बदलता रेगिस्तान: जब रेत का जहाज डूबने लगा, क्या हम जलवायु संकट का समाधान खुद खत्म कर रहे हैं?

Manvendra Singh | Feb 16, 2026, 19:45 IST
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राजस्थान का रेगिस्तान सिर्फ रेत का विस्तार नहीं, यह एक जीवंत सभ्यता है जो सदियों से अपनी अनोखी पहचान के साथ खड़ी है। लेकिन आज यह रेगिस्तान बदल रहा है। "बदलता रेगिस्तान" सीरीज में हम आपको ले चलेंगे उन कहानियों के बीच जहां परंपरा और आधुनिकता टकराती है, जहां जलवायु परिवर्तन नई चुनौतियां खड़ी कर रहा है, और जहां कुछ लोग अपनी धरोहर को बचाने की जद्दोजहद में लगे हैं और इसी जीवंत सभ्यता का हिस्सा है ऊंट जो अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं।
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लखनऊ से करीब 903 किलोमीटर दूर राजस्थान के पाली जिले के सादड़ी इलाके में सूरज की पहली किरण के साथ 45 वर्षीय भंवरलाल देवासी अपने ऊंटों को चराने निकल जाते हैं। उनकी आंखों में एक अजीब सा दर्द है। वे याद करते हैं, "मेरे पिताजी के पास 100 ऊंट थे। आज मेरे पास सिर्फ 30-35 बचे हैं।" यह सिर्फ भंवरलाल की कहानी नहीं है। यह पूरे राजस्थान, बल्कि पूरे भारत के ऊंटों की त्रासदी है।

35 साल से भारत में ऊंटों को बचाने की कोशिश कर रहीं जर्मन पशु चिकित्सक डॉ. इल्से कोहलर-रोलेफसन कहती हैं, "1990 में जब मैं यहां आई थी, तब भारत में दस लाख से अधिक ऊंट थे। यह दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी ऊंट आबादी थी। आज यह संख्या इतनी कम हो गई है कि मुझे लगता है हम एक पूरी सभ्यता को खो रहे हैं।"

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क्या कहते हैं आंकड़े?

1951 में भारत में करीब 6 लाख ऊंट थे। 1977 में यह संख्या बढ़कर 11 लाख हो गई। लेकिन उसके बाद शुरू हुआ एक ऐसा पतन जिसने रेगिस्तान की पहचान को ही मिटा दिया। 2019 के 20वें पशुधन सर्वेक्षण के अनुसार, भारत में अब सिर्फ 2,50,000 ऊंट बचे हैं। यानी पिछले तीन दशकों में 75 फीसदी से ज्यादा ऊंट गायब हो गए।

राजस्थान की हालत और भी चिंताजनक है। 1992 में यहां 7,49,000 ऊंट थे। 2019 में यह संख्या घटकर 2,12,739 रह गई – करीब 70 फीसदी की गिरावट। गुजरात में भी यही हाल है। 63,000 से घटकर 27,620 ऊंट बचे हैं। हरियाणा की स्थिति तो और भयावह है – 1,28,000 से सिर्फ 5,154 ऊंट बचे हैं, यानी 95 फीसदी से ज्यादा की कमी।

डॉ. इल्से इस तबाही की चश्मदीद गवाह हैं। वे कहती हैं, "शुरुआत में ऊंट पालने वालों को ढूंढना भी बहुत मुश्किल था। लेकिन जब मैं रायका से मिली, तो मैं पूरी तरह से प्रभावित थी। वे उन्हें उत्पादन मशीनों के बजाय परिवार के सदस्यों की तरह मानते थे। और फिर रायका ने मदद मांगी। उन्होंने कहा, हमारे ऊंट मर रहे हैं, कोई बीमारी है। उसके बाद हमें अन्य समस्याओं के बारे में पता चला जैसे चराई के मुद्दे, क्योंकि बहुत सारे पारंपरिक चराई क्षेत्र वन विभाग के प्रबंधन के अधीन आ गए थे। ऊंट भूखे मर रहे थे।"

जब दुनिया के दूसरे देशों की तुलना करें तो तस्वीर और साफ हो जाती है। केन्या में 11 लाख ऊंट हैं, सोमालिया में 9.88 लाख। यहां तक कि संयुक्त अरब अमीरात में भी करीब 80,000 ऊंट हैं। भारत की हिस्सेदारी वैश्विक ऊंट उत्पादन में सिर्फ 0.2 फीसदी रह गई है। (स्रोत: FAOSTAT, 2022)

