NGT की चेतावनी और वैज्ञानिकों की चिंता, यमुना नदी से क्यों गायब हो रहीं देसी मछलियाँ?
Divendra Singh | Feb 05, 2026, 16:44 IST
यमुना नदी में मछलियों का गायब होना केवल जैव विविधता का संकट नहीं, बल्कि नदी के जीवन के ख़त्म होने की कहानी है। कम जल प्रवाह और इंसानी दखल ने देसी मछलियों को उनके ठिकाने से लगभग बेदखल ही कर दिया है।
यमुना नदी को उत्तर भारत की जीवनरेखा यूँ ही नहीं कहा जाता। हिमालय से निकलकर यह नदी खेतों को सींचती है, शहरों की प्यास बुझाती है और सदियों से लाखों लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा रही है। लेकिन आज यमुना नदी की कहानी कुछ और ही है, उसी कहानी का हिस्सा रहीं मछलियाँ संकट में हैं, जो धीरे-धीरे गायब हो रही हैं।
सेंट्रल इनलैंड फ़िशरीज़ रिसर्च इंस्टीट्यूट (ICAR-CIFRI) के वैज्ञानिकों ने कई सालों के अध्ययन से पता लगाया है कि आखिर मछलियाँ क्यों गायब हो रही हैं। 2020 से 2024 के बीच किए गए इस अध्ययन में यमुना नदी के नौ अलग-अलग हिस्सों में मछलियों की स्थिति को परखा गया।
पूरी नदी में कुल 126 मछली प्रजातियाँ दर्ज की गईं, लेकिन यह संख्या अपने-आप में भ्रामक है। यमुनानगर, पचनदा, हमीरपुर और प्रयागराज जैसे हिस्सों में अभी भी मछलियों की विविधता बची हुई है। इसके उलट, दिल्ली में यमुना का हाल ऐसा है कि ITO के आसपास वैज्ञानिकों को सिर्फ एक ही मछली प्रजाति मिली। यह आँकड़ा नहीं, बल्कि चेतावनी है।
ICAR-CIFRI के प्रयागराज सेंटर के वैज्ञानिक डॉ धर्म नाथ झा ने इस अध्ययन की अगुवाई की है, वो समझाते हुए कहते हैं, "मछलियों के खत्म होने के पीछे कई कारण हें, पहला पानी की कमी, दूसरा प्रदूषण और तीसरा एंथ्रोपोजेनिक एक्टिविटीज़, यानी इंसानों द्वारा की जाने वाली गतिविधियों का बढ़ना, जो प्रमुख समस्या है।"
इसको बारे में विस्तार से समझाते हुए वो बताते हैं, "जैसे दिल्ली और उससे आगे आगरा-मथुरा जैसी जगहों पर मछलियाँ बहुत कम मिलीं, लेकिन इटावा से आगे पचनद जहाँ पर चंबल यमुना नदी से मिलती है, वहाँ पर स्थिति में कुछ सुधार हुआ है। उसके बाद क्या होता है कि पानी भी ज़्यादा वहाँ से चंबल नदी से आकर के मिलती है, फिर उसके नीचे केन-बेतवा भी आकर मिलती है, तो इस तरह से नीचे में थोड़ा बहुत तो ठीक है, ऊपर की स्थिति में यही समस्या थी।"
दिल्ली में यमुना का यह हाल किसी एक घटना का नतीजा नहीं है। दशकों से औद्योगिक अपशिष्ट और बैराजों के ज़रिये रोके गए प्राकृतिक बहाव, इन सबने मिलकर नदी के इस हिस्से को ऑक्सीजन-विहीन बना दिया है। जब पानी में साँस लेने लायक ऑक्सीजन ही नहीं बचती, तो मछलियाँ वहाँ टिक नहीं सकतीं। वे या तो मर जाती हैं या उस हिस्से को हमेशा के लिए छोड़ देती हैं।
