नीलगिरी के जंगलों में हरियाली की नई कहानी, लैंटाना पौधे से बन रहे बायो-ब्रिकेट्स
Gaon Connection | Feb 04, 2026, 13:42 IST
नीलगिरी की पहाड़ियों पर लैंटाना जैसी आक्रामक घास को हटाकर उससे ईको-फ्रेंडली ब्रिकेट्स बनाए जा रहे हैं। यह पहल जंगल संरक्षण, जलवायु समाधान, स्वच्छ ऊर्जा और आदिवासी आजीविका को एक साथ जोड़ते हुए सर्कुलर इकॉनमी का अनोखा मॉडल पेश कर रही है।
नीलगिरी की पहाड़ियों और घने जंगलों के बीच आज एक छोटी-सी फैक्ट्री एक बड़ी पर्यावरणीय चुनौती का समाधान बनकर उभर रही है। यहां जंगलों में तेजी से फैल रही आक्रामक घास लैंटाना कैमारा को हटाकर उससे पर्यावरण-अनुकूल ईंधन ब्रिकेट्स तैयार किए जा रहे हैं। यह पहल केवल कचरे से ईंधन बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि जंगल संरक्षण, जलवायु समाधान, स्वच्छ ऊर्जा और आदिवासी आजीविका को एक साथ जोड़ने वाला एक अनोखा मॉडल बन चुकी है।
मूल रूप से अमेरिका का यह पौधा 1800 के दशक में सजावट के लिए भारत लाया गया था, लेकिन अब यह बगीचों से निकलकर हमारे पूरे ईकोसिस्टम पर कब्जा कर चुका है। पिछले 200 वर्षों में अपनी कई प्रजातियों के साथ मिलकर यह इतना ताकतवर और जटिल हो गया है कि अब यह घनी झाड़ियों के रूप में दूसरे पौधों को घेर लेता है और बड़ी लताओं की तरह पेड़ों पर चढ़कर पूरे जंगल को बर्बाद कर रहा है।
तमिलनाडु के कोयंबटूर जिले में स्थित मुडुमलाई टाइगर रिज़र्व में ही यह पौधा लगभग 44 प्रतिशत क्षेत्र पर कब्जा कर चुका है। इसकी वजह से जंगल की प्राकृतिक घास, झाड़ियां और स्थानीय पौध प्रजातियां तेजी से कम होती जा रही हैं। इसका सीधा असर हिरण, हाथी और अन्य शाकाहारी वन्यजीवों के चारे पर पड़ा है, जिससे पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर दबाव बढ़ गया है।
यह समस्या केवल मुडुमलाई तक सीमित नहीं है। एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन के मुताबिक, लैंटाना का फैलाव भारत के करीब 40 प्रतिशत टाइगर हैबिटैट को प्रभावित कर चुका है। यह आक्रामक पौधा जंगल की जमीन पर मोटी परत बनाकर नई पौधों की वृद्धि रोक देता है, आग लगने का खतरा बढ़ाता है और वन्यजीवों के आवास को कमजोर करता है। इसी वजह से अब लैंटाना को हटाना केवल वन सफाई नहीं, बल्कि जैव विविधता बचाने की एक जरूरी रणनीति बन चुका है।
इसी चुनौती को अवसर में बदलने का काम मसीनगुडी इलाके की यह ब्रिकेटिंग यूनिट कर रही है। इस पहल के तहत हर महीने लगभग 125 हेक्टेयर जंगल क्षेत्र से लैंटाना हटाया जा रहा है। इससे जंगलों में प्राकृतिक घास और मूल पौध प्रजातियों को दोबारा उगने का मौका मिल रहा है। नतीजतन, हाथी, हिरण, बाघ और अन्य वन्यजीवों के लिए बेहतर आवास तैयार हो रहा है। यह सिर्फ सफाई अभियान नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित पारिस्थितिक पुनर्स्थापन प्रक्रिया है।
इस मॉडल की सबसे खास बात इसकी सर्कुलर इकॉनमी है। जंगल के भीतर से लैंटाना हटाने का काम स्थानीय आदिवासी समुदायों की मदद से किया जाता है। इसके बाद यह बायोमास मसीनगुडी की यूनिट तक लाया जाता है, जहां वही समुदाय आधुनिक मशीनों की मदद से इसे ब्रिकेट्स में बदलता है। इस पूरी प्रक्रिया में किसी भी रासायनिक बाइंडर का इस्तेमाल नहीं होता। केवल दबाव और ताप तकनीक से ठोस, स्वच्छ और टिकाऊ ईंधन तैयार किया जाता है।
