Climate Crisis : नेपाल और भारत में आई विपदा के लिए जिम्मेदार कौन?

Dr SB Misra | Oct 05, 2026, 18:47 IST
नेपाल के प्रधानमंत्री ने जलवायु परिवर्तन की समस्या के लिए विकसित देशों को जिम्मेदार ठहराया है। उन्होंने कहा कि चीन और अमेरिका की गतिविधियों ने बाढ़ और जलवायु संकट को और बढ़ावा दिया है। तिब्बत में चीन के कब्जे का प्रभाव जलवायु पर गंभीर रूप से पड़ा है, जिसके चलते ग्लेशियरों का पिघलना और जल की स्थिति प्रभावित हुई, जिससे नेपाल में बाढ़ आई।

नेपाल के प्रधानमंत्री का सोचना है कि चीन और अमेरिका जैसे विकसित देश उनके नुकसान की भरपाई करें, उन्हें दान के रूप में कुछ भी नहीं चाहिए। यह तो अब सभी जान गए हैं कि बाढ़ भूस्खलन और तबाही की जड़ में तिब्बत क्षेत्र है, लेकिन तिब्बत का क्षेत्र जिसे एशिया की छत कहा जाता था, वह प्राकृतिक ढंग से ग्लेशियर और बर्फ की झीलों के रूप में प्राकृतिक ढंग से जल संचय का एक बड़ा क्षेत्र रहा है। सोचने की बात है कि प्रकृति ने जो पानी बर्फ के रूप में मानव जाति के लिए संचित और सुरक्षित रखा था, वे ग्लेशियर और बर्फ की झील क्यों पिघलने लगे और अचानक भयंकर तबाही का रूप क्यों ले रहे हैं? जो तिब्बत शांतप्रिय बौद्ध धर्म का क्षेत्र था, दुनिया को शांति का संदेश देता था, उसकी अशांति का आरंभ शायद 1951 में हुआ, जब ये क्षेत्र चीन के कब्जे में आ गया।



1950 के पहले तक भारत और चीन के बीच में तिब्बत का पठार एक बफर जोन की तरह मौजूद था। जब चीन ने तिब्बत पर कब्जा कर लिया, तो एक प्रकार से भारत और चीन की सीमाएं एक हो गईं, जिससे कालांतर में कठिनाई भी हुई। मैं समझता हूं तिब्बत एक बौद्ध क्षेत्र था, शांति का इलाका था, और दलाई लामा की चलती तो वह भारत के साथ मिलना पसंद करते, लेकिन जवाहरलाल नेहरू ने ऐसा कोई प्रयास भी नहीं किया। उल्टे चीन के पक्ष में अपना रूप रखा, नतीजा यह हुआ कि दलाई लामा ने चीन का आधिपत्य बहुत दबाव में स्वीकार किया। जब चीन का कब्जा हो गया तिब्बत पर तो दलाई लामा और दूसरे लामा संतो को बेहद कठिनाई का सामना करना पड़ा, हजारों की संख्या में लामा शरणार्थी भारत आने लगे। संभव है उनमें से कुछ ने चीनी शासन के विषय में बातें भी कहीं हों, जिससे चाउ एन लाइ, जो उस समय चीन के प्रधानमंत्री थे, और जवाहरलाल नेहरू के मित्र थे, हिंदी चीनी भाई-भाई का नारा लगाने वाले शासक ने भारत को तिरछी नजर से देखना आरंभ किया। इसका परिणाम हुआ कि 1962 में भारत और चीन युद्ध में भारत को बहुत ही शर्मनाक पराजय झेलनी पड़ी और नेहरू को बहुत ही पीड़ा हुई थी।



तिब्बत का भूभाग चीन के कब्जे में आने के बाद 1951 से 1962 की अवधि में चीन ने उस क्षेत्र में तमाम गतिविधियां आरंभ कर दीं। भारतीय सीमाओं के किनारे सड़कें बनाना, कल कारखाने खोलना, थर्मल पावर स्टेशन बनाना और न जाने कितने औद्योगिक प्रतिष्ठान बनाने आरंभ कर दिए। इन सब का परिणाम था जलवायु परिवर्तन का असर, जिसके फलस्वरुप युगों से मौजूद झीलों और घाटियों में बर्फ के रूप में जो जल संचय हुआ था, वह प्रभावित होने लगा।



नेपाल के प्रधानमंत्री ने जब चीन और अमेरिका को जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार बताया, तो यह बात आंशिक रूप से सत्य है, क्योंकि चीन और अमेरिका ही अकेले जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार नहीं है। दूरस्थ देशों की गतिविधियों का उतना अधिक तिब्बती क्षेत्र पर नहीं होगा, जितना चीनी गतिविधियों का प्रभाव पड़ेगा। झीलों के तटबंध टूट गए और अथाह मात्रा में पानी नेपाल की नदियों में पहुंचा, जो अंततः भारत में भी आया और इस पानी के कारण नेपाल तबाह हो गया। कहते है कि चीन ने नेपाल को चेतावनी दी थी लेकिन विलम्ब से। वैसे तो औद्योगिक रूप से विकसित देशों द्वारा की जाने वाली गतिविधियों का जलवायु परिवर्तन में बड़ा योगदान रहता है, लेकिन भारत का इसमें योगदान आबादी को देखते हुए बहुत कम है। जब नेपाल के प्रधानमंत्री ने बाढ़ की विभीषिका के कारण आई तबाही के लिए दुनिया के देशों से अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए मुआवजा देने की बात कही, तो उसके पीछे यही भाव था कि जलवायु परिवर्तन के लिए जो देश अधिक जिम्मेदार हैं, जिनसे धरती की जलवायु बदल रही है, उन्हें नुकसान की जिम्मेदारी लेनी चाहिए।



