Sheetal Devi: बिना हाथ एक गाँव की लड़की कैसे बनी नंबर-1 धनुर्धर?
Gaon Connection | Mar 09, 2026, 15:21 IST
एक छोटे से गाँव की शीतल देवी, जिनके दोनों हाथ नहीं हैं, आज तीरंदाजी में भारत का नाम रोशन कर रही हैं। उन्होंने अपनी मेहनत और हौसले से दुनिया को अपनी प्रतिभा दिखाई है। शीतल देवी ने कम समय में ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई पदक जीते हैं। पढ़िए हजारों लोगों की प्रेरणा बनने वाली शीतल की कहानी।
पैरा आर्चर शीतल देवी
कभी एक छोटे से गाँव की लड़की, जिसे लगता था कि वह खेल भी नहीं सकती, आज वही लड़की तीरंदाजी की दुनिया में भारत का नाम रोशन कर रही है। यह कहानी है Sheetal Devi की, जिनके दोनों हाथ नहीं हैं, लेकिन हौसला इतना मजबूत है कि उन्होंने दुनिया के सामने साबित कर दिया कि सपनों की उड़ान शरीर की सीमाओं से कहीं बड़ी होती है।
Kishtwar जिले के एक छोटे से गाँव लोईधार में पली-बढ़ी शीतल देवी की जिंदगी शुरू से ही चुनौतियों से भरी रही। बचपन में उन्हें लगता था कि शायद वह अकेली ऐसी लड़की हैं जिनके दोनों हाथ नहीं हैं। गाँव में खेल की कोई सुविधा भी नहीं थी, इसलिए उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि वह खेलों में करियर बनाएंगी या देश के लिए मेडल जीतेंगी। शीतल देवी कहती हैं, “मेरा कोई प्लान नहीं था कि मैं आर्चरी करूंगी या देश के लिए मेडल जीतूंगी। मुझे तो यह भी नहीं पता था कि विदेश क्या होता है। मैं 15 साल तक अपने गाँव में ही रही, स्कूल जाती थी और पेड़ों पर चढ़ना मुझे बहुत पसंद था।”
शीतल याद करते हुए कहती हैं, “मुझे लगता है कि मैंने आर्चरी को नहीं चुना, बल्कि आर्चरी ने मुझे चुना। मुझे पहले यह भी नहीं पता था कि आर्चरी क्या होती है।” शीतल देवी अपने पैरों की मदद से पेड़ों पर चढ़ जाती थीं। यही उनकी ताकत भी बनी। 15 साल की उम्र में जब वह इलाज के लिए पहली बार गाँव से बाहर गईं, तब उन्हें पता चला कि उनके जैसे लोग भी खेलों में भाग लेते हैं। वहीं उनकी मुलाकात प्रीति नाम की एक खिलाड़ी से हुई, जिन्होंने उन्हें बताया कि शारीरिक चुनौतियों के बावजूद खेलों में करियर बनाया जा सकता है। इसके बाद शीतल का आकलन (असेसमेंट) किया गया, जिसमें बताया गया कि वह स्विमिंग, रनिंग और तीरंदाजी खेल सकती हैं।
शीतल देवी को प्रशिक्षण के लिए Shri Mata Vaishno Devi Shrine Board Archery Academy में दाखिला मिला। लेकिन इसकी शुरुआत आसान नहीं थी। जब उन्होंने पहली बार धनुष उठाया तो वह गिर गया क्योंकि वह काफी भारी था। लेकिन कोच ने उन्हें समझाया कि यह एक दिन में नहीं सीखा जा सकता, इसके लिए लगातार मेहनत करनी होगी।
शीतल कहती हैं, “पहली बार जब मैंने बो उठाया तो वह गिर गया। मुझे लगा कि शायद मैं नहीं कर पाऊंगी। लेकिन सर ने कहा कि मेहनत और प्रैक्टिस से सब हो जाएगा। मैंने एक महीने तक सिर्फ अपनी स्टैंडिंग और स्ट्रेंथ पर काम किया। जब पहली बार मैंने एरो चलाया तो मुझे लगा कि अगर मेहनत करूं तो मैं जरूर आगे जा सकती हूं।”
जब शीतल देवी गाँव से निकली थीं, तब उन्होंने खुद से एक वादा किया था। “मैं जब गाँव से आई थी तो मैंने सोचा था कि जब तक एक मेडल नहीं जीतूंगी, तब तक गाँव वापस नहीं जाऊंगी। बस एक मेडल जीतना था।” शुरुआत में उन्हें यह भी नहीं पता था कि पैरा खिलाड़ियों की अलग कैटेगरी होती है। उन्होंने अपने पहले प्रतियोगिता में सामान्य (एबल बॉडी) खिलाड़ियों के साथ खेला और सातवें स्थान पर रहीं। बाद में जूनियर प्रतियोगिता में उन्होंने सिल्वर मेडल जीत लिया।
दिलचस्प बात यह है कि उन्हें तब तक यह भी नहीं पता था कि मेडल के अलग-अलग रंग होते हैं। शीतल बताती हैं कि, “मुझे नहीं पता था कि मेडल्स का रंग गोल्ड, सिल्वर और ब्रॉन्ज भी होता है। जब मैं पोडियम पर चढ़ने गई तो मुझे समझ नहीं आया कि किस नंबर पर खड़ा होना है। मैंने सर से पूछा कि मुझे कहाँ खड़ा होना है।”
सिर्फ तीन साल के अंदर शीतल देवी ने अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना शुरू कर दिया और वहाँ गोल्ड, सिल्वर और ब्रॉन्ज तीनों मेडल जीतकर भारत का नाम रोशन किया।nवह कहती हैं, “जब मैं इंटरनेशनल खेलने गई तो मुझे पता चला कि मेरे जैसे और भी बहुत लोग हैं। उन्हें देखकर मुझे बहुत मोटिवेशन मिला कि अगर ये कर सकते हैं तो मैं क्यों नहीं कर सकती।” शीतल देवी के जन्म के समय कई लोगों ने कहा था कि यह लड़की आगे क्या कर पाएगी। लेकिन उनके परिवार ने हमेशा उनका साथ दिया। शीतल बताती हैं, “मेरे परिवार ने कभी मुझे यह महसूस नहीं होने दिया कि मैं अलग हूँ। लोग बातें करते थे तो मेरी माँ रोती थीं, लेकिन मेरे दादा की माँ कहती थीं कि यह हमारी घर की लक्ष्मी है, देखना यह घर का नाम रोशन करेगी।”आज वही लोग उनके माता-पिता को बधाई देने आते हैं।
आज शीतल देवी पैरा और एबल—दोनों कैटेगरी में खेलती हैं। उनका कहना है कि वह खुद को किसी से कम नहीं मानतीं। “मैं खुद को चैलेंज देती हूं कि मुझे एबल खिलाड़ियों के साथ भी जीतना है। मैं यह नहीं सोचती कि मैं पैरा हूं, इसलिए मुझे सिर्फ पैरा कैटेगरी में ही जीतना है।” अब उनका लक्ष्य आने वाले पैरा एशियन गेम्स में फिर से गोल्ड मेडल जीतना है।
शीतल देवी की कहानी सिर्फ खेल की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि उस हिम्मत की कहानी है जो परिस्थितियों से बड़ी होती है। एक ऐसी लड़की जिसने 15 साल की उम्र तक तीर-कमान देखा भी नहीं था, उसने सिर्फ तीन साल में दुनिया को अपना हुनर दिखा दिया। आज वह हजारों लोगों के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं, यह बताने के लिए कि अगर हौसला मजबूत हो तो कोई भी सपना दूर नहीं होता।
गाँव से विदेश तक का सफऱ
गाँव के स्कूल में पढ़ाई करती शीतल देवी।
पेड़ों पर चढ़ने वाली लड़की से बनी तीरंदाज
शीतल को पेड़ों से बहुत प्रेम है।
पहली बार धनुष उठाया तो गिर गया
कड़ी मेहनत से सपनों को किया पूरा।
शीतल कहती हैं, “पहली बार जब मैंने बो उठाया तो वह गिर गया। मुझे लगा कि शायद मैं नहीं कर पाऊंगी। लेकिन सर ने कहा कि मेहनत और प्रैक्टिस से सब हो जाएगा। मैंने एक महीने तक सिर्फ अपनी स्टैंडिंग और स्ट्रेंथ पर काम किया। जब पहली बार मैंने एरो चलाया तो मुझे लगा कि अगर मेहनत करूं तो मैं जरूर आगे जा सकती हूं।”
गाँव छोड़ते वक्त लिया था एक संकल्प
मेडल जीतने का सपना किया पूरा।
दिलचस्प बात यह है कि उन्हें तब तक यह भी नहीं पता था कि मेडल के अलग-अलग रंग होते हैं। शीतल बताती हैं कि, “मुझे नहीं पता था कि मेडल्स का रंग गोल्ड, सिल्वर और ब्रॉन्ज भी होता है। जब मैं पोडियम पर चढ़ने गई तो मुझे समझ नहीं आया कि किस नंबर पर खड़ा होना है। मैंने सर से पूछा कि मुझे कहाँ खड़ा होना है।”
इंटरनेशनल मंच पर लहराया परचम
अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत का किया नाम रौशन
अब सपना है फिर से देश का तिरंगा लहराना
कड़ी मेहनत का नाम है शीतल।
हौसले की मिसाल
हजारों लोगों की प्रेरणा बनी शीतल