By Dr SB Misra
देश के विकास में सत्ता और विपक्ष की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। संसद का सुचारू रूप से चलाने के लिए संसद का संचालन देशहित में जरूरी है। लेकिन वर्तमान में राजनीतिक कड़वाहट बढ़ी है, जैसे विपक्ष सरकार पर अमेरिका को देश बेचने का आरोप लगाता है, विदेश नीति पर भी विवाद बढ़ रहा है, स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव ध्वनि मत से खारिज हुआ। ऐसे में हमे सोटना होगा कि क्या पक्ष और विपक्ष
देश के विकास में सत्ता और विपक्ष की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। संसद का सुचारू रूप से चलाने के लिए संसद का संचालन देशहित में जरूरी है। लेकिन वर्तमान में राजनीतिक कड़वाहट बढ़ी है, जैसे विपक्ष सरकार पर अमेरिका को देश बेचने का आरोप लगाता है, विदेश नीति पर भी विवाद बढ़ रहा है, स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव ध्वनि मत से खारिज हुआ। ऐसे में हमे सोटना होगा कि क्या पक्ष और विपक्ष
By Dr SB Misra
सरकारें मुफ्त की योजनाओं से लोगों को भिखारी बना रही हैं। इससे देश की उत्पादकता घट रही है और युवा आलसी हो रहे हैं। चीन ने खुद को जगाकर तरक्की की। भारत की पार्टियां वोट के लिए खैरात बांटकर प्रजातंत्र को कमजोर कर रही हैं। रोजगार और स्वावलंबन पर ध्यान देना जरूरी है।
सरकारें मुफ्त की योजनाओं से लोगों को भिखारी बना रही हैं। इससे देश की उत्पादकता घट रही है और युवा आलसी हो रहे हैं। चीन ने खुद को जगाकर तरक्की की। भारत की पार्टियां वोट के लिए खैरात बांटकर प्रजातंत्र को कमजोर कर रही हैं। रोजगार और स्वावलंबन पर ध्यान देना जरूरी है।
By Dr SB Misra
हर साल की तरह इस साल भी 14 फरवरी को वैलेंटाइन-डे मनाया जा रहा है। छत्तीसगढ़ सरकार ने वैलेंटाइन-डे को मातृ-पितृ दिवस के रूप में मनाने की बात कही थी। यह तर्कसंगत नहीं लगता, क्योंकि वैलेंटाइन-डे मूलतः स्त्री-पुरुष संबंधों पर आधारित अवसर है, चाहे शादी ब्याह करके या उसके बिना भी। औपचारिक संबंध जरूरी नहीं। पश्चिम में लोग इसे ‘रोमांटिक लव’ का दिन कहते हैं।
हर साल की तरह इस साल भी 14 फरवरी को वैलेंटाइन-डे मनाया जा रहा है। छत्तीसगढ़ सरकार ने वैलेंटाइन-डे को मातृ-पितृ दिवस के रूप में मनाने की बात कही थी। यह तर्कसंगत नहीं लगता, क्योंकि वैलेंटाइन-डे मूलतः स्त्री-पुरुष संबंधों पर आधारित अवसर है, चाहे शादी ब्याह करके या उसके बिना भी। औपचारिक संबंध जरूरी नहीं। पश्चिम में लोग इसे ‘रोमांटिक लव’ का दिन कहते हैं।
By Dr SB Misra
भले ही कबीर जीवन भर हिन्दू और मुसलमानों को फटकारते रहे, लेकिन अंत में दोनों ही उनका अंतिम संस्कार करना चाहते थे। पता नहीं कहाँ तक सही है, जब चादर उठाई गई तो उसके नीचे केवल फूल निकले। उन्हें हिन्दू और मुसलमानों ने आपस में बाँटकर अपने-अपने ढंग से संस्कार किया। वह न हिन्दू थे और न मुसलमान, वह थे बस एक अच्छे इंसान। सेकुलरवाद को बचाने के लिए कबीर को और निकटता से समझना और समझाना होगा।
भले ही कबीर जीवन भर हिन्दू और मुसलमानों को फटकारते रहे, लेकिन अंत में दोनों ही उनका अंतिम संस्कार करना चाहते थे। पता नहीं कहाँ तक सही है, जब चादर उठाई गई तो उसके नीचे केवल फूल निकले। उन्हें हिन्दू और मुसलमानों ने आपस में बाँटकर अपने-अपने ढंग से संस्कार किया। वह न हिन्दू थे और न मुसलमान, वह थे बस एक अच्छे इंसान। सेकुलरवाद को बचाने के लिए कबीर को और निकटता से समझना और समझाना होगा।
