समुद्र में लौटती ज़िंदगी, तमिलनाडु के समुद्र में बढ़ी डुगोंग की आबादी

Gaon Connection | Feb 06, 2026, 17:34 IST
Image credit : Gaon Connection Network, Gaon Connection

एक बार फ़िर तमिलनाडु के तटीय समुद्रों में डुगोंग की संख्या बढ़ रही है, जिसे संरक्षण प्रयासों की बड़ी सफलता माना जा रहा है। ड्रोन सर्वेक्षण और सामुदायिक भागीदारी से इस संकटग्रस्त समुद्री जीव की आबादी स्थिर होने के संकेत मिले हैं।

<p>जिस जीव को भूल चुके थे लोग, वह अब फिर समुद्र में दिखने लगा।<br></p>

तमिलनाडु के शांत, उथले समुद्री इलाकों में एक ऐसा जीव रहता है, जिसे देखने वाले लोग प्यार से “समुद्री गाय” कहते हैं। यह है डुगोंग, शाकाहारी समुद्री स्तनधारी, जो पूरी तरह समुद्री घास पर निर्भर रहता है। कभी भारतीय समुद्रों में आम तौर पर मिलने वाला यह जीव आज दुर्लभ हो चुका है, लेकिन एक बार फ़िर इन जीवों के लिए उम्मीद बनकर आयी है।



वन्यजीव संस्थान भारत (WII) और तमिलनाडु वन विभाग ने एक रिपोर्ट जारी की है, जिसके अनुसार यहाँ पर डुगोंग की संख्या बढ़कर 270 हो गई है। इसमें पाक खाड़ी में 158 और मन्नार की खाड़ी में 112 डुगोंग दर्ज किए गए। विशेषज्ञ इसे एक सकारात्मक संकेत मान रहे हैं, क्योंकि इससे पता चलता है कि इस संकटग्रस्त समुद्री जीव की आबादी अभी स्थिर है और प्रजनन भी हो रहा है।



डुगोंग का जीवन समुद्री घास के मैदानों से गहराई से जुड़ा होता है। ये उथले और शांत तटीय इलाके में रहते हैं, जहाँ समुद्री ज़्यादा मात्रा में मिलती है। उनका शरीर भारी और गोलाकार होता है, सिर नीचे की ओर झुका रहता है और पूंछ डॉल्फिन जैसी दिखती है। डुगोंग समुद्री पारिस्थितिकी के लिए एक बेहद ज़रूरी सदस्य होते हैं, क्योंकि वे समुद्री घास के मैदानों को स्वस्थ बनाए रखते हैं। जब वे घास खाते हैं, तो समुद्र तल पर पोषक तत्वों का चक्र सक्रिय होता है और इससे कई अन्य समुद्री जीवों को फायदा मिलता है।



लेकिन दुनिया भर में डुगोंग संकट में हैं। डुगोंग को IUCN की रेड लिस्ट में असुरक्षित (Vulnerable) श्रेणी में रखा गया है और यह स्थिति 1982 से बनी हुई है



और दक्षिण एशिया के कई हिस्सों में इनकी आबादी तेजी से घट रही है। इसके पीछे मुख्य कारण हैं, मछली पकड़ने के जाल में फँसना, तटीय विकास, समुद्री प्रदूषण और अवैध शिकार। भारत में भी यही स्थिति रही है। ख़ासकर तमिलनाडु के तटीय क्षेत्रों में इनकी संख्या पिछले दशकों में कम होती चली गई।



Image credit : Gaon Connection Network, Gaon Connection


इस सर्वेक्षण की एक खास बात यह भी रही कि कई स्थानों पर मादा और बच्चों की जोड़ियां देखी गईं। यह इस बात का संकेत है कि डुगोंग का प्रजनन सक्रिय है और उनकी आबादी में धीरे-धीरे बढ़ रही है। डुगोंग की प्रजनन दर बहुत धीमी होती है। एक मादा कई सालों में केवल एक बच्चे को जन्म देती है, इसलिए आबादी का बढ़ना बेहद धीमी प्रक्रिया है। ऐसे में यदि वयस्क डुगोंग की मौत हो जाए, तो उसकी भरपाई होने में कई साल लग जाते हैं।



इस पर तमिलनाडु सरकार के पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन और वन विभाग की अतिरिक्त मुख्य सचिव सुप्रिया साहू ने कहा, "इससे पता चला है कि तमिलनाडु में डुगोंग यह परिणाम दर्शाते हैं कि राज्य में डुगोंग की आबादी स्थिर है और अच्छी स्थिति में है। पाक खाड़ी और मन्नार की खाड़ी अब मिलकर भारत में डुगोंग की सबसे बड़ी आबादी का घर बन गए हैं।"



