमान के ऊँचा रहने और ऊर्जा की माँग बढ़ने के रूप में दिख सकता है। शहरी इलाकों में यह गर्मी स्वास्थ्य जोखिम बढ़ा सकती है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह रबी फसलों और पशुपालन पर दबाव डाल सकती है।
रिपोर्ट बताती है कि महासागरीय परिस्थितियाँ अभी भी असंतुलित बनी हुई हैं। मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर में वर्षा सामान्य से कम रहने की आशंका जताई गई है, जबकि पश्चिमी प्रशांत और उससे जुड़े क्षेत्रों में अपेक्षाकृत अधिक वर्षा हो सकती है। ये संकेत उस ला नीना-प्रभावित पैटर्न से जुड़े हैं, जो अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।
भारत के लिए इसका अप्रत्यक्ष अर्थ यह है कि वैश्विक स्तर पर समुद्रों में जमा हो रही ऊष्मा मौसम प्रणालियों को अस्थिर बनाए रख सकती है। समुद्र की सतह का तापमान कई क्षेत्रों में सामान्य से अधिक रहने की संभावना है, जिससे वातावरण में अतिरिक्त ऊर्जा बनी रहती है। यही अतिरिक्त ऊर्जा आगे चलकर अचानक तेज़ बारिश, असामान्य तूफ़ान या मौसम की चरम घटनाओं को जन्म दे सकती है। यह मानसून से पहले के महीनों में भी स्थानीय स्तर पर भारी बारिश या सूखे जैसे हालात बना सकती है।
ENSO यानी एल नीनो-ला नीना प्रणाली वैश्विक मौसम का एक अहम चालक है। WMO के अनुसार, 2025-26 के दौरान ला नीना की स्थितियाँ धीरे-धीरे कमजोर हो रही हैं और जनवरी-मार्च 2026 के लिए ENSO-न्यूट्रल की ओर संक्रमण की संभावना ज़्यादा है। इसका मतलब यह है कि अत्यधिक ठंडे या अत्यधिक गर्म समुद्री पैटर्न से जुड़ा सीधा प्रभाव कम हो सकता है।
हालाँकि, यह “न्यूट्रल” स्थिति भी पूरी तरह स्थिर मौसम की गारंटी नहीं देती। जलवायु परिवर्तन के दौर में न्यूट्रल ENSO के दौरान भी चरम घटनाएँ देखी जा रही हैं। भारत में इसका मतलब यह हो सकता है कि मौसम अपेक्षाकृत संतुलित दिखे, लेकिन स्थानीय स्तर पर अनिश्चितता बनी रहे, कहीं अचानक बारिश, कहीं लंबे सूखे अंतराल, तो कहीं तापमान का तेज़ उतार-चढ़ाव।
भारत में मौसम केवल प्राकृतिक घटना नहीं, बल्कि आजीविका का आधार है। रबी फसलों की अंतिम अवस्था, जलाशयों का स्तर, गर्मी से पहले पानी की उपलब्धता और स्वास्थ्य प्रणालियों की तैयारी, ये सभी इस समय के मौसम से जुड़े होते हैं। यदि तापमान सामान्य से अधिक रहता है, तो गेहूं जैसी फसलों में हीट-स्ट्रेस का खतरा बढ़ सकता है। वहीं, अनियमित वर्षा जल प्रबंधन को चुनौतीपूर्ण बना सकती है।
हालांकि WMO के अनुसार जहाँ कोई स्पष्ट या लगातार संकेत नहीं दिखाई देता, उनमें उत्तर-पश्चिमी उत्तरी अमेरिका, भारतीय उपमहाद्वीप के दक्षिण-पूर्वी हिस्से और दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ क्षेत्र शामिल हैं।
भारत मौसम विज्ञान विभाग पुणे स्थित क्लाइमेट रिसर्च व सर्विसेज के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ ओपी श्रीजीत इस बारे में कहते हैं, "अभी भारत के बारे में कुछ कह पाना संभव नहीं है, पिछले कुछ सालों में मौसम में बदलाव देखा जा रहा है, जिससे हीटवेव और बेमौसम बारिश जैसी घटनाएँ भी बढ़ रहीं है।"
आपदा प्रबंधन के लिहाज़ से भी यह संकेत महत्वपूर्ण हैं। गर्मी का जल्दी और तीव्र होना हीट-एक्शन प्लान, अस्पतालों की तैयारी और बिजली आपूर्ति की योजना को पहले से सक्रिय करने की माँग करता है। इसी तरह, समुद्रों में बढ़ी हुई ऊष्मा भविष्य में चक्रवातों की तीव्रता पर असर डाल सकती है, जिसका असर तटीय राज्यों को झेलना पड़ सकता है।
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भारत मौसम विज्ञान विभाग पुणे स्थित क्लाइमेट रिसर्च व सर्विसेज के कृषि मौसम विज्ञानी डॉ एन चट्टोपध्याय गाँव कनेक्शन से बताते हैं, "अभी भारत के लिए कुछ नहीं कह सकते हैं, क्योंकि इसमें पूरी दुनिया की बात की गई है, लेकिन अगर जनवरी से मार्च तक तापमान बढ़ता है तो इसका असर रबी फ़सलों पर भी पड़ेगा, क्यों इन महीनों में जितनी ज़्यादा ठंड होगी, उतनी अच्छी पैदावार होगी, लेकिन जिस तरह से क्लाइमेट चेंज की वजह से तापमान बढ़ रहा है, इससे पैदावार पर भी असर पड़ सकता है।"