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यमुना की पहचान मानी जाने वाली महसीर मछली की कहानी इस संकट को और गहराई से समझाती है। कभी यमुनानगर के आसपास महसीर की भरपूर मौजूदगी थी। 1990 के दशक के आखिर तक कुल मछली पकड़ में इसका योगदान करीब 9 प्रतिशत था। आज यह घटकर 2 प्रतिशत से भी नीचे पहुँच चुका है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि हथिनीकुंड जैसे बैराजों ने महसीर के रास्तों को प्रभावित किया है। यह मछली प्रजनन के लिए ऊपरी इलाकों की ओर जाती है, लेकिन जब रास्ते में दीवारें और गाद खड़ी हो जाएँ, तो उसका जीवन चक्र ही टूट जाता है।
महसीर अकेली नहीं है। रोहू, कतला और मृगल जैसी भारतीय प्रमुख कार्प, जो कभी यमुना की मत्स्य अर्थव्यवस्था की रीढ़ थीं, अब धीरे-धीरे सिमट रही हैं। 1960 और 70 के दशक में ये मछलियाँ कुल पकड़ का लगभग आधा हिस्सा हुआ करती थीं। आज ऊपरी और मध्य यमुना में इनकी मौजूदगी बेहद कम हो चुकी है। खासतौर पर कतला की तेज़ गिरावट यह संकेत देती है कि नदी का प्राकृतिक आवास गंभीर रूप से बिगड़ चुका है।
डॉ झा इसको समझाते हैं, "हमने देखा कि जैसे एक नील-तिलापिया (Nile Tilapia) मछली होती है, जिसको आम बोलचाल में 'कवई' भी बोलते हैं, उसके लिए या फिर 'कॉमन कार्प' (Common Carp), सिप्रिनस कार्पियो (Cyprinus carpio) है, उन सब के लिए उतना ज़्यादा अच्छे क्वालिटी का पानी का होना ज़रूरी नहीं है। पानी की गुणवत्ता बहुत अच्छी नहीं भी रहेगी तब भी ये सर्वाइव करेंगे। लेकिन हमारी देसी यानी इंडिजिनस (indigenous) मछलियाँ ऐसे पानी में सर्वाइव नहीं कर पाती हैं।"
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बड़ी कैटफिश मछलियों की हालत भी बेहतर नहीं है। आगरा और प्रयागराज जैसे इलाकों में कभी ये मछलियाँ मछुआरों की आजीविका का मजबूत आधार थीं। अब इनकी संख्या और औसत आकार दोनों घटते जा रहे हैं। इसकी एक बड़ी वजह विदेशी मछलियों का बढ़ता दबाव है, जो देसी प्रजातियों के भोजन और जगह पर कब्जा कर लेती हैं। कॉमन कार्प, नाइल तिलापिया और थाई मांगुर अब नदी में सबसे ज़्यादा दिखने वाली प्रजातियाँ बन चुकी हैं। 1990 से पहले ये लगभग नदारद थीं, लेकिन एक्वाकल्चर फार्मों से निकलकर और धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान छोड़े जाने से इन्होंने नदी में अपनी जगह बना ली। कुछ समय तक नाइल तिलापिया दिल्ली से प्रयागराज तक सबसे ज़्यादा पकड़ी जाने वाली मछली रही।
लेकिन सवाल है कि विदेशी यानी एग्जॉटिक मछलियाँ यमुना नदी में कैसे आईं, इस पर डॉ धर्म नाथ झा बताते हैं, "अगर एग्जॉटिक की बात करें तो कई बार हम लोग घर में जो एक्वेरियम रखते हैं उसके लिए लोग कहीं से लाए होंगे बाहर से, तो एक्वेरियम में रखे, फिर उसका साइज़ बड़ा हो गया या फिर किसी कारण से.. दो-तीन कारण होते हैं, एक तो जो घर की मछलियाँ एक्वेरियम में हैं वो बड़ी हो जाती हैं तो लोग उसको नदी में डाल देते हैं कि उसको अब छोड़ दिया जाए। या फिर बहुत सारे जगह मछलियों को नदी में धार्मिक अनुष्ठानों के चलते भी छोड़ते हैं, ऐसे में भी मछलियाँ आ जाती हैं।