तैयार ब्रिकेट्स को आसपास की चाय फैक्ट्रियों में सप्लाई किया जाता है। इससे फैक्ट्रियों में लकड़ी जलाने की जरूरत कम होती है और जंगलों पर ईंधन के लिए होने वाली कटाई भी घटती है। यानी एक तरफ जंगल से आक्रामक घास हटाई जाती है और दूसरी तरफ उसी अपशिष्ट से उद्योगों के लिए उपयोगी ऊर्जा तैयार की जाती है।
इस पूरी पहल का संचालन तमिलनाडु वन विभाग कर रहा है। विभाग ने इसे केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे आदिवासी आजीविका से भी जोड़ा है। स्थानीय लोगों को नियमित रोजगार, स्थिर आय और सम्मानजनक काम मिला है। इससे संरक्षण को लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी से जोड़ने का एक मजबूत उदाहरण सामने आया है।
दिलचस्प बात यह है कि मसीनगुडी क्षेत्र में लैंटाना का रचनात्मक उपयोग पहले भी किया जा चुका है। यहां लैंटाना की सूखी टहनियों से सजावटी हाथी मॉडल बनाए जाते हैं। इस प्रोजेक्ट से जुड़ी रंजनी जानकी बताती हैं कि शुरुआत में उन्होंने साधारण काम सीखा, फिर लकड़ी को तराशने और फर्नीचर डिजाइन करने की ट्रेनिंग मिली। “हाथी मॉडल बनाना हमारे हुनर और रचनात्मकता दोनों को दिखाता है। इससे हमें आत्मनिर्भर बनने का मौका मिला,” वह कहती हैं।
इस तरह लैंटाना से छुटकारा पाने के साथ-साथ स्थानीय आदिवासी समुदायों को रोजगार, कौशल और सम्मान भी मिल रहा है।
इस पहल के फायदे कई स्तरों पर दिखाई दे रहे हैं। एक ओर जंगलों से आक्रामक घास हट रही है, दूसरी ओर स्थानीय वनस्पतियों को फिर से पनपने का अवसर मिल रहा है। इससे बाघ, हाथी, हिरण और पक्षियों सहित पूरे वन्यजीव तंत्र को मजबूती मिलती है। साथ ही स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन और कार्बन उत्सर्जन में कमी जैसे जलवायु लाभ भी सामने आ रहे हैं।
ये भी पढ़ें: जंगली लैंटाना से बना रहे फर्नीचर: तमिलनाडु की इरुला जनजाति को मिला बेहतर कमाई का जरिया
मूल रूप से अमेरिका का यह पौधा 1800 के दशक में सजावट के लिए भारत लाया गया था, लेकिन अब यह बगीचों से निकलकर हमारे पूरे ईकोसिस्टम पर कब्जा कर चुका है। पिछले 200 वर्षों में अपनी कई प्रजातियों के साथ मिलकर यह इतना ताकतवर और जटिल हो गया है कि अब यह घनी झाड़ियों के रूप में दूसरे पौधों को घेर लेता है और बड़ी लताओं की तरह पेड़ों पर चढ़कर पूरे जंगल को बर्बाद कर रहा है।
तमिलनाडु के कोयंबटूर जिले में स्थित मुडुमलाई टाइगर रिज़र्व में ही यह पौधा लगभग 44 प्रतिशत क्षेत्र पर कब्जा कर चुका है। इसकी वजह से जंगल की प्राकृतिक घास, झाड़ियां और स्थानीय पौध प्रजातियां तेजी से कम होती जा रही हैं। इसका सीधा असर हिरण, हाथी और अन्य शाकाहारी वन्यजीवों के चारे पर पड़ा है, जिससे पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर दबाव बढ़ गया है।
यह समस्या केवल मुडुमलाई तक सीमित नहीं है। एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन के मुताबिक, लैंटाना का फैलाव भारत के करीब 40 प्रतिशत टाइगर हैबिटैट को प्रभावित कर चुका है। यह आक्रामक पौधा जंगल की जमीन पर मोटी परत बनाकर नई पौधों की वृद्धि रोक देता है, आग लगने का खतरा बढ़ाता है और वन्यजीवों के आवास को कमजोर करता है। इसी वजह से अब लैंटाना को हटाना केवल वन सफाई नहीं, बल्कि जैव विविधता बचाने की एक जरूरी रणनीति बन चुका है।