भंवरलाल देवासी
भंवरलाल देवासी


दिलचस्प बात यह है कि जहां भारत में ऊंटों की संख्या घट रही है, वहीं अफ्रीकी देशों में इनकी स्थिति बेहतर हुई है। चाड में ऊंटों की आबादी 1980 में 10 लाख से कम थी, जो 2022 तक बढ़कर 82.8 लाख हो गई। केन्या में भी 2000 के दशक में तेजी से वृद्धि देखी गई। इन देशों ने ऊंट को जलवायु परिवर्तन के दौर में टिकाऊ पशुधन के रूप में अपनाया। सोमालिया और केन्या में ऊंटनी का दूध मुख्य आहार है और इसका मजबूत बाजार है। जबकि भारत में यह अभी भी नया और सीमित है। (स्रोत: FAOSTAT)

रायका समुदाय: ऊंट का पर्याय

भंवरलाल देवासी रायका समुदाय से आते हैं। उनके लिए ऊंट सिर्फ जानवर नहीं, परिवार का हिस्सा है। वे कहते हैं, "रायका की उत्पत्ति ही ऊंटनी के कारण हुई है। जब माता पार्वती ने ऊंट का आकार बनाया और भोलेनाथ ने उसमें प्राण फूंके, तब उन्होंने अपने शरीर की मलेटी से रायका को पैदा किया और ऊंट की देखभाल का जिम्मा सौंपा।"

यह सिर्फ पौराणिक कथा नहीं, यह रायका समुदाय की पहचान है। ऊंट उनकी आत्मा है। भंवरलाल कहते हैं, "ऊंट का ग्वाला चार दिन भूखा रह सकता है, बारिश में भीग सकता है, ठंड में ठिठुर सकता है, लेकिन वह उन्हें छोड़ना नहीं चाहता।"

भंवरलाल ऊंट की खासियत बताते हुए कहते हैं, "हमारी भाषा में कहावत है कि ऊंट और बकरी अकाल के गहने हैं। अकाल पड़ने पर भी वे कटीली झाड़ियां खाकर अपने मालिक और परिवार को पाल सकते हैं। वे अकाल में मरते नहीं हैं, जबकि गाय और भैंस बिना चारे के जीवित नहीं रह सकते।" यही वजह है कि ऊंट को क्लाइमेट रेजिलिएंट यानी जलवायु-सहनशील जानवर माना जाता है। कम पानी में, भीषण गर्मी में, सूखे में भी ये जिंदा रह सकते हैं और अपने मालिकों को सहारा दे सकते हैं।

रायका समुदाय में ऊंटनी का दूध बेचना या ऊंट का वध करना पूर्ण वर्जित था। वे कहते थे, "ऊंटनी का दूध बेचना अपने बेटों को बेचने जैसा है।" लेकिन समय ने उन्हें इस परंपरा को बदलने पर मजबूर कर दिया।

जब विकास विनाश बन गया

ऊंटों के पतन की कहानी कई कारणों से बुनी गई है।

मशीनीकरण की मार: पहले ऊंट खेती, पानी ढोने, सवारी और शादी-ब्याह में काम आते थे। ट्रैक्टर, डीजल पंप और मोटरगाड़ियों ने ऊंटों को बेकार बना दिया। भंवरलाल याद करते हैं, "पहले कुओं से ऊंट ही पानी खींचते थे। अब ट्यूबवेल आ गए। ऊंटों का उपयोग खेती, पानी ढोने, सवारी और सामाजिक कार्यों में होता रहा है। लेकिन अब समय बदलने के साथ और नए साधनों के आने से ऊंटों का महत्व कम हो गया है।"

चारागाह का गायब होना: इंदिरा गांधी नहर परियोजना ने रेगिस्तान को सिंचित जमीन में बदल दिया। जहां ऊंट चरते थे, वहां अब सरसों और कपास उगते हैं। कुंभलगढ़ वन्यजीव अभयारण्य जैसी जगहों पर ऊंटों को चराने पर पाबंदी लग गई। सोलर एनर्जी प्रोजेक्ट्स ने बड़े इलाके घेर लिए। भंवरलाल कहते हैं, "50 ऊंटों के झुंड के साथ घूमना बहुत मुश्किल हो गया है। हर जगह बाड़ लगी है।"

डॉ. इल्से ने समस्या की गंभीरता बताते हुए गाँव कनेक्शन से बताया कि, "बहुत सारी भूमि जो पहले चराई के लिए खुली थी, अब अन्य उद्देश्यों के लिए उपयोग की जा रही है। इसकी शुरुआत जंगल में ऊंटों को चराने के उनके अधिकारों के छिनने से हुई, जो उनके पास महाराजाओं के समय में थे। महाराजाओं को अर्थव्यवस्था के लिए ऊंटों के महत्व का एहसास था, इसलिए उन्होंने उन्हें चराई के विशेषाधिकार दिए थे। इन्हें फिर 2000 के आसपास समाप्त कर दिया गया।"