By Dr SB Misra
भारत ही नहीं, दुनिया के कई देशों में आज नौजवान उद्दंडता, विद्रोह और अनुशासनहीनता की राह पर दिखाई दे रहे हैं। बेरोज़गारी, दिशाहीन शिक्षा, सामाजिक संस्कारों का अभाव और उचित मार्गदर्शन न मिलना, युवा ऊर्जा को रचनात्मक के बजाय विध्वंसक बना रहा है।
भारत ही नहीं, दुनिया के कई देशों में आज नौजवान उद्दंडता, विद्रोह और अनुशासनहीनता की राह पर दिखाई दे रहे हैं। बेरोज़गारी, दिशाहीन शिक्षा, सामाजिक संस्कारों का अभाव और उचित मार्गदर्शन न मिलना, युवा ऊर्जा को रचनात्मक के बजाय विध्वंसक बना रहा है।
By Dr SB Misra
नोटबंदी को काले धन पर निर्णायक प्रहार बताया गया था, लेकिन क्या यह वास्तव में अपने उद्देश्य में सफल रही? यह लेख पड़ताल करता है कि कैसे काला धन केवल नोटों में नहीं, बल्कि ज़मीन, संपत्ति, सोना, राजनीति और विदेशों में छिपा रहा।
नोटबंदी को काले धन पर निर्णायक प्रहार बताया गया था, लेकिन क्या यह वास्तव में अपने उद्देश्य में सफल रही? यह लेख पड़ताल करता है कि कैसे काला धन केवल नोटों में नहीं, बल्कि ज़मीन, संपत्ति, सोना, राजनीति और विदेशों में छिपा रहा।
By Dr SB Misra
अटल बिहारी वाजपेयी सिर्फ़ एक प्रधानमंत्री नहीं थे, बल्कि भारतीय राजनीति में संवाद, सहिष्णुता और नैतिक साहस की दुर्लभ मिसाल थे। छात्र जीवन में साम्यवादी संगठन से लेकर संघ, जनसंघ, जनता पार्टी और अंततः भाजपा तक उनका सफ़र विचारधाराओं की जकड़न से ऊपर मानवीय मूल्यों की खोज है।
अटल बिहारी वाजपेयी सिर्फ़ एक प्रधानमंत्री नहीं थे, बल्कि भारतीय राजनीति में संवाद, सहिष्णुता और नैतिक साहस की दुर्लभ मिसाल थे। छात्र जीवन में साम्यवादी संगठन से लेकर संघ, जनसंघ, जनता पार्टी और अंततः भाजपा तक उनका सफ़र विचारधाराओं की जकड़न से ऊपर मानवीय मूल्यों की खोज है।
By Dr SB Misra
ग्रामीण भारत की जल-व्यवस्था कभी सामुदायिक तालाबों और कुओं पर टिकी थी। आज वही संरचनाएँ उपेक्षा और अतिक्रमण का शिकार हैं। अगर गाँवों की जल-धरोहर बचाई जाए, तो देश के जल संकट से निपटा जा सकता है।
ग्रामीण भारत की जल-व्यवस्था कभी सामुदायिक तालाबों और कुओं पर टिकी थी। आज वही संरचनाएँ उपेक्षा और अतिक्रमण का शिकार हैं। अगर गाँवों की जल-धरोहर बचाई जाए, तो देश के जल संकट से निपटा जा सकता है।
By Dr SB Misra
भारत की खेती 10,000 साल पुरानी है, लेकिन आज किसान अपने ही खेत में असहाय खड़ा है। कैसे विकास के गलत मॉडल, रसायनिक खेती और नीतिगत खैरात ने किसान को आत्मनिर्भर से आश्रित बना दिया।
भारत की खेती 10,000 साल पुरानी है, लेकिन आज किसान अपने ही खेत में असहाय खड़ा है। कैसे विकास के गलत मॉडल, रसायनिक खेती और नीतिगत खैरात ने किसान को आत्मनिर्भर से आश्रित बना दिया।
By Dr SB Misra
गाँव में आज भी चिकित्सा व्यवस्था संतोषजनक नहीं है। 70% आबादी गाँवों में रहती है, लेकिन डॉक्टरों का सिर्फ़ 26% हिस्सा वहां उपलब्ध है। अस्पतालों की कमी, दवाइयों का अभाव, झोलाछाप डॉक्टरों का बोलबाला और तेजी से बढ़ती शहरी बीमारियां, ग्रामीण स्वास्थ्य को बड़ी चुनौती के रूप में खड़ी कर रही हैं।
गाँव में आज भी चिकित्सा व्यवस्था संतोषजनक नहीं है। 70% आबादी गाँवों में रहती है, लेकिन डॉक्टरों का सिर्फ़ 26% हिस्सा वहां उपलब्ध है। अस्पतालों की कमी, दवाइयों का अभाव, झोलाछाप डॉक्टरों का बोलबाला और तेजी से बढ़ती शहरी बीमारियां, ग्रामीण स्वास्थ्य को बड़ी चुनौती के रूप में खड़ी कर रही हैं।