प्रयागराज में गंगा नदी का उदाहरण समझाते हुए डॉ झा कहते हैं, "प्रयागराज में हमार इंस्टीट्यूट कई दशकों से हैं, हम यहाँ गंगा रिवर सिस्टम पर काम कर रहे हैं। अगर उसके आंकड़ों को देखें तेो साल 2000-2000 के आसपास हमने तिलापिया को देखा, उसके बाद साल 2007 के आसपास हमने यहाँ पर कॉमन कार्प को भी देखा। लेकिन ये एक-दो दिनों में तो हुआ नहीं होगा, इसमें सालों लगे होंगे।"
थाई मांगुर की मौजूदगी खास तौर पर खतरे की घंटी है। यह मछली कम ऑक्सीजन वाले पानी में भी ज़िंदा रह सकती है, क्योंकि यह हवा से सांस लेती है। यही वजह है कि दिल्ली के सबसे प्रदूषित हिस्सों में भी यह आसानी से पाई जाती है, लेकिन इसकी बढ़त का मतलब है देसी मछलियों का और पीछे धकेला जाना।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए National Green Tribunalने भी हस्तक्षेप किया है। अदालत ने यमुना बेसिन के राज्यों को देसी मछलियों की रक्षा, अवैध मछली पकड़ पर रोक, जल प्रवाह बनाए रखने और प्रदूषण नियंत्रण के निर्देश दिए हैं। लेकिन सवाल ये है कि हमारी देसी प्रजातियों को कैसे बचाया जा सकता है, या फ़िर उन्हें वापस कैसे लौटाया जा सकता है।
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डॉ धर्म नाथ झा मछलियों को बचाने पर कहते हैं, "देखिए जैसे एक उसमें जो हमारी इंडिजिनस स्पीशीज़ है, रोहू, कतला, नैन जिन्हें 'इंडियन मेजर कार्प' (Indian Major Carp) यानी , आईएमसी (IMC) बोलते हैं। ये गंगा नदी सिस्टम की मूल मछलियाँ हैं। यदि ऊपर में ऊपर की तरफ (hilly stretch) देखें तो 'महाशीर' (Mahseer) जो है यहाँ की मछली है जो कि वॉटर डिटेरियोरेशन (water deterioration) के कारण या कम फ्लो के कारण, कम पानी के कारण खत्म हो रहीं हैं।"
वो आगे बताते हैं, "इन्हें बचाने के लिए एक 'रैंचिंग' (ranching) कार्यक्रम होता है। रैंचिंग कार्यक्रम में ये किया जाता है कि ये सब मछली को जो ब्रूडर (brooder) है नदी की, उसको लेकर के बाहर में उसका ब्रीडिंग करवा करके उसके मछली के साइज़ को, जो बच्चे रहते हैं उसको बड़ा करके 10 ग्राम तक के बच्चे को फिर नदी में छोड़ा जाता है। उससे क्या होता है कि इनकी सर्वाइवल (survival) नदी में बढ़ जाती है क्योंकि इनके लिए जो है कोई दूसरा उतना ज़्यादा पकड़ नहीं पाते हैं।"
वो आगे कहते हैं, "और फिर ये ऐसा एक्सपेक्टेशन है कि जितना रैंचिंग के माध्यम से मछलियाँ छोड़ी जाती हैं, यदि कुछ भी नहीं मिला मान लीजिए 10% भी इसका सर्वाइव कर गया तो नेक्स्ट एक-दो साल में एक जो रोहू, कतला, नैन ये सब जो हैं लाखों मछलियाँ अंडे देती हैं। तो उससे यदि 10% भी हम मछली जो छोड़ रहे हैं 10% बच गया तो फिर अगले साल एक-दो-तीन साल में उनकी संख्या बढ़ सकती है। तो रैंचिंग एक ज़्यादा इफेक्टिव तरीका हम लोगों को लगा।"
लेकिन मछलियाँ तभी बढ़ेंगी, जब इनके पकड़ने पर रोक लगाई जाए, लेकिन मछली के इस व्यवसाय से हज़ारों घर चलते हैं, उन्हें कैसे रोका जाए, इस पर डॉ धर्म नाथ सलाह देते हैं, "मछली पकड़ने पर कुछ रिस्ट्रिक्शन होना चाहिए। जो जाल जो होता है जिससे मछली पकड़ी जाती है, तो मछुआरे लोगों को अवेयर करके कि ये जो मछलियाँ हैं आईएमसी जो कि अच्छे जल में रहती है, जो गंगा-यमुना की मूल मछली है, उसको आप न पकड़ें, छोटी साइज़ की न पकड़ें, जब बड़ी हो जाती है तभी पकड़ें। ब्रीडिंग सीज़न में ब्रूडर को न पकड़ें।"