इस सकारात्मक स्थिति के पीछे कई सालों के संरक्षण प्रयास हैं। WII द्वारा CAMPA के सहयोग से चलाए जा रहे डुगोंग रिकवरी प्रोग्राम ने इसमें ज़रूरी निभाई है। इस कार्यक्रम के तहत समुद्री घास के मैदानों की पहचान, निगरानी और संरक्षण किया गया। साथ ही तटीय समुदायों, खासकर मछुआरों को डुगोंग के महत्व के बारे में जागरूक किया गया।



Image credit : Gaon Connection Network, Gaon Connection


आज दुनिया के लगभग 40 देशों के समुद्री इलाकों में करीब 1 लाख डुगोंग बचे होने का अनुमान है, लेकिन उनका विस्तार बहुत बड़े क्षेत्र में फैला होने के कारण अलग-अलग क्षेत्रों की आबादी पर खतरे का स्तर भी अलग-अलग है।



राज्य सरकार ने पाक खाड़ी में 448 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को डुगोंग संरक्षण रिजर्व घोषित किया है। यह समुद्री घास से भरपूर क्षेत्र है, जो डुगोंग के खाने और रहने के लिए बेहद ज़रूरी है। इसके अलावा तंजावुर जिले के मनोरा में भारत का पहला डुगोंग संरक्षण केंद्र भी बनाया जा रहा है। विश्व बैंक की मदद से बनने वाले इस केंद्र पर लगभग 40.94 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। यह केंद्र शोध, जनजागरूकता और सामुदायिक भागीदारी का आधुनिक केंद्र होगा।



ये भी पढ़ें: NGT की चेतावनी और वैज्ञानिकों की चिंता, यमुना नदी से क्यों गायब हो रहीं देसी मछलियाँ?



लेकिन डुगोंग की सही आबादी का पता लगाना भी किसी चुनौती से कम नहीं था। कुछ साल पहले अनुमान मछुआरों की जानकारी या सीमित सर्वेक्षणों पर आधारित होते थे। इस बार वैज्ञानिकों ने आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया। ड्रोन आधारित हवाई सर्वेक्षणों के ज़रिए उथले समुद्री क्षेत्रों की निगरानी की गई, जिससे पहली बार अधिक सटीक और विश्वसनीय आकलन मिल पाया।



डब्ल्यूआईआई के वैज्ञानिक जे.ए. जॉनसन कहते हैं, "डुगोंग केवल थोड़े समय के लिए सांस लेने सतह पर आते हैं, इसलिए उन्हें पहचानना मुश्किल होता है। ड्रोन तकनीक की मदद से हम उनके बार-बार सतह पर आने के पलों को रिकॉर्ड कर पाए और तस्वीरों के जरिए उनकी मौजूदगी की पुष्टि कर सके। यही नहीं भविष्य के आकलनों की संभावना और सटीकता बढ़ाने के लिए टीम मशीन लर्निंग तकनीकों का भी इस्तेमाल भी कर रही है।"



Image credit : Gaon Connection Network, Gaon Connection


लेकिन फिर भी डुगोंग के सामने खतरे पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। मछली पकड़ने के जाल में फंसना, नावों से टकराना, समुद्री प्रदूषण और तटीय विकास इनके लिए बड़े खतरे बने हुए हैं। सबसे गंभीर समस्या समुद्री घास के मैदानों का नष्ट होना है, क्योंकि यही उनका खाना और घर दोनों है।



विशेषज्ञों का कहना है कि डुगोंग संरक्षण केवल एक राज्य या देश तक सीमित नहीं रह सकता। ये समुद्री जीव सीमाओं को नहीं जानते, इसलिए भारत और श्रीलंका जैसे देशों के बीच सहयोग बेहद जरूरी है। समुद्री घास के मैदानों की संयुक्त सुरक्षा, जिम्मेदार मछली पकड़ने की तकनीक और साझा निगरानी तंत्र इस दिशा में अहम कदम हो सकते हैं।



तटीय समुदायों की भूमिका भी इसमें बेहद ज़रूरी है। कई जगहों पर मछुआरे अब डुगोंग को नुकसान पहुंचाने के बजाय उन्हें बचाने के लिए आगे आते हैं। जागरूकता कार्यक्रमों और संरक्षण योजनाओं में उनकी भागीदारी से डुगोंग के लिए सुरक्षित समुद्री क्षेत्र बनाए जा रहे हैं।



ये भी पढ़ें: नीलगिरी के जंगलों में हरियाली की नई कहानी, लैंटाना पौधे से बन रहे बायो-ब्रिकेट्स

Tags:
  • sea cow India
  • dugong population India
  • Tamil Nadu coast dugong
  • dugong conservation India
  • WII dugong survey
  • endangered dugong
  • coastal conservation India
  • dugong conservation reserve in tamil nadu
  • dugong conservation status
  • dugong in india