Dairy Animal Health: दूध उत्पादन बचाना है तो जानिए डेयरी पशुओं की इन खतरनाक बीमारियों के बारे में
Gaon Connection | Mar 02, 2026, 14:56 IST
डेयरी पशुओं में होने वाली बीमारियाँ पशुपालक की कमाई और पशु की जिंदगी दोनों के लिए बड़ा खतरा हैं। खुरपका-मुँहपका, गलघोटू और लंगड़ा बुखार जैसी छूत की बीमारियाँ देखते ही देखते पूरे झुंड में फैल सकती हैं। ब्याने के बाद दुग्ध ज्वर और कीटोसिस जैसी कमजोरी की बीमारियाँ पोषण की कमी से जन्म लेती हैं। थनैला रोग दूध उत्पादन को सबसे ज्यादा नुकसान पहुँचाता है। इन सबसे बचाव के लिए समय पर टीकाकरण, साफ-सुथरा वातावरण और संतुलित खुराक ही सबसे बड़ा हथियार है।
Animal Health Tips
पशुओं का स्वास्थ्य डेयरी व्यवसाय की असली नींव है। अगर पशु बीमार पड़े तो दूध उत्पादन गिरता है, इलाज में पैसे जाते हैं और कभी-कभी पशु की जान भी चली जाती है। इसलिए हर पशुपालक को बीमारियों की पहचान और बचाव के उपाय पता होने चाहिए।
कुछ बीमारियाँ बहुत खतरनाक होती हैं और पशु की जान जल्दी ले सकती हैं। इनसे बचाव का सबसे अच्छा तरीका है समय पर टीकाकरण।
खुरपका-मुँहपका रोग (FMD):
यह वायरस से फैलने वाली छूत की बीमारी है। इसमें पशु के मुँह, जीभ और खुरों के बीच छाले पड़ जाते हैं और मुँह से लार टपकती है। इसका पक्का इलाज नहीं है, केवल लक्षणों से राहत दी जाती है। बचाव के लिए 4 महीने से बड़े पशुओं को हर 6 महीने में टीका जरूर लगवाएं।
गलघोटू (Hemorrhagic Septicemia):
यह बरसात के मौसम में बैक्टीरिया से होने वाली बीमारी है। पशु के गले में सूजन आ जाती है और उसे सांस लेने में बहुत तकलीफ होती है। लक्षण दिखने के बाद मृत्यु दर बहुत ज्यादा होती है। इसलिए हर साल मानसून आने से पहले टीकाकरण जरूरी है।
लंगड़ा बुखार (Black Quarter):
इस बीमारी में पशु की जांघों या भारी मांसपेशियों में गर्म और दर्दनाक सूजन आ जाती है। दबाने पर चर-चर की आवाज आती है। यह बहुत तेजी से जानलेवा हो सकती है। प्रभावित इलाकों में साल में एक बार मानसून से पहले टीका लगवाएं।
ब्याने के तुरंत बाद पशु के शरीर को बहुत ज्यादा पोषक तत्वों की जरूरत होती है। अगर खुराक में कमी हो तो गंभीर बीमारियाँ हो सकती हैं।
दुग्ध ज्वर (Milk Fever):
खून में कैल्शियम की कमी से होता है। पशु खड़ा नहीं हो पाता और गर्दन एक तरफ मोड़कर बैठा रहता है। पशु चिकित्सक से नसों के जरिये कैल्शियम चढ़वाने पर पशु जल्दी ठीक हो जाता है। गाभिन पशु को सही खुराक देते रहें।
कीटोसिस (Ketosis):
यह ऊर्जा की कमी से होता है। पशु का वजन तेजी से कम होता है और दूध भी घट जाता है। गर्भावस्था के आखिरी हफ्तों में संतुलित और पोषण से भरपूर आहार देने से इससे बचा जा सकता है।
थनैला बीमारी दूध की मात्रा और गुणवत्ता दोनों को बर्बाद कर देती है। इसमें थन में सूजन आती है, दर्द होता है और दूध में थक्के या खून आ सकता है। कभी-कभी कोई बाहरी लक्षण नहीं दिखता, जिसे सब-क्लीनिकल थनैला कहते हैं। यह और भी खतरनाक है क्योंकि पता ही नहीं चलता।
उपचार: लक्षण दिखते ही 2-3 घंटे के भीतर पशु चिकित्सक से मिलें। बचाव: दूध निकालने से पहले और बाद में थनों को साफ पानी या रोगाणुनाशक घोल से धोएं। दूध दुहने के उपकरण साफ रखें और रोज थनों की जांच करें।
आफरा (Bloat):
गीला हरा चारा या अचानक ज्यादा अनाज खाने से पशु के पेट में गैस भर जाती है। पशु का बायां पेट फूल जाता है और वह बेचैन रहता है। तत्काल राहत के लिए 300-500 मिली वनस्पति तेल या तारपीन का तेल पिलाएं। गंभीर हो तो फौरन डॉक्टर बुलाएं।
छोटी-मोटी बीमारियों के लिए कुछ पुराने और आजमाए हुए तरीके काम आते हैं:
-दस्त होने पर चाय की पत्ती को पानी में उबालकर अदरक के साथ पिलाने से आराम मिलता है।