Dr. Ilse
Dr. Ilse


पर्यावरणीय बदलाव ने भी मुश्किलें बढ़ाई हैं। प्रोसोपिस जूलीफ्लोरा (Prosopis Juliflora) जैसी आक्रामक प्रजातियों ने देसी वनस्पति को नष्ट कर दिया है। यह कांटेदार झाड़ी ऊंटों के लिए हानिकारक है। इसके बीज और पत्तियां खाने से ऊंटों को पाचन संबंधी समस्याएं होती हैं, दांतों में खराबी आती है और शरीर में पोषक तत्वों को सोखने की क्षमता कम हो जाती है। देसी चारे की कमी ने ऊंट पालन को और मुश्किल बना दिया है। (स्रोत: ICAR-CAZRI; Geoforum, 2024)

कानून का विरोधाभास: 2014 में राजस्थान सरकार ने ऊंट को राज्य पशु घोषित किया। 2015 में राजस्थान ऊंट अधिनियम, 2015 बनाया गया, जिसमें ऊंटों का वध और राज्य के बाहर ले जाना प्रतिबंधित कर दिया गया। उद्देश्य था ऊंट को बचाना, लेकिन नतीजा उल्टा हुआ।

डॉ. इल्से इस विरोधाभास को समझते हुए कहती हैं कि "2000 के दशक की शुरुआत में, यह स्पष्ट था कि पुष्कर मेले के ऊंट वास्तव में मांस के लिए वध के लिए जा रहे थे, जो रायका के लिए आय का एक अच्छा स्रोत था। लेकिन यह उनकी पारंपरिक नैतिकता के खिलाफ था क्योंकि रायका ने कभी भी मांस के लिए ऊंटों का उपयोग नहीं किया। फिर 2014 में सरकार ने कानून लागू किया। इसका उद्देश्य ऊंट को बचाना था, लेकिन वास्तव में इसका उल्टा असर हुआ क्योंकि अब कोई भी नर ऊंटों को काम करने वाले जानवरों के रूप में नहीं खरीद रहा था।"

भंवरलाल ने भारी आवाज़ में कहा कि, "सरकार ने ऊंटों के बाहर जाने पर पाबंदी लगा दी, जिससे व्यापार रुक गया। व्यापारी और मेले बंद होने से हमारी आत्मा दुखी हो गई है।"

दूध का बाजार न होना: पहले दूध के लिए ऊंट नहीं पाले जाते थे। लेकिन जब बाकी सब रास्ते बंद हो गए, तो यही एक विकल्प बचा। सरकारी डेयरियां ऊंटनी का दूध खरीदती हैं, लेकिन सिर्फ 20 रुपये प्रति लीटर देती हैं क्योंकि वे चर्बी के आधार पर भुगतान करती हैं और ऊंटनी के दूध में चर्बी कम होती है।

डॉ. इल्से कहती हैं, "दूध के लिए ऊंटों के उपयोग की भी कोई परंपरा नहीं थी। वास्तव में रायका में दूध की बिक्री भी वर्जित थी। लेकिन हमने इसे एकमात्र विकल्प के रूप में देखा। केवल तभी जब रायका को ऊंट पालने से कुछ आय होगी, तभी ऊंट बचेगा।"

उम्मीद की किरण: डॉ. इल्से का मिशन

भंवरलाल कहते हैं, "डॉ. इल्से के आने के बाद काफी बदलाव आए हैं। पहले जंगल में पशुओं के जाने पर पाबंदी थी और ऊंटनी का दूध बिकता नहीं था। तब लोगों ने ऊंटों को बेचना शुरू कर दिया था या वे बीमारी से मरने लगे थे।"

डॉ. इल्से ने रायका समुदाय के साथ मिलकर कई मोर्चों पर काम शुरू किये जैसे सबसे पहले उन्होंने ऊंटों के इलाज के लिए पशु चिकित्सा दवाएं खरीदीं और कैंप आयोजित करवाए। उन्होंने 'लोकहित पशु-पालक संस्थान' के माध्यम से चराई के मुद्दों को उठाया। डॉ. इल्से कहती हैं, "हमने जंगल में चराई के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी।" रायका समाज से आने वाले 40 वर्षीय भाटी लाल बताते हैं कि, "उन्होंने जंगल में चराई के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी, जिससे अब स्थितियां बेहतर हैं।"

डॉ इल्से ने ऊंटनी के दूध को लोकप्रिय बनाने की पूरी कोशिश की। वे कहती हैं, "वैश्विक स्तर पर ऊंटनी का दूध एक बड़ा मुद्दा है। इसके स्वास्थ्य प्रभावों के लिए इसे बहुत महत्व दिया जाता है। यह ऑटिस्टिक बच्चों के लिए अच्छा है, कुछ लोग मानते हैं कि यह कैंसर के लिए अच्छा है, यह ऑटोइम्यून बीमारियों, अस्थमा और मधुमेह के लिए अच्छा है।"