WMO का यह मौसमी अपडेट साफ़ संकेत देता है कि 2026 की शुरुआत में मौसम पूरी तरह “सामान्य” नहीं रहने वाला। भले ही ENSO न्यूट्रल की ओर बढ़ रहा हो, लेकिन बढ़ता वैश्विक तापमान और गर्म महासागर मौसम को अस्थिर बनाए रख सकते हैं। भारत के लिए यह समय सतर्क रहने, स्थानीय स्तर पर मौसम संकेतों को समझने और कृषि, जल व आपदा-तैयारी की योजनाओं को मज़बूत करने का है।
बदलते मौसम के इस दौर में वैश्विक संकेतों को स्थानीय ज़रूरतों से जोड़कर देखना ही सबसे व्यावहारिक रास्ता है, ताकि जोखिम को कम किया जा सके और आने वाली चुनौतियों के लिए समय रहते तैयारी की जा सके।
ला नीना एक महत्वपूर्ण जलवायु घटना है, जो प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्सों में समुद्र की सतह के तापमान के सामान्य से अधिक ठंडा हो जाने के कारण होती है। इसे एल नीनो की विपरीत अवस्था माना जाता है। ला नीना के दौरान ट्रेड विंड्स यानी समुद्री हवाएँ तेज़ हो जाती हैं, जिससे ठंडा पानी समुद्र की सतह पर ऊपर आ जाता है और वैश्विक मौसम प्रणालियाँ प्रभावित होती हैं।
भारत में इसका असर अक्सर अच्छे या सामान्य से अधिक मानसून के रूप में देखने को मिलता है, जिससे खेती को लाभ हो सकता है, हालांकि कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा और बाढ़ का खतरा भी बढ़ जाता है। इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण-पूर्व एशिया में ज़्यादा बारिश होती है, जबकि अमेरिका के कुछ हिस्सों में ठंड और सूखे जैसी स्थितियाँ बन सकती हैं।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की Global Seasonal Climate Update रिपोर्ट 2026 के शुरुआती तीन महीनों के लिए दुनिया के मौसम की एक व्यापक तस्वीर पेश करती है। यह रिपोर्ट केवल तापमान या बारिश का सामान्य अनुमान नहीं देती, बल्कि महासागरों की स्थिति, समुद्री सतह के तापमान, और बड़े पैमाने पर काम करने वाली जलवायु प्रणालियों, जैसे ENSO (ला नीना/एल नीनो) के आधार पर यह समझाने की कोशिश करती है कि आने वाले महीनों में मौसम किस दिशा में जा सकता है। भारत जैसे देश के लिए, जहाँ खेती, पानी, स्वास्थ्य और आपदा प्रबंधन सीधे मौसम पर निर्भर हैं, यह जानकारी बेहद अहम हो जाती है।
तापमान: गर्मी का दबाव बना रह सकता है
ये भी पढ़ें: क्यों ज़्यादातर भारतीय मानते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग से मौसम बदल रहा है?
समुद्र और ज़मीन दोनों के गर्म रहने से मौसम की गतिविधियाँ तेज़ हो सकती हैं। इसका असर हीटवेव के जल्दी आने, रात के तापमान के ऊँचा रहने और ऊर्जा की माँग बढ़ने के रूप में दिख सकता है। शहरी इलाकों में यह गर्मी स्वास्थ्य जोखिम बढ़ा सकती है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह रबी फसलों और पशुपालन पर दबाव डाल सकती है।
महासागर और बारिश का बदलता पैटर्न
Image credit : Gaon Connection Network, Gaon Connection
भारत के लिए इसका अप्रत्यक्ष अर्थ यह है कि वैश्विक स्तर पर समुद्रों में जमा हो रही ऊष्मा मौसम प्रणालियों को अस्थिर बनाए रख सकती है। समुद्र की सतह का तापमान कई क्षेत्रों में सामान्य से अधिक रहने की संभावना है, जिससे वातावरण में अतिरिक्त ऊर्जा बनी रहती है। यही अतिरिक्त ऊर्जा आगे चलकर अचानक तेज़ बारिश, असामान्य तूफ़ान या मौसम की चरम घटनाओं को जन्म दे सकती है। यह मानसून से पहले के महीनों में भी स्थानीय स्तर पर भारी बारिश या सूखे जैसे हालात बना सकती है।
ENSO का रुख: न्यूट्रल की ओर, लेकिन पूरी तरह सामान्य नहीं
हालाँकि, यह “न्यूट्रल” स्थिति भी पूरी तरह स्थिर मौसम की गारंटी नहीं देती। जलवायु परिवर्तन के दौर में न्यूट्रल ENSO के दौरान भी चरम घटनाएँ देखी जा रही हैं। भारत में इसका मतलब यह हो सकता है कि मौसम अपेक्षाकृत संतुलित दिखे, लेकिन स्थानीय स्तर पर अनिश्चितता बनी रहे, कहीं अचानक बारिश, कहीं लंबे सूखे अंतराल, तो कहीं तापमान का तेज़ उतार-चढ़ाव।
भारत के लिए क्यों अहम है यह वैश्विक अपडेट?
