केंद्रीय बजट से स्थानीय सरकारों की उम्मीदें
Gaon Connection | Jan 23, 2026, 17:46 IST
एक फरवरी को केंद्रीय वित्त मंत्री सीतारमण पेश करेंगी, देश की बड़ी आबादी गाँवों में रहती है, तो सबकी नज़रें बज़ट पर ही टिकी हुईं, आख़िर क्या ग्रामीण भारत इस बार के बजट 2026 से उम्मीदें?
16वें केंद्रीय वित्त आयोग की रिपोर्ट आ चुकी है और केंद्रीय वित्त मंत्री 1 फरवरी 2026 को 2026-27 का बजट पेश करेंगी। इसमें आयोग की सिफ़ारिशों और केंद्र सरकार ने उन पर क्या कार्रवाई की, इसका पूरा ब्योरा मिलेगा।
पंचायतों की पहली उम्मीद यह है कि जो भी पैसा उन्हें मिले, वह बिना किसी शर्त का हो, यानी ग्राम सभा और ग्राम पंचायत, ब्लॉक पंचायत और जिला पंचायत खुद तय करें कि उन्हें किस काम पर पहले पैसा खर्च करना है। 15वें वित्त आयोग ने शर्तों वाला पैसा दिया था जिससे पंचायतों की आज़ादी बहुत कम हो गई थी। बिना शर्त का पैसा देना मतलब है कि उन्हें असली 'स्थानीय सरकार' माना जाए, न कि सिर्फ केंद्र और राज्य की योजनाओं को लागू करने वाली एजेंसी।
दूसरा, पैसा 15वें वित्त आयोग से काफी ज्यादा मिलना चाहिए। 14वें वित्त आयोग ने पाँच साल में पंचायतों को 2 लाख करोड़ रुपये दिए थे। 15वें ने 2.36 लाख करोड़ दिए - जो महंगाई को देखते हुए बहुत कम बढ़ोतरी है। पंचायतें चाहती हैं कि 2026-31 के बीच उन्हें कम से कम 4 लाख करोड़ रुपये मिलें।
तीसरा, वित्त मंत्री साफ़ घोषणा करें कि जिन पंचायतों या नगर निकायों में चुनाव नहीं हुए हैं और प्रशासक चला रहे हैं, उन्हें एक पैसा नहीं मिलेगा। इससे राज्य सरकारें और राज्य चुनाव आयोग पाँच साल की अवधि खत्म होने से पहले चुनाव कराने के लिए मजबूर होंगे।
चौथा, पंचायतों को वित्त आयोग के पैसे से रोज़मर्रा का खर्च करने की छूट मिलनी चाहिए। नई चीज़ें बनाने से ज्यादा ज़रूरी है कि पुरानी चीज़ों की देखभाल और मरम्मत हो सके।
पाँचवा, यह घोषणा हो कि स्थानीय सरकारों को बिना पैसे दिए कोई काम नहीं सौंपा जाएगा। अभी केंद्र और राज्य के मंत्रालय काम तो पंचायतों को सौंप देते हैं लेकिन उसके लिए पैसा नहीं देते। अगर यह तय हो जाए कि हर मंत्रालय को योजना के पैसे का कम से कम 10% स्थानीय सरकारों को देना होगा, तो यह समस्या काफी हद तक हल हो जाएगी।
छठा, केंद्र और राज्य दोनों को उन पंचायतों को इनाम देना चाहिए जो खुद पैसा जुटाती हैं और सिर्फ सरकारी पैसे पर निर्भर नहीं रहतीं। लेकिन साथ ही ग्राम पंचायतों को चलाने लायक बनाने की भी ज़रूरत है। अब गाँवों में पक्की सड़कें हैं, बिजली है, मोबाइल और इंटरनेट है, तो दूरियाँ कम हो गई हैं। इसे देखते हुए पंचायतों का पुनर्गठन करना चाहिए।
ये भी पढ़ें: Budget 2026 : बजट कटौती, मनरेगा, आवास योजनाओं पर क्या हैं ग्राम प्रधानों की उम्मीदें?