"और बाकी जो हमारे बैराज अथॉरिटी है उस सब से कह के कि पानी को कुछ मेंटेन करके छोड़ा जाए। साथ ही बहुत जगह आप देखेंगे सैंड माइनिंग (sand mining) वगैरह भी होता है तो उस पे भी कुछ रिस्ट्रिक्शन यदि लगा दिया जाए तो उससे क्या होता है ब्रीडिंग पीरियड में अंडा सब है अच्छा जो है वहाँ से डिस्टर्बेंस होता है सैंड माइनिंग सब से। तो वो सब यदि थोड़ा सा रुक जाए तो मछलियों को बचाया जा सकता है, "उन्होंने आगे कहा।
आज यमुना नदी एक चेतावनी दे रही है। अगर अब भी हमने उसके बहाव, उसकी जैव विविधता और उसके जीवन को बचाने की कोशिश नहीं की, तो आने वाली पीढ़ियाँ उसमें रहने वाली मछलियों को सिर्फ़ तस्वीरों और किताबों में ही जानेंगी।
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सेंट्रल इनलैंड फ़िशरीज़ रिसर्च इंस्टीट्यूट (ICAR-CIFRI) के वैज्ञानिकों ने कई सालों के अध्ययन से पता लगाया है कि आखिर मछलियाँ क्यों गायब हो रही हैं। 2020 से 2024 के बीच किए गए इस अध्ययन में यमुना नदी के नौ अलग-अलग हिस्सों में मछलियों की स्थिति को परखा गया।
पूरी नदी में कुल 126 मछली प्रजातियाँ दर्ज की गईं, लेकिन यह संख्या अपने-आप में भ्रामक है। यमुनानगर, पचनदा, हमीरपुर और प्रयागराज जैसे हिस्सों में अभी भी मछलियों की विविधता बची हुई है। इसके उलट, दिल्ली में यमुना का हाल ऐसा है कि ITO के आसपास वैज्ञानिकों को सिर्फ एक ही मछली प्रजाति मिली। यह आँकड़ा नहीं, बल्कि चेतावनी है।
ICAR-CIFRI के प्रयागराज सेंटर के वैज्ञानिक डॉ धर्म नाथ झा ने इस अध्ययन की अगुवाई की है, वो समझाते हुए कहते हैं, "मछलियों के खत्म होने के पीछे कई कारण हें, पहला पानी की कमी, दूसरा प्रदूषण और तीसरा एंथ्रोपोजेनिक एक्टिविटीज़, यानी इंसानों द्वारा की जाने वाली गतिविधियों का बढ़ना, जो प्रमुख समस्या है।"
स्टडी में दिल्ली और उससे आगे आगरा-मथुरा जैसी जगहों पर मछलियाँ बहुत कम मिलीं।
इसको बारे में विस्तार से समझाते हुए वो बताते हैं, "जैसे दिल्ली और उससे आगे आगरा-मथुरा जैसी जगहों पर मछलियाँ बहुत कम मिलीं, लेकिन इटावा से आगे पचनद जहाँ पर चंबल यमुना नदी से मिलती है, वहाँ पर स्थिति में कुछ सुधार हुआ है। उसके बाद क्या होता है कि पानी भी ज़्यादा वहाँ से चंबल नदी से आकर के मिलती है, फिर उसके नीचे केन-बेतवा भी आकर मिलती है, तो इस तरह से नीचे में थोड़ा बहुत तो ठीक है, ऊपर की स्थिति में यही समस्या थी।"
दिल्ली में यमुना का यह हाल किसी एक घटना का नतीजा नहीं है। दशकों से औद्योगिक अपशिष्ट और बैराजों के ज़रिये रोके गए प्राकृतिक बहाव, इन सबने मिलकर नदी के इस हिस्से को ऑक्सीजन-विहीन बना दिया है। जब पानी में साँस लेने लायक ऑक्सीजन ही नहीं बचती, तो मछलियाँ वहाँ टिक नहीं सकतीं। वे या तो मर जाती हैं या उस हिस्से को हमेशा के लिए छोड़ देती हैं।
