Gaon Se: दादी की आवाज़ से पोते की ज़ुबान तक सफ़र करते हैं दीवान सिंह कनवाल के पहाड़ी गीत
Gaon Connection | Mar 20, 2026, 15:23 IST
सरकारी नौकरी से रिटायर होने के बाद दीवान सिंह कनवाल ने संगीत को अपना जीवन बना लिया। उन्होंने अभिनय भी किया और गाने गाए। कनवाल सिंह ने उत्तराखंड के लोक संगीत को डिजिटल माध्यमों से लोगों तक पहुंचाया। उनके गीत पीढ़ियों से चले आ रहे हैं और लोगों के दिलों को छूते हैं।
पहाड़ों के गीत with दीवान सिंह कनवाल
Retirement के बाद इंसान को क्या करना चाहिए? उम्र के एक पड़ाव पर पहुँचने के बाद अक्सर लोगों को यह ख्याल आने लग जाता है। यह चिंता सताने लग जाती है। उत्तराखंड के अल्मोड़ा में दीवान सिंह कनवाल ने इस चिंता को अपने पास नहीं आने दिया। सरकारी सेवा से retire होने के बाद वह अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा शौक, संगीत अपनाने वाले थे और धीरे धीरे संगीत ही नहीं अभिनय भी उन्होंने टटोला, फिल्मों में काम किया, गाने गाए और सबसे खूबसूरत बात यह कि उन्होंने उत्तराखंड के लोक संगीत को आगे बढ़ाया। सैकड़ों गाने गाकर और digital माध्यमों के जरिए लोगों तक पहुँचाकर। सेवानिवृत्त होने के बाद भी उत्तराखंड की संस्कृति की सेवा की।
"रूम झुमा जो ग्याड़ा ती सरी तू नौली रूम झुमा जो...
बोला मर बिना गोपाला तिल धारो बोला रूम झुमा"
ये सिर्फ बोल नहीं हैं, उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र की संस्कृति है। कुमाऊं, उत्तराखंड राज्य का वह क्षेत्र जहाँ लोक गीत सिर्फ गाए नहीं जाते बल्कि जिए जाते हैं। कुमाऊं के पहाड़ों में जन्मे लोक गीत सिर्फ सुर नहीं होते, वह धरती की अपनी आवाज होते हैं। कुमाऊंनी लोक गीत समय के साथ बदलते नहीं हैं। अपनों के साथ चलते हैं। पीढ़ियों से अपनी कहानियां सुनाते हुए जैसे पहाड़ों के बीच बहती कोई नदी जो रुकती नहीं, बस बहती रहती है। ऐसे हैं कुमाऊंनी लोक गीत। अल्मोड़ा के रहने वाले "दीवान सिंह कनवाल"इन गीतों को आवाज़ दे रहे हैं।
दीवान सिंह कनवाल बताते हैं, "लोक गीत हमारे लोक जीवन की परछाई है बस। हमारे लोक जीवन में जो घटता है, उसी में लोग लोक गीत बनते हैं। अब जैसे कोई, कोई आदमी जंगल में गाय भैंस चरा रहा है तो उसी को कहीं पर कोई ऐसी situation दिख गई कि उसी पर चार बोल फूट गए। वही बोल बाहर आकर फिर पूरा लोक गीत बन गया तो लोक गीत की संरचना ऐसी होती है।"
अल्मोड़ा जिले की खिली धूप में बैठकर एक गीतकार पहाड़ी संस्कृति को कागज़ पर उतारता है, जो बाद में गीत का रूप लेते हैं और सदियों तक लोगों की जुबां पर चढ़ जाते हैं। ऐसा जादू है दीवान सिंह कनवाल के गानों में। एक लोक गीतकार जो लोगों के भीतर चल रही धड़कनों को सुर देते हैं। उनका गाया हुआ हर गीत पहाड़ों की ठंडी हवा की तरह सीधे मन को छू जाता है। अपने गीतों के बारे में गाँव कनेक्शन को बताते हुए दीवान सिंह कहते हैं, "मेरे आप को जितने गाने मिलेंगे सब एक standard के बोल के हिसाब से मिलेंगे और उन गीतों के अंदर एक रिश्ता होगा जैसे हमारे परिवार में हमारी माँ है, बहन है, भाई है, पिताजी हैं और हमारे तीज है, त्योहार है, मेले हैं। वो हैं तो उनमें से एक subject उठा कर के हम उस पर अगर गीत लिखेंगे तो उसका साहित्य अलग होगा लिखने का।"