-पेट के कीड़े नियमित डीवर्मिंग यानी कीड़े मारने की दवा जरूरी है, खासकर बछड़ों में।
-चमड़ी के रोग नीम का पेस्ट या तेल लगाने से फंगल इन्फेक्शन और बाहरी परजीवियों से बचाव होता है।
पशुओं को बीमारियों से बचाने का सबसे आसान सूत्र है सावधानी ही सुरक्षा है। संतुलित खुराक, साफ-सुथरा रहने की जगह और समय पर टीकाकरण ये तीन चीजें पशुपालक की सफलता की असली चाबी हैं। अगर पशु के व्यवहार में कोई बदलाव दिखे जैसे सुस्ती, चारा न खाना, दूध कम होना या असामान्य चाल तो देर मत करें। फौरन अपने नजदीकी पशु चिकित्सक से संपर्क करें। याद रखें, समय पर किया गया इलाज पशु की जान बचाता है और आपका नुकसान कम करता है।
1. टीका लगाकर रोकी जाने वाली बीमारियाँ
खुरपका-मुँहपका रोग (FMD):
यह वायरस से फैलने वाली छूत की बीमारी है। इसमें पशु के मुँह, जीभ और खुरों के बीच छाले पड़ जाते हैं और मुँह से लार टपकती है। इसका पक्का इलाज नहीं है, केवल लक्षणों से राहत दी जाती है। बचाव के लिए 4 महीने से बड़े पशुओं को हर 6 महीने में टीका जरूर लगवाएं।
गलघोटू (Hemorrhagic Septicemia):
यह बरसात के मौसम में बैक्टीरिया से होने वाली बीमारी है। पशु के गले में सूजन आ जाती है और उसे सांस लेने में बहुत तकलीफ होती है। लक्षण दिखने के बाद मृत्यु दर बहुत ज्यादा होती है। इसलिए हर साल मानसून आने से पहले टीकाकरण जरूरी है।
लंगड़ा बुखार (Black Quarter):
इस बीमारी में पशु की जांघों या भारी मांसपेशियों में गर्म और दर्दनाक सूजन आ जाती है। दबाने पर चर-चर की आवाज आती है। यह बहुत तेजी से जानलेवा हो सकती है। प्रभावित इलाकों में साल में एक बार मानसून से पहले टीका लगवाएं।
2. ब्याने के बाद होने वाली कमजोरी की बीमारियाँ
दुग्ध ज्वर (Milk Fever):
खून में कैल्शियम की कमी से होता है। पशु खड़ा नहीं हो पाता और गर्दन एक तरफ मोड़कर बैठा रहता है। पशु चिकित्सक से नसों के जरिये कैल्शियम चढ़वाने पर पशु जल्दी ठीक हो जाता है। गाभिन पशु को सही खुराक देते रहें।
कीटोसिस (Ketosis):
यह ऊर्जा की कमी से होता है। पशु का वजन तेजी से कम होता है और दूध भी घट जाता है। गर्भावस्था के आखिरी हफ्तों में संतुलित और पोषण से भरपूर आहार देने से इससे बचा जा सकता है।
3. थनैला रोग (Mastitis)
उपचार: लक्षण दिखते ही 2-3 घंटे के भीतर पशु चिकित्सक से मिलें। बचाव: दूध निकालने से पहले और बाद में थनों को साफ पानी या रोगाणुनाशक घोल से धोएं। दूध दुहने के उपकरण साफ रखें और रोज थनों की जांच करें।
4. जहरीली और अचानक होने वाली बीमारियाँ
गीला हरा चारा या अचानक ज्यादा अनाज खाने से पशु के पेट में गैस भर जाती है। पशु का बायां पेट फूल जाता है और वह बेचैन रहता है। तत्काल राहत के लिए 300-500 मिली वनस्पति तेल या तारपीन का तेल पिलाएं। गंभीर हो तो फौरन डॉक्टर बुलाएं।
5. घरेलू और देसी उपचार
-दस्त होने पर चाय की पत्ती को पानी में उबालकर अदरक के साथ पिलाने से आराम मिलता है।
-पेट के कीड़े नियमित डीवर्मिंग यानी कीड़े मारने की दवा जरूरी है, खासकर बछड़ों में।
-चमड़ी के रोग नीम का पेस्ट या तेल लगाने से फंगल इन्फेक्शन और बाहरी परजीवियों से बचाव होता है।
पशुओं को बीमारियों से बचाने का सबसे आसान सूत्र है सावधानी ही सुरक्षा है। संतुलित खुराक, साफ-सुथरा रहने की जगह और समय पर टीकाकरण ये तीन चीजें पशुपालक की सफलता की असली चाबी हैं। अगर पशु के व्यवहार में कोई बदलाव दिखे जैसे सुस्ती, चारा न खाना, दूध कम होना या असामान्य चाल तो देर मत करें। फौरन अपने नजदीकी पशु चिकित्सक से संपर्क करें। याद रखें, समय पर किया गया इलाज पशु की जान बचाता है और आपका नुकसान कम करता है।