जलवायु परिवर्तन के कारण भारत के उत्तर में ग्लेशियर पिघलने से नेपाल और भारत की नदियों में आने से बाढ़ की विभीषिका तो आई, लेकिन दुनिया के दूसरे देशों में अन्य गतिविधिओं के कारण से कहीं अतिवृष्ट, तो कहीं अनावृष्टि और कहीं सूखा, यह सब भी हो रहा है। औद्योगिक प्रतिष्ठानों से निकली हुई हानिकारक गैसों के उत्सर्जन के कारण केवल वायुमंडल में गैसों का अनुपात बदल रहा है, बाकी जो दूसरे भी जीवनोपयोगी उपयोगी तत्व हैं, फिर चाहे हवा हो पानी मिट्टी और सूर्य पर भी प्रभाव पड़ रहा है, जिससे मानव जाति का अस्तित्व ही संकट में आ सकता है।



अब तो हम सभी लोग बदलती जलवायु के प्रभाव को महसूस कर रहे हैं और देखने में आता है कि जो ऋतुएं सर्दी गर्मी और वर्षा की होती थीं, उन्होंने अपना धर्म बदल लिया है। कभी अति गर्मी तो कहीं पर अति ठंडक, कभी समय से पहले और कभी समय के बाद में ठंडक का मौसम आता है, धरती का तापमान प्रति वर्ष थोड़ा-थोड़ा बढ़ रहा है, जिसे ग्लोबल वार्मिंग की संज्ञा दी जाती है। इस सबका स्वास्थ्य पर तो प्रभाव पड़ता ही है, वातावरण विशेष कर जो क्षिति, जल, पावक, गगन और समीर का संतुलित व्यवहार है, वह भी प्रभावित होता है। यदि पहाड़ों पर जमी हुई बर्फ का पिघलना ग्लेशियर का सिकुड़ते जाना और अधिक अधिक पानी समुद्र में भरते रहना जारी रहा, तो समुद्र का जलस्तर बढ़ सकता है और तटीय शहरों के जलमग्न होने की नौबत आ सकती है।



जलवायु परिवर्तन के मुख्य कारण में आती हैं ग्रीन हाउस गैस। जिनकी वजह से पृथ्वी की गर्मी निकल नहीं पाती और सूरज की गर्मी तो आती रहती है। इसका परिणाम यह होता है कि पृथ्वी का तापमान धीरे-धीरे बढ़ता रहता है, और तापमान बढ़ने का असर जन स्वास्थ्य, पशु-पक्षी और वनस्पति आदि सभी पर पड़ता है। एक बड़ी समस्या है, पेड़ों का अंधाधुंध कटान, जंगलों का नष्ट होना और उस पर खेती करना, जिससे पृथ्वी पर कार्बन डाइऑक्साइड पैदा होती है, वह पेड़ पौधों द्वारा अपने भोजन के लिए प्रयोग कर ली जाती थी अब उतना नहीं हो पाएगी।



पुराने समय में पेड़ लगाना एक धार्मिक कार्य समझा जाता था, और बड़ी मात्रा में बाग-बगीचे लगाए जाते थे, जिससे कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा नियंत्रित रहती थी और ऑक्सीजन की मात्रा घट नहीं पाती थी। जो ओजोन परत में छिद्र करती है, एयर कंडीशनर और रेफ्रिजरेटर भी क्लोरो क्लोरो कार्बन जैसी हानिकारक गैस छोड़ते हैं, जो ओजोन की मात्रा को घटाती है, वास्तव में ओजोन ऑक्सीजन का एक स्रोत है, जिसे घटना नहीं चाहिए और वह धरती के ऊपर एक कवच जैसा है जो सूरज से आने वाली अल्ट्रावायलेट किरणों को रोकती है। इसलिए बड़ी मात्रा में जलवायु परिवर्तन के लिए स्वयं मनुष्य जिम्मेदार है। यदि हम पहाड़ों पर ग्लेशियर के रूप में जमे हुए पानी को बचाए रखना चाहते हैं, और समुद्र तल को स्थिर रखना चाहते हैं, तटीय शहरों को डूबने से बचना चाहते हैं, तो जलवायु परिवर्तन को बिगड़ने वाले काम रोकने होंगे। इस विषय पर हमारे देशवासियों में ही नहीं बल्कि विश्व के नागरिकों में भी जितनी अधिक चेतना आएगी उतना ही जनकल्याण हो सकेगा। इस जानकारी को जलवायु परिवर्तन क्यों और कैसे हो रहा है विद्यालयों में पाठ्य पुस्तकों के माध्यम से रेडियो टीवी और अखबारों के माध्यम से तथा ग्राम पंचायत के माध्यम से प्रचारित किया जाना चाहिए। यदि नहीं तो हम अंधकार में भटकते रहेंगे और विनाश धीरे-धीरे हमारी तरफ आता रहेगा।

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