Budget 2026: इस बार बजट में क्या चाहते हैं देश के किसान?
देश के करोड़ों की किसानों की नज़रें एक फरवरी पर टिकी हुईं कि इस बार वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के पिटारे में से उनके लिए क्या निकलता है।
"किसान को खाद और बीज मिलता रहे, उसकी फसल बिक जाए और किसान को क्या ही चाहिए, लेकिन किसान को न सही समय पर खाद मिलती है और न उपज बिकती है, सरकार को चाहिए कि बजट में इसपर भी बात करनी चाहिए, "हरियाणा के करनाल ज़िले के निग्धू गाँव के किसान विक्रम राणा कहते हैं।
एक फरवरी को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण बजट पेश करेंगी, ऐसे में देश भर किसानों की नज़र बजट पर टिकी हुई है कि उनके हिस्से में इस बार क्या आने वाला है।
केंद्र सरकार 1 फरवरी को वित्तीय वर्ष 2022-23 के लिए आम बजट पेश करेगी। बजट वैसे तो पूरे साल का आय-व्यय का लेखा-जोखा होता है, लेकिन भारत में बजट में कई योजनाओं की शुरुआत भी होती है। बजट का आवंटन उस क्षेत्र की दशा तय करता है। इसलिए बजट से देश के करोड़ों किसानों की नज़र बजट पर टिकी हुई है कि उनके हिस्से में इस बार क्या आने वाला है।
हरियाणा के किसान विक्रम राणा की तरह की उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात के किसान भंवरपाल सिंह की नज़रें बजट पर टिकी हुईं हैं, भंवरपाल सिंह कहते हैं, "सरकार को चाहिए कि किसानों को सम्मान निधि देने के बजाए, उनकी उपज का सही दाम दिलाए, हम किसानों की सबसे बड़ी समस्या तो यही है कि हमें समय पर फर्टिलाइजर नहीं मिलता, इस पर तो बजट पर बात होनी ही चाहिए।"
वो आगे कहते हैं, "सरकार को किसान क्रेडिट कार्ड की लिमिट बढ़ानी चाहिए, यही नहीं किसान क्रेडिट कार्ड से ब्याज़ सरकार खत्म कर देना चाहिए; साथ ही किसान को भी आज़ादी होनी चाहिए कि वो अपनी फसल का दाम तय कर सके, अगर मेरा आलू 15 से 20 रूपए किलो बिकने लगे तो हमे क्या दिक्कत होगी? आप दीजिये फिर डीएपी 2000 हज़ार रूपए बोरी, हमे कोई दिक्कत नहीं; लेकिन हमारा आलू अगर बिकेगा दो रूपए किलो तो उससे ज़्यादा तो हमारी लागत आ जाती है।"
कुछ इसी तरह ही महाराष्ट्र के भरत दिघोले का भी कहना है, "खाद और पेस्टिसाइड के दाम सरकार को कम करने चाहिए; कम्पनियाँ करोड़ और अरबों रुपया कमा रही हैं, लेकिन किसान मर रहा है और दिन पर दिन कर्ज़ का बोझ बढ़ता जा रहा है।"
वो आगे कहते हैं, "सरकार की कोशिश यही रहती है कि किसान की फसल सस्ते दाम में लोगो तक पहुँचे, लेकिन जो किसान दिन रात मेहनत करता है उसके लिए कोई ऐसी पाॅलिसी क्यों नहीं है कि किसान को अपनी फसल का पक्का दाम मिलेगा।"
उत्तर प्रदेश हो महाराष्ट्र, या फिर हरियाणा, बजट को लेकर ज़्यादातर किसानों का यही कहना है कि उन्हें उनकी उपज का यही दाम मिले और समय पर सही दाम पर उन्हें उर्वरक मिल जाए।
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पिछले बजट सत्र में भी केंद्र सरकार ने किसानों के कल्याण को प्राथमिकता देते हुए कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय के लिए बजट में वृद्धि की थी। 2025-26 में इस मंत्रालय का बजट बढ़ाकर 1,37,756.55 करोड़ रुपये कर दिया गया है, जो 2024-25 के 1,32,469.86 करोड़ रुपये से अधिक है।
लंबे समय से किसान प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि की राशि बढ़ाने की माँग कर रहे हैं, करोड़ों किसान इस योजना की 22वीं किस्त का इंतजार कर रहे हैं। इतना ही नहीं किसानों की नजर 1 फरवरी 2026 पर भी टिकी हैं।
2019 में शुरू हुई प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना के लिए प्रत्येक वर्ष कृषि मंत्रालय एक बजट निर्धारित करता है। हर साल इसके लिए एक बजट निर्धारित किया जाता है। अब अगले वित्त वर्ष के लिए 1 फरवरी 2025 को वित्त वर्ष 2026-27 के लिए पेश होने वाले बजट में पीएम किसान योजना के लिए भी बजट का निर्धारण किया जाएगा। इस बजट में इजाफा होगा या नहीं।
चालू वित्त वर्ष की बात करें तो पीएम किसान योजना के लिए पिछले बजट में 63500 करोड़ रुपये अलॉट किए गए थे। यानी वित्त वर्ष 2024-25 के लिए सरकार ने PM Kisan Yojana के लिए इतना बजट निर्धारित किया था। वहीं, 2024-25 के लिए सरकार ने पहले 60000 करोड़ रुपये का बजट अलॉट किया था फिर बाद में इसे बढ़ाकर 63500 करोड़ कर दिया था। वित्त वर्ष 2023-24 में पीएम किसान सम्मान निधि योजना के लिए बजट में 61440.74 रुपये का निर्धारण किया गया था। दो साल में इसमें 2059.26 करोड़ रुपये का इजाफा हुआ है।
किसान शक्ति संघ के अध्यक्ष पुष्पेंद्र सिंह कहते हैं, "पीएम किसान सम्मान निधि को 6000 से बढ़ाकर 24000 करना चाहिए, अगर नहीं तो कम से कम 12000 हज़ार तो करना ही चाहिए, 2019 में इस योजना की शुरूआत हुई तब महँगाई अलग थी अब अलग है, इसलिए सरकार को चाहिए कि किसानों के बारे में भी सोचे।"
वो आगे बताते हैं, "किसान क्रेडिट कार्ड को तीन लाख से बढ़ाकर पाँच लाख कर दिया गया, लेकिन इसे 10 लाख करना चाहिए। यही नहीं केसीसी को एक 'रनिंग अकाउंट' में बदलने की ज़रूरत है, ताकि किसानों को साल के अंत में ब्याज और मूलधन जमा करने के लिए साहूकारों से ऊँचे ब्याज पर पैसे न लेने पड़ें।"
"यही नहीं डिस्क्रेपेंसी दूर करने की ज़रूरत है कि एमएसपी पूर्ण लागत पर हमें मिलनी चाहिए, पूर्ण लागत का डेढ़ गुना। न कि सब्सिडाइज्ड प्राइस का डेढ़ गुना। सब्सिडाइज्ड प्राइस का डेढ़ गुना मिलने से हमारा जो भी सब्सिडी होता है, हमारी जेब से उसका आधा पैसा और चला जाता है, "उन्होंने आगे कहा।
देश के करोड़ों की किसानों की नज़रें एक फरवरी पर टिकी हुईं, कि इस बार वित्त मंत्री के पिटारे में से उनके लिए क्या निकलता है।
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