मुडुमलाई में लैंटाना से ब्रिकेट्स बनाकर बचाया जा रहा वन्यजीव आवास।
इसी चुनौती को अवसर में बदलने का काम मसीनगुडी इलाके की यह ब्रिकेटिंग यूनिट कर रही है। इस पहल के तहत हर महीने लगभग 125 हेक्टेयर जंगल क्षेत्र से लैंटाना हटाया जा रहा है। इससे जंगलों में प्राकृतिक घास और मूल पौध प्रजातियों को दोबारा उगने का मौका मिल रहा है। नतीजतन, हाथी, हिरण, बाघ और अन्य वन्यजीवों के लिए बेहतर आवास तैयार हो रहा है। यह सिर्फ सफाई अभियान नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित पारिस्थितिक पुनर्स्थापन प्रक्रिया है।
इस मॉडल की सबसे खास बात इसकी सर्कुलर इकॉनमी है। जंगल के भीतर से लैंटाना हटाने का काम स्थानीय आदिवासी समुदायों की मदद से किया जाता है। इसके बाद यह बायोमास मसीनगुडी की यूनिट तक लाया जाता है, जहां वही समुदाय आधुनिक मशीनों की मदद से इसे ब्रिकेट्स में बदलता है। इस पूरी प्रक्रिया में किसी भी रासायनिक बाइंडर का इस्तेमाल नहीं होता। केवल दबाव और ताप तकनीक से ठोस, स्वच्छ और टिकाऊ ईंधन तैयार किया जाता है।
तैयार ब्रिकेट्स को आसपास की चाय फैक्ट्रियों में सप्लाई किया जाता है। इससे फैक्ट्रियों में लकड़ी जलाने की जरूरत कम होती है और जंगलों पर ईंधन के लिए होने वाली कटाई भी घटती है। यानी एक तरफ जंगल से आक्रामक घास हटाई जाती है और दूसरी तरफ उसी अपशिष्ट से उद्योगों के लिए उपयोगी ऊर्जा तैयार की जाती है।
इस पूरी पहल का संचालन तमिलनाडु वन विभाग कर रहा है। विभाग ने इसे केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे आदिवासी आजीविका से भी जोड़ा है। स्थानीय लोगों को नियमित रोजगार, स्थिर आय और सम्मानजनक काम मिला है। इससे संरक्षण को लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी से जोड़ने का एक मजबूत उदाहरण सामने आया है।
दिलचस्प बात यह है कि मसीनगुडी क्षेत्र में लैंटाना का रचनात्मक उपयोग पहले भी किया जा चुका है। यहां लैंटाना की सूखी टहनियों से सजावटी हाथी मॉडल बनाए जाते हैं। इस प्रोजेक्ट से जुड़ी रंजनी जानकी बताती हैं कि शुरुआत में उन्होंने साधारण काम सीखा, फिर लकड़ी को तराशने और फर्नीचर डिजाइन करने की ट्रेनिंग मिली। “हाथी मॉडल बनाना हमारे हुनर और रचनात्मकता दोनों को दिखाता है। इससे हमें आत्मनिर्भर बनने का मौका मिला,” वह कहती हैं।
इस तरह लैंटाना से छुटकारा पाने के साथ-साथ स्थानीय आदिवासी समुदायों को रोजगार, कौशल और सम्मान भी मिल रहा है।
इस पहल के फायदे कई स्तरों पर दिखाई दे रहे हैं। एक ओर जंगलों से आक्रामक घास हट रही है, दूसरी ओर स्थानीय वनस्पतियों को फिर से पनपने का अवसर मिल रहा है। इससे बाघ, हाथी, हिरण और पक्षियों सहित पूरे वन्यजीव तंत्र को मजबूती मिलती है। साथ ही स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन और कार्बन उत्सर्जन में कमी जैसे जलवायु लाभ भी सामने आ रहे हैं।
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