अल्मोड़ा के खतियाड़ी गाँव के रहने वाले दीवान सिंह कनवाल पिछले चालीस साल से लोक गीतों पर काम कर रहे हैं। अपने लोक गीतों को बचाए रखने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए दीवान सिंह को कई मंचों पर सम्मानित भी किया गया है। आज दीवान सिंह कहते हैं कि "अच्छा गीत वो है जो कानों से नहीं मन से सुना जाए।" उनके गीत सुनकर लोग ताली कम बजाते हैं लेकिन अंदर कहीं कुछ थिरकने लगता है। जैसे फिल्मी गानों की दुनिया तेज है। आज हिट, कल फ्लॉप। अब गाने trend बनते हैं, याद नहीं। लेकिन दीवान सिंह के लोक गीत पीढ़ियों तक गाए जाते हैं। दादी की आवाज से पोते की जुबान तक सफर करते हुए और कभी बूढ़े नहीं होते।
एक पहाड़ी गीत "द्वि दिना का डर से रुवा यो दुनी मैं" गुनगुनाते हुए कनवाल सिंह बताते हैं कि यह गीत यहाँ के 10 साल के लड़के को भी पसंद है और 80 साल के बुड्ढे को भी पसंद है। तो मेरा सबसे मुख्य उद्देश्य यही रहता है कि मेरे गीत को लोग सुनें, अच्छे लोग सुनें और ज्यादा दिन मेरा गीत जिंदा रहे। क्योंकि इन गानों में local के पुराने से पुराने शब्दों का इस्तेमाल होता है ताकि लोगों को मेरे गानों से एक जुड़ाव महसूस हो।
Studio के शोर में लोक गीतों के सुर हल्के जरूर पड़ गए हैं, लेकिन दीवान सिंह जैसे कलाकार इस धरोहर को अपने सुरों में संभालते जा रहे हैं। इसके पीछे का कारम बताते हैं कि पुराने लोगों में कदर, कदरदानी है। इसलिए इन गीतों की उम्र बहुत लंबी होती है। आजकल के गीतों की उम्र बहुत कम होती है। अगर गीत हिट भी हो गया तो मुश्किल से चार महीने, छह महीने चलेगा। उसके बाद उसे लोग सुनना बंद कर देंगे। अधिकतर लोक गीत ऐसे मिलते हैं कि जिनके writers का पता नहीं है तो हम उनको संकलित करके गाते हैं। अपने लोक गीतों के प्रति ये लगाव, सम्मान और मेहनत देखकर ही समझ आता है कि हर गीत में छुपा है अपनों का बुलावा। गाँव से, धरती से, जड़ों से। क्योंकि कुछ कहानियाँ पूरी दुनिया के दिलों से गाई जरूर जाती हैं, लेकिन गूंजती हैं सिर्फ गाँव से।
"रूम झुमा जो ग्याड़ा ती सरी तू नौली रूम झुमा जो...
बोला मर बिना गोपाला तिल धारो बोला रूम झुमा"
ये सिर्फ बोल नहीं हैं, उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र की संस्कृति है। कुमाऊं, उत्तराखंड राज्य का वह क्षेत्र जहाँ लोक गीत सिर्फ गाए नहीं जाते बल्कि जिए जाते हैं। कुमाऊं के पहाड़ों में जन्मे लोक गीत सिर्फ सुर नहीं होते, वह धरती की अपनी आवाज होते हैं। कुमाऊंनी लोक गीत समय के साथ बदलते नहीं हैं। अपनों के साथ चलते हैं। पीढ़ियों से अपनी कहानियां सुनाते हुए जैसे पहाड़ों के बीच बहती कोई नदी जो रुकती नहीं, बस बहती रहती है। ऐसे हैं कुमाऊंनी लोक गीत। अल्मोड़ा के रहने वाले "दीवान सिंह कनवाल"इन गीतों को आवाज़ दे रहे हैं।
उत्तराखंड जिले के अल्मोड़ा के रहने वाले दीवान सिंह कनवाल
पहाड़ों में होता है गीत औऱ साहित्य का मेल
पहाड़ी संस्कृति को काग़ज पर उतारते दीवान सिंह कनवाल
"अच्छा गीत मन से सुना जाता है, कानों से नहीं"
सदियों तक गाए जाते हैं कनवाल सिंह के गाने
एक पहाड़ी गीत "द्वि दिना का डर से रुवा यो दुनी मैं" गुनगुनाते हुए कनवाल सिंह बताते हैं कि यह गीत यहाँ के 10 साल के लड़के को भी पसंद है और 80 साल के बुड्ढे को भी पसंद है। तो मेरा सबसे मुख्य उद्देश्य यही रहता है कि मेरे गीत को लोग सुनें, अच्छे लोग सुनें और ज्यादा दिन मेरा गीत जिंदा रहे। क्योंकि इन गानों में local के पुराने से पुराने शब्दों का इस्तेमाल होता है ताकि लोगों को मेरे गानों से एक जुड़ाव महसूस हो।
धरोहरों को संभाल रहे हैं दीवान सिंह
गाना रेकॉर्ड करते हुए दीवान सिंह