सातवाँ, पंचायतों को समय पर और नियमित पैसा मिलना चाहिए ताकि उनका काम ठप न हो। जिस तरह मार्च के महीने में पूरा पैसा खर्च कर देने की प्रथा गलत थी, उसी तरह पैसा न मिलने या देर से मिलने से भी काम बिगड़ता है। केंद्र सरकार एक कमेटी बना सकती है जो इस पर विचार करे। पंचायतों को GST में हिस्सा देने और उनके लिए अलग से फंड बनाने जैसे सुझाव इस कमेटी में रखे जा सकते हैं। यह ज़रूरी है क्योंकि सत्ताधारी पार्टी ने अपने चुनावी वादे में कहा था कि वे पंचायतों को आर्थिक आज़ादी देंगे।
आठवाँ, केंद्र सरकार 'ग्राम ऊर्जा स्वराज अभियान' शुरू कर सकती है जिसमें गाँवों को सौर ऊर्जा जैसी स्वच्छ ऊर्जा बनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाए और कार्बन उत्सर्जन शून्य करने की दिशा में काम हो। जब तक गाँव वाले खुद अपनी पंचायत को स्वच्छ और हरा-भरा बनाने में नहीं जुटेंगे, तब तक देश के लक्ष्य पूरे नहीं हो सकते।
नौवाँ, केंद्र सरकार स्थानीय सरकारों को मजबूत करने के लिए सुधारों की योजना ला सकती है और राज्यों को इसके लिए आर्थिक प्रोत्साहन दे सकती है।
अब समय आ गया है कि केंद्र और राज्य सरकारें यह समझें कि स्थानीय सरकारें शासन व्यवस्था का ज़रूरी हिस्सा हैं। बिना मजबूत और कारगर स्थानीय सरकारों के लोगों को अच्छा शासन नहीं मिल सकता। यह समझ आने से बजट में ऐसी नीतियाँ और वित्तीय कदम आएँगे जो स्थानीय सरकारों को फायदा पहुँचाएँगे।
(सुनील कुमार पुणे इंटरनेशनल सेंटर में विजिटिंग सीनियर फेलो और पूर्व सिविल सेवक हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)
पंचायतों की पहली उम्मीद यह है कि जो भी पैसा उन्हें मिले, वह बिना किसी शर्त का हो, यानी ग्राम सभा और ग्राम पंचायत, ब्लॉक पंचायत और जिला पंचायत खुद तय करें कि उन्हें किस काम पर पहले पैसा खर्च करना है। 15वें वित्त आयोग ने शर्तों वाला पैसा दिया था जिससे पंचायतों की आज़ादी बहुत कम हो गई थी। बिना शर्त का पैसा देना मतलब है कि उन्हें असली 'स्थानीय सरकार' माना जाए, न कि सिर्फ केंद्र और राज्य की योजनाओं को लागू करने वाली एजेंसी।
दूसरा, पैसा 15वें वित्त आयोग से काफी ज्यादा मिलना चाहिए। 14वें वित्त आयोग ने पाँच साल में पंचायतों को 2 लाख करोड़ रुपये दिए थे। 15वें ने 2.36 लाख करोड़ दिए - जो महंगाई को देखते हुए बहुत कम बढ़ोतरी है। पंचायतें चाहती हैं कि 2026-31 के बीच उन्हें कम से कम 4 लाख करोड़ रुपये मिलें।
तीसरा, वित्त मंत्री साफ़ घोषणा करें कि जिन पंचायतों या नगर निकायों में चुनाव नहीं हुए हैं और प्रशासक चला रहे हैं, उन्हें एक पैसा नहीं मिलेगा। इससे राज्य सरकारें और राज्य चुनाव आयोग पाँच साल की अवधि खत्म होने से पहले चुनाव कराने के लिए मजबूर होंगे।