भंवरलाल बताते हैं, "डॉ. इल्से ने हमें ऊंट रखने के लिए प्रोत्साहित किया और कहा कि आप ऊंटनी का दूध बेचें, मैं आपके साथ हूँ। उन्होंने हमसे 60 रुपये प्रति लीटर की दर से दूध खरीदना शुरू किया। हमें एक नई उम्मीद मिली है। पहले जहां दूध बिल्कुल नहीं बिकता था, वहां अब अच्छी कीमत मिल रही है।"

डॉ. इल्से ने पनीर, घी, साबुन और यहां तक कि ऊंट के गोबर से कागज भी बनाया है। वे कहती हैं, "वर्तमान में हम ऊंटनी के दूध का बाजार बनाने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। हम पूरे भारत में फ्रोजन दूध भेज रहे हैं। हमने पनीर की एक श्रृंखला भी विकसित की है। हमारे पास बहुत अच्छा फेटा पनीर और क्रीम पनीर है जिसे कुछ शीर्ष लक्जरी होटल जैसे उम्मेद भवन और ताज समूह हमसे खरीद रहे हैं।"

ऊंटनी के दूध में विटामिन सी गाय के दूध से तीन गुना ज्यादा होता है। डॉ. इल्से कहती हैं, "यह पूरी तरह से प्राकृतिक उत्पाद है क्योंकि ऊंट पारंपरिक ज्ञान के अनुसार 36 अलग-अलग प्रकार के पेड़ों और झाड़ियों को खाते हैं, जिनमें औषधीय प्रभाव होते हैं।"

भाटी लाल ने उम्मीद भरे अंदाज़ में गाँव कनेक्शन से बताया कि, "मेरे पिताजी के पास पहले 100 ऊंट थे, जो बाद में कम हो गए थे, लेकिन अब दूध की बिक्री शुरू होने के बाद मेरे पास फिर से 30-35 ऊंट हैं। लोगों में अब विश्वास जगा है कि हमारा पारंपरिक व्यवसाय और नस्ल बची रहेगी।"

ऊंटों का भविष्य कैसा होगा?

डॉ. इल्से कहती हैं, "2024 में मुझे नारी शक्ति पुरस्कार मिला। मैं खुश हूं कि इस काम को पहचाना जा रहा है। लेकिन ध्यान मुझ पर नहीं होना चाहिए, क्योंकि मैं तो बस एक माध्यम हूं। यह उन लोगों का काम है जो ऊंटों की देखभाल करते हैं। यह 24 घंटे का काम है और भयानक मौसम में भी करना पड़ता है।"

वे चाहती हैं कि सरकार पूरे राजस्थान में ऊंटनी के दूध के संग्रह की व्यवस्था बनाए। उनका सपना है: "मेरी दूसरी आकांक्षा पूरे राजस्थान में ऊंटनी के दूध के संग्रह के लिए एक विकेन्द्रीकृत प्रणाली बनाने की है। ऊंटनी के दूध में आयरन और विटामिन सी बहुत अधिक होता है, जो एनीमिया से पीड़ित महिलाओं और बच्चों के लिए बहुत फायदेमंद हो सकता है।"

2026 को 'इंटरनेशनल ईयर ऑफ रेंजलैंड एंड पेस्टोरलिस्ट्स' घोषित किया गया है। यह एक मौका है जब दुनिया मोबाइल पशुपालन के पारिस्थितिक लाभों को समझे।

भंवरलाल की आंखों में अब भी उम्मीद है। वे कहते हैं, "पहले जब कुछ नहीं था, तब ऊंट और घोड़े ही काम आते थे। अकाल में भी ऊंटनी का दूध पीकर लोग जिंदा रहते थे और इन्हे बचाना जरूरी है।"

जलवायु परिवर्तन के इस दौर में जब सूखा, गर्मी और पानी की कमी बढ़ रही है, ऊंट जैसे क्लाइमेट रेजिलिएंट जानवर की अहमियत और बढ़ जाती है। अफ्रीकी देशों ने इसे समझा और अपनाया। क्या भारत भी यह सबक सीख पाएगा?

रेगिस्तान का जहाज डूब रहा है। लेकिन अगर डॉ. इल्से जैसे समर्पित लोग और भंवरलाल जैसे पारंपरिक पालक मिलकर काम करें, सरकार सही नीतियां बनाए, और समाज इस धरोहर की कीमत समझे, तो शायद यह जहाज फिर से तैर सके। आखिरकार, यह सिर्फ एक जानवर को बचाने का सवाल नहीं है। यह एक संस्कृति, एक समुदाय और रेगिस्तान की पहचान को बचाने का सवाल है और शायद, बदलती जलवायु में हमारे भविष्य को बचाने का भी।
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