Gaon Se: Influencer's के दौर में भी लोक कला को बचाती 70 साल की कलाकार- चंदाताई तिवाड़ी
Gaon Connection | Mar 25, 2026, 17:10 IST
महाराष्ट्र की चंदाताई तिवाड़ी भारूड कला के माध्यम से समाज को संदेश देती हैं। 70 साल की उम्र में भी उनका जोश बरकरार है। उनकी बेटी भी इस कला को आगे बढ़ा रही हैं। यह कला आज भी डिजिटल युग में जीवित है और नई पीढ़ी को influence कर रही है।
महाराष्ट्र की मिट्टी से जन्मी एक सशक्त कलाकार
बहुत खास होते हैं वो कलाकार जो अपनी कला के जरिए समाज को एक सकारात्मक संदेश भी देते हैं। जो सिर्फ entertain नहीं करते, सिर्फ मनोरंजन नहीं करते लेकिन साथ में अपनी जिम्मेदारी समझते हुए समाज को वो बातें बताते हैं जिनको बताना जरूरी है। महाराष्ट्र में चंदाताई तिवाड़ी ऐसी ही एक कलाकार हैं। 70 साल की हैं वो और वो भारूड कला में पारंगत हैं।
भारूड एक ऐसी कला है जिसमें गीतों और नाटकों के जरिए सामाजिक संदेश दिए जाते हैं। सोचिए न जाने कितने दशकों से इसी कला की सेवा कर रही हैं और न जाने कितने लोगों को सकारात्मक संदेश पहुँचा चुकी हैं। एक ऐसी कलाकार जो हम सबके लिए आज के digital युग में जहाँ हर कोई अपने आप को influencer कहना चाहता है, एक ऐसे युग में बहुत बड़ी प्रेरणा है क्योंकि वो एक कलाकार की जिम्मेदारी जानती हैं।
महाराष्ट्र की मिट्टी से जन्मी एक सशक्त, स्वाभिमानी और सुरों से भरी आवाज। यही पहचान है चंदाताई तिवाड़ी की। 70 साल की उम्र में भी जब वो मंच पर आती हैं तो उनके सुरों में वही जोश, वही आत्मा झलकती है जो उन्होंने पचास साल पहले अपनाई थी। भारूड एक ऐसी लोककला जो भक्ति, व्यंग और जीवन के रंगों को जोड़ती है। कभी भगवान की आवाज में तो कभी गाँव की औरत या मजदूर की कहानी बनकर। यही है भारूड की ताकत।
चंदाताई तिवाड़ी बताती हैं, "मेरी मां ने मैं जब गर्भ में थी तो उसने अनाज नहीं लिया था। वो फल फ्रूट पे ही नौ महीने तक रही थी तो उसी का कुछ असर मेरे ऊपर हुआ होगा! तो यह नाम और व्रत और सात्विकता तभी से मुझे मिली है। आसपास जो भी ध्वनि पड़ती थी हमारे कान में बचपन से, वो भी तो पांडुरंग परमात्मा के कीर्तन भजन की ही पड़ती थी।" अभंग के बारे में बताते हुए चंदाताई कहती हैं, "अभंग बोले तो संत के मुख से जो वाणी निकलती थी, जो कभी भंग नहीं होती। भगवान की स्तुति करते हुए उसको अभंग कहा जाता है। उसी का वर्णन करते हैं तो उसको गवलन कहते हैं। वारकरी संप्रदाय में और भारूड यह रूपक होता है।"
"इन भक्तों के लिए भगवान ने कौन से कौन से अवतार लिए। मत्स्य, कच्छ, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, राम, श्री कृष्ण और बुद्ध। यह बताने के लिए जो कुछ रचना की है हमारे संत ने और प्रकृति और परमात्मा जब एक होते हैं तब परम आत्मा की हमें हमें ज्ञान होता है। तो यह ज्ञान बहुरूड़ी का भाव पर आधारित है।"
गाँव की गलियों से शुरू हुआ उनका सफर आज देश के बड़े मंचों तक पहुँच चुका है। जब वो गाती हैं तो लोग ताली नहीं बजाते, बस सुनते हैं जैसे कोई आत्मा बोल रही हो। लेकिन चंदाताई की असली पहचान सिर्फ उनकी कला नहीं बल्कि उनकी विरासत है। उनकी बेटी आज 50 साल की खुद भी भारूड की मशहूर गायिका हैं। माँ बेटी का यह रिश्ता सिर्फ खून का नहीं, कला का है। यह सिर्फ संगीत की कक्षा नहीं है। यह परंपरा का पुनर्जन्म है।
संध्या बताती हैं, जब 97, 98 में साक्षरता अभियान चला था तो इस गाँव-गाँव क्षेत्र में जाकर भारूड के माध्यम से शिक्षा का महत्व समझाने का काम मैंने शुरू किया। लेकिन हमारे लिए यह भारूड रोजी रोटी के लिए नहीं है। यह एक अध्ययन है। यह हमारे महाराष्ट्र की संस्कृति है। यह हमारे महाराष्ट्र की एक लोक कला है, जिसे हमें गाँव-गाँव के छोटे छोटे बच्चों तक पहुँचाना है। उनको भारूड का सही मतलब समझाना है।
आज जब दुनिया digital हो गई है फिर भी चंदाताई का भारूड मिट्टी, ताल और लोक की महक लिए जिंदा है। उनकी झुर्रियों में समय का इतिहास है। उनकी आवाज में जीवन का संगीत और उनकी बेटी की आंखों में परंपरा का भविष्य। चंदाताई कहती हैं, "भारूड नाम सुनते ही बच्चे जानते हैं यह बूढ़े लोगों का काम है। लेकिन जब हम college में जाते हैं और जब महिला मंडल में हम program करते हैं और media के द्वारा इसका जब presentation होता है जैसे कि mobile में आज YouTube में यह आते हैं तब हमारी नई पीढ़ी को इसका आकर्षण होता है। हम संत तो नहीं बन सकते लेकिन उनकी वाणी को लोगों तक पहुँचाने का काम हम कर सकते हैं। चंदाताई तिवाड़ी एक गायिका नहीं, सांस लेती हुई एक परंपरा हैं जो हर पीढ़ी को सिखा रही हैं कि कला मंच पर नहीं, जीवन में बसती है।
महाराष्ट्र के सोलापुर की रहने वाली हैं चंदाताई तिवाड़ी
क्या होती है भारूड़ कला?
70 साल की उम्र में बच्चों जैसा जोश
लोक गीत गाती चंदाताई तिवाड़ी
चंदाताई तिवाड़ी और उनके मंच के साथी
भगवानों को अलग-अलग रूपों का सत्कार
मंच पर भगवान के रूप की वंदना करती चंदाताई तिवाड़ी
बेटी के ज़रिए हुआ परंपरा का पुनर्जन्म
चंदाताई तिवाड़ी और उनकी बेटी मंच पर एक साथ
चंदाताई तिवाड़ी की बेटी