चौथा, पंचायतों को वित्त आयोग के पैसे से रोज़मर्रा का खर्च करने की छूट मिलनी चाहिए। नई चीज़ें बनाने से ज्यादा ज़रूरी है कि पुरानी चीज़ों की देखभाल और मरम्मत हो सके।
अब समय आ गया है कि केंद्र और राज्य सरकारें यह समझें कि स्थानीय सरकारें शासन व्यवस्था का ज़रूरी हिस्सा हैं।<br>
पाँचवा, यह घोषणा हो कि स्थानीय सरकारों को बिना पैसे दिए कोई काम नहीं सौंपा जाएगा। अभी केंद्र और राज्य के मंत्रालय काम तो पंचायतों को सौंप देते हैं लेकिन उसके लिए पैसा नहीं देते। अगर यह तय हो जाए कि हर मंत्रालय को योजना के पैसे का कम से कम 10% स्थानीय सरकारों को देना होगा, तो यह समस्या काफी हद तक हल हो जाएगी।
छठा, केंद्र और राज्य दोनों को उन पंचायतों को इनाम देना चाहिए जो खुद पैसा जुटाती हैं और सिर्फ सरकारी पैसे पर निर्भर नहीं रहतीं। लेकिन साथ ही ग्राम पंचायतों को चलाने लायक बनाने की भी ज़रूरत है। अब गाँवों में पक्की सड़कें हैं, बिजली है, मोबाइल और इंटरनेट है, तो दूरियाँ कम हो गई हैं। इसे देखते हुए पंचायतों का पुनर्गठन करना चाहिए।
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सातवाँ, पंचायतों को समय पर और नियमित पैसा मिलना चाहिए ताकि उनका काम ठप न हो। जिस तरह मार्च के महीने में पूरा पैसा खर्च कर देने की प्रथा गलत थी, उसी तरह पैसा न मिलने या देर से मिलने से भी काम बिगड़ता है। केंद्र सरकार एक कमेटी बना सकती है जो इस पर विचार करे। पंचायतों को GST में हिस्सा देने और उनके लिए अलग से फंड बनाने जैसे सुझाव इस कमेटी में रखे जा सकते हैं। यह ज़रूरी है क्योंकि सत्ताधारी पार्टी ने अपने चुनावी वादे में कहा था कि वे पंचायतों को आर्थिक आज़ादी देंगे।
आठवाँ, केंद्र सरकार 'ग्राम ऊर्जा स्वराज अभियान' शुरू कर सकती है जिसमें गाँवों को सौर ऊर्जा जैसी स्वच्छ ऊर्जा बनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाए और कार्बन उत्सर्जन शून्य करने की दिशा में काम हो। जब तक गाँव वाले खुद अपनी पंचायत को स्वच्छ और हरा-भरा बनाने में नहीं जुटेंगे, तब तक देश के लक्ष्य पूरे नहीं हो सकते।
नौवाँ, केंद्र सरकार स्थानीय सरकारों को मजबूत करने के लिए सुधारों की योजना ला सकती है और राज्यों को इसके लिए आर्थिक प्रोत्साहन दे सकती है।
अब समय आ गया है कि केंद्र और राज्य सरकारें यह समझें कि स्थानीय सरकारें शासन व्यवस्था का ज़रूरी हिस्सा हैं। बिना मजबूत और कारगर स्थानीय सरकारों के लोगों को अच्छा शासन नहीं मिल सकता। यह समझ आने से बजट में ऐसी नीतियाँ और वित्तीय कदम आएँगे जो स्थानीय सरकारों को फायदा पहुँचाएँगे।
(सुनील कुमार पुणे इंटरनेशनल सेंटर में विजिटिंग सीनियर फेलो और पूर्व सिविल सेवक हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)