हालांकि WMO के अनुसार जहाँ कोई स्पष्ट या लगातार संकेत नहीं दिखाई देता, उनमें उत्तर-पश्चिमी उत्तरी अमेरिका, भारतीय उपमहाद्वीप के दक्षिण-पूर्वी हिस्से और दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ क्षेत्र शामिल हैं।
भारत मौसम विज्ञान विभाग पुणे स्थित क्लाइमेट रिसर्च व सर्विसेज के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ ओपी श्रीजीत इस बारे में कहते हैं, "अभी भारत के बारे में कुछ कह पाना संभव नहीं है, पिछले कुछ सालों में मौसम में बदलाव देखा जा रहा है, जिससे हीटवेव और बेमौसम बारिश जैसी घटनाएँ भी बढ़ रहीं है।"
आपदा प्रबंधन के लिहाज़ से भी यह संकेत महत्वपूर्ण हैं। गर्मी का जल्दी और तीव्र होना हीट-एक्शन प्लान, अस्पतालों की तैयारी और बिजली आपूर्ति की योजना को पहले से सक्रिय करने की माँग करता है। इसी तरह, समुद्रों में बढ़ी हुई ऊष्मा भविष्य में चक्रवातों की तीव्रता पर असर डाल सकती है, जिसका असर तटीय राज्यों को झेलना पड़ सकता है।
ये भी पढ़ें: गर्म होती धरती, फैलते कीट: भारत में फ़सलों पर बदलते रोग-कीटों के बढ़ने की चेतावनी
भारत मौसम विज्ञान विभाग पुणे स्थित क्लाइमेट रिसर्च व सर्विसेज के कृषि मौसम विज्ञानी डॉ एन चट्टोपध्याय गाँव कनेक्शन से बताते हैं, "अभी भारत के लिए कुछ नहीं कह सकते हैं, क्योंकि इसमें पूरी दुनिया की बात की गई है, लेकिन अगर जनवरी से मार्च तक तापमान बढ़ता है तो इसका असर रबी फ़सलों पर भी पड़ेगा, क्यों इन महीनों में जितनी ज़्यादा ठंड होगी, उतनी अच्छी पैदावार होगी, लेकिन जिस तरह से क्लाइमेट चेंज की वजह से तापमान बढ़ रहा है, इससे पैदावार पर भी असर पड़ सकता है।"
WMO का यह मौसमी अपडेट साफ़ संकेत देता है कि 2026 की शुरुआत में मौसम पूरी तरह “सामान्य” नहीं रहने वाला। भले ही ENSO न्यूट्रल की ओर बढ़ रहा हो, लेकिन बढ़ता वैश्विक तापमान और गर्म महासागर मौसम को अस्थिर बनाए रख सकते हैं। भारत के लिए यह समय सतर्क रहने, स्थानीय स्तर पर मौसम संकेतों को समझने और कृषि, जल व आपदा-तैयारी की योजनाओं को मज़बूत करने का है।
बदलते मौसम के इस दौर में वैश्विक संकेतों को स्थानीय ज़रूरतों से जोड़कर देखना ही सबसे व्यावहारिक रास्ता है, ताकि जोखिम को कम किया जा सके और आने वाली चुनौतियों के लिए समय रहते तैयारी की जा सके।
क्या है ला नीना
भारत में इसका असर अक्सर अच्छे या सामान्य से अधिक मानसून के रूप में देखने को मिलता है, जिससे खेती को लाभ हो सकता है, हालांकि कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा और बाढ़ का खतरा भी बढ़ जाता है। इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण-पूर्व एशिया में ज़्यादा बारिश होती है, जबकि अमेरिका के कुछ हिस्सों में ठंड और सूखे जैसी स्थितियाँ बन सकती हैं।