ये भी पढ़ें: इस योजना से अंडमान-निकोबार में बढ़ेगा मछली पालन का व्यवसाय
यमुना की पहचान मानी जाने वाली महसीर मछली की कहानी इस संकट को और गहराई से समझाती है। कभी यमुनानगर के आसपास महसीर की भरपूर मौजूदगी थी। 1990 के दशक के आखिर तक कुल मछली पकड़ में इसका योगदान करीब 9 प्रतिशत था। आज यह घटकर 2 प्रतिशत से भी नीचे पहुँच चुका है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि हथिनीकुंड जैसे बैराजों ने महसीर के रास्तों को प्रभावित किया है। यह मछली प्रजनन के लिए ऊपरी इलाकों की ओर जाती है, लेकिन जब रास्ते में दीवारें और गाद खड़ी हो जाएँ, तो उसका जीवन चक्र ही टूट जाता है।
रोहू, कतला और मृगल जैसी भारतीय प्रमुख कार्प, जो कभी यमुना की मत्स्य अर्थव्यवस्था की रीढ़ थीं, अब धीरे-धीरे सिमट रही हैं।
महसीर अकेली नहीं है। रोहू, कतला और मृगल जैसी भारतीय प्रमुख कार्प, जो कभी यमुना की मत्स्य अर्थव्यवस्था की रीढ़ थीं, अब धीरे-धीरे सिमट रही हैं। 1960 और 70 के दशक में ये मछलियाँ कुल पकड़ का लगभग आधा हिस्सा हुआ करती थीं। आज ऊपरी और मध्य यमुना में इनकी मौजूदगी बेहद कम हो चुकी है। खासतौर पर कतला की तेज़ गिरावट यह संकेत देती है कि नदी का प्राकृतिक आवास गंभीर रूप से बिगड़ चुका है।
डॉ झा इसको समझाते हैं, "हमने देखा कि जैसे एक नील-तिलापिया (Nile Tilapia) मछली होती है, जिसको आम बोलचाल में 'कवई' भी बोलते हैं, उसके लिए या फिर 'कॉमन कार्प' (Common Carp), सिप्रिनस कार्पियो (Cyprinus carpio) है, उन सब के लिए उतना ज़्यादा अच्छे क्वालिटी का पानी का होना ज़रूरी नहीं है। पानी की गुणवत्ता बहुत अच्छी नहीं भी रहेगी तब भी ये सर्वाइव करेंगे। लेकिन हमारी देसी यानी इंडिजिनस (indigenous) मछलियाँ ऐसे पानी में सर्वाइव नहीं कर पाती हैं।"
ये भी पढ़ें: मछली पालन में नई शुरुआत, NFDP से जुड़कर सीधे पा सकते हैं सरकारी योजनाओं का लाभ
बड़ी कैटफिश मछलियों की हालत भी बेहतर नहीं है। आगरा और प्रयागराज जैसे इलाकों में कभी ये मछलियाँ मछुआरों की आजीविका का मजबूत आधार थीं। अब इनकी संख्या और औसत आकार दोनों घटते जा रहे हैं। इसकी एक बड़ी वजह विदेशी मछलियों का बढ़ता दबाव है, जो देसी प्रजातियों के भोजन और जगह पर कब्जा कर लेती हैं। कॉमन कार्प, नाइल तिलापिया और थाई मांगुर अब नदी में सबसे ज़्यादा दिखने वाली प्रजातियाँ बन चुकी हैं। 1990 से पहले ये लगभग नदारद थीं, लेकिन एक्वाकल्चर फार्मों से निकलकर और धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान छोड़े जाने से इन्होंने नदी में अपनी जगह बना ली। कुछ समय तक नाइल तिलापिया दिल्ली से प्रयागराज तक सबसे ज़्यादा पकड़ी जाने वाली मछली रही।
आज यमुना एक चेतावनी है। अगर अब भी हमने उसके बहाव, उसकी जैव विविधता और उसके जीवन को बचाने की कोशिश नहीं की, तो आने वाली पीढ़ियाँ उसे सिर्फ तस्वीरों और किताबों में ही जानेंगी।
लेकिन सवाल है