क्यों ज़्यादातर भारतीय मानते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग से मौसम बदल रहा है?
Gaon Connection | Jan 07, 2026, 13:23 IST
हालिया सर्वे बताता है कि भारत के अधिकांश लोग मानते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग वास्तविक है और यह हीटवेव, बाढ़, सूखा और कृषि संकट जैसे चरम मौसम को प्रभावित कर रही है।
कुछ साल पहले तक मौसम की बातें अख़बार के एक कॉलम या टीवी के बुलेटिन तक सीमित रहती थीं। आज हालात बदल चुके हैं। गर्मियों में छत का तपना, दोपहर में निकलते समय छाता और पानी साथ रखना, अचानक तेज़ बारिश से खेतों में पानी भर जाना, या शहरों में बिजली कटौती, ये सब अब अपवाद नहीं, रोज़मर्रा की सच्चाई बन चुके हैं। भारत में मौसम अब केवल बातचीत का विषय नहीं रहा; वह लोगों के शरीर, जेब और कामकाज को सीधे प्रभावित करने वाला अनुभव बन गया है।
इसी अनुभव को आँकड़ों की भाषा में दर्ज करता है Yale Climate Communication Program का ताज़ा राष्ट्रीय सर्वे। रिपोर्ट बताती है कि भारत के अधिकांश लोग मानते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग हो रही है और यह देश में चरम मौसम की घटनाओं को बदल रही है। यह विश्वास किसी वैचारिक बहस से नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के अनुभवों से निकला निष्कर्ष है।
इस अध्ययन में 19,000 से अधिक लोगों की राय शामिल है, जिसे 634 ज़िलों और 34 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में इकट्ठा किया गया। प्रतिभागियों को जब ग्लोबल वार्मिंग की सरल व्याख्या दी गई, तो लगभग 96% लोगों ने माना कि यह वास्तव में हो रही है। भारत जैसे विविध और विशाल देश में किसी मुद्दे पर इतनी व्यापक सहमति असाधारण है, ख़ासकर तब, जब कई देशों में जलवायु परिवर्तन राजनीतिक ध्रुवीकरण का शिकार रहा है।
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सबसे अहम बात यह है कि अधिकांश भारतीय मानते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग चरम मौसम को प्रभावित कर रही है, चाहे वह भीषण गर्मी (हीटवेव) हो, सूखा, भारी वर्षा और बाढ़, तूफ़ान, या खेती में कीट-रोगों का बढ़ना। यानी यह समझ केवल सैद्धांतिक नहीं, अनुभवजन्य है।
भीषण गर्मी (हीटवेव)
पिछले एक साल में बड़ी संख्या में लोगों ने असाधारण गर्मी झेली है। शहरों में कंक्रीट, डामर और कम हरियाली के कारण तापमान और चढ़ता है, जिसे लोग सीधे “अर्बन हीट” के रूप में महसूस करते हैं। ग्रामीण इलाक़ों में खेतों में काम करने वाले मज़दूरों और किसानों के लिए यह गर्मी स्वास्थ्य और उत्पादकता दोनों पर चोट करती है।
पानी की किल्लत और सूखा
कई क्षेत्रों में जलस्तर गिरना, हैंडपंप सूखना, टैंकरों पर निर्भरता और फसलों पर असर, ये सब लोगों को जलवायु परिवर्तन से जोड़ते हैं। पानी अब केवल संसाधन नहीं, रोज़ की चिंता बन गया है।
बाढ़ और भारी वर्षा
अचानक, तीव्र बारिश से शहरी जलभराव और ग्रामीण बाढ़ बढ़ी है। लोग कहते हैं कि बारिश “कम दिनों में ज़्यादा” हो रही है, यानी पैटर्न बदल रहा है और चरम घटनाएँ बढ़ रही हैं।
कृषि में कीट-रोग
किसानों का अनुभव बताता है कि तापमान और नमी में बदलाव से कीट-रोगों का दबाव बढ़ा है। यह अनुभव सीधे खाद्य सुरक्षा और आमदनी से जुड़ता है, इसलिए इसकी गूँज व्यापक है।
धारणा और अनुभव: क्या दोनों हमेशा साथ चलते हैं?
रिपोर्ट का एक दिलचस्प पहलू यह है कि कुछ जगहों पर लोग किसी घटना का व्यक्तिगत अनुभव न होने पर भी उसे ग्लोबल वार्मिंग से जोड़ते हैं। उदाहरण के लिए, जहाँ तूफ़ानों का प्रत्यक्ष सामना कम हुआ, वहाँ भी यह विश्वास मज़बूत है कि ग्लोबल वार्मिंग ऐसे तूफ़ानों को प्रभावित करती है।
यह दिखाता है कि भारत में जलवायु समझ केवल निजी अनुभव तक सीमित नहीं है। मीडिया रिपोर्टिंग, वैज्ञानिक संवाद, पड़ोसी इलाक़ों की कहानियाँ और सामाजिक बातचीत सब मिलकर एक सामूहिक चेतना बनाते हैं।
भारत की जलवायु विविधता धारणा में भी झलकती है। उत्तर और मध्य भारत में गर्मी, लू और जल-संकट का असर ज़्यादा महसूस होता है। पूर्वी भारत में बाढ़ और नदी-तंत्र से जुड़ी चिंताएँ प्रमुख हैं। तटीय इलाक़ों में चक्रवात, समुद्री कटाव और भारी वर्षा का अनुभव धारणा को आकार देता है। पश्चिमी और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में सूखा और तापमान का तेज़ उछाल कृषि जोखिम बढ़ाता है।
फिर भी, इन सबके बीच एक साझा धागा है, लोग बदलाव महसूस कर रहे हैं और उसे ग्लोबल वार्मिंग से जोड़ रहे हैं।
गर्मी केवल डिग्री-सेल्सियस की कहानी नहीं है। यह हीट-स्ट्रेस, निर्जलीकरण, काम के घंटे घटने और बिजली की माँग बढ़ने से जुड़ी है। सर्वे में हीटवेव का व्यापक अनुभव बताता है कि कूलिंग शेल्टर, हरियाली, काम के समय में लचीलापन और स्वास्थ्य चेतावनियाँ अब अनिवार्य हो चुकी हैं।
लोगों का कहना है कि बारिश कम दिनों में ज़्यादा हो रही है। इससे शहरी नालों, ग्रामीण जलनिकासी और नदी-तट प्रबंधन पर दबाव बढ़ता है। जब जनता इस बदलाव को ग्लोबल वार्मिंग से जोड़ती है, तो जल-संरचना और भूमि-उपयोग सुधारों पर सहमति बनाना आसान होता है। किसानों के लिए मौसम का मतलब उपज है। जलवायु बदलने की समझ फसल-विविधीकरण, मौसम-सहिष्णु किस्मों और जल-कुशल तकनीकों को अपनाने की तत्परता बढ़ाती है। अनुभव-आधारित विश्वास कृषि सलाह को ज़मीन पर उतारने में मदद करता है।
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इसी अनुभव को आँकड़ों की भाषा में दर्ज करता है Yale Climate Communication Program का ताज़ा राष्ट्रीय सर्वे। रिपोर्ट बताती है कि भारत के अधिकांश लोग मानते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग हो रही है और यह देश में चरम मौसम की घटनाओं को बदल रही है। यह विश्वास किसी वैचारिक बहस से नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के अनुभवों से निकला निष्कर्ष है।
इस अध्ययन में 19,000 से अधिक लोगों की राय शामिल है, जिसे 634 ज़िलों और 34 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में इकट्ठा किया गया। प्रतिभागियों को जब ग्लोबल वार्मिंग की सरल व्याख्या दी गई, तो लगभग 96% लोगों ने माना कि यह वास्तव में हो रही है। भारत जैसे विविध और विशाल देश में किसी मुद्दे पर इतनी व्यापक सहमति असाधारण है, ख़ासकर तब, जब कई देशों में जलवायु परिवर्तन राजनीतिक ध्रुवीकरण का शिकार रहा है।
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सबसे अहम बात यह है कि अधिकांश भारतीय मानते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग चरम मौसम को प्रभावित कर रही है, चाहे वह भीषण गर्मी (हीटवेव) हो, सूखा, भारी वर्षा और बाढ़, तूफ़ान, या खेती में कीट-रोगों का बढ़ना। यानी यह समझ केवल सैद्धांतिक नहीं, अनुभवजन्य है।
भारत की जलवायु विविधता धारणा में भी झलकती है। उत्तर और मध्य भारत में गर्मी, लू और जल-संकट का असर ज़्यादा महसूस होता है।
लोग क्या महसूस कर रहे हैं?
पिछले एक साल में बड़ी संख्या में लोगों ने असाधारण गर्मी झेली है। शहरों में कंक्रीट, डामर और कम हरियाली के कारण तापमान और चढ़ता है, जिसे लोग सीधे “अर्बन हीट” के रूप में महसूस करते हैं। ग्रामीण इलाक़ों में खेतों में काम करने वाले मज़दूरों और किसानों के लिए यह गर्मी स्वास्थ्य और उत्पादकता दोनों पर चोट करती है।
पानी की किल्लत और सूखा
कई क्षेत्रों में जलस्तर गिरना, हैंडपंप सूखना, टैंकरों पर निर्भरता और फसलों पर असर, ये सब लोगों को जलवायु परिवर्तन से जोड़ते हैं। पानी अब केवल संसाधन नहीं, रोज़ की चिंता बन गया है।
बाढ़ और भारी वर्षा
अचानक, तीव्र बारिश से शहरी जलभराव और ग्रामीण बाढ़ बढ़ी है। लोग कहते हैं कि बारिश “कम दिनों में ज़्यादा” हो रही है, यानी पैटर्न बदल रहा है और चरम घटनाएँ बढ़ रही हैं।
कृषि में कीट-रोग
किसानों का अनुभव बताता है कि तापमान और नमी में बदलाव से कीट-रोगों का दबाव बढ़ा है। यह अनुभव सीधे खाद्य सुरक्षा और आमदनी से जुड़ता है, इसलिए इसकी गूँज व्यापक है।
धारणा और अनुभव: क्या दोनों हमेशा साथ चलते हैं?
रिपोर्ट का एक दिलचस्प पहलू यह है कि कुछ जगहों पर लोग किसी घटना का व्यक्तिगत अनुभव न होने पर भी उसे ग्लोबल वार्मिंग से जोड़ते हैं। उदाहरण के लिए, जहाँ तूफ़ानों का प्रत्यक्ष सामना कम हुआ, वहाँ भी यह विश्वास मज़बूत है कि ग्लोबल वार्मिंग ऐसे तूफ़ानों को प्रभावित करती है।
यह दिखाता है कि भारत में जलवायु समझ केवल निजी अनुभव तक सीमित नहीं है। मीडिया रिपोर्टिंग, वैज्ञानिक संवाद, पड़ोसी इलाक़ों की कहानियाँ और सामाजिक बातचीत सब मिलकर एक सामूहिक चेतना बनाते हैं।
जब अनुभव बोलते हैं: भारत में ग्लोबल वार्मिंग और चरम मौसम की नई समझ<br>
एक देश, कई मौसम
फिर भी, इन सबके बीच एक साझा धागा है, लोग बदलाव महसूस कर रहे हैं और उसे ग्लोबल वार्मिंग से जोड़ रहे हैं।
हीटवेव: तापमान से आगे, स्वास्थ्य का सवाल
बाढ़ और वर्षा: बदलता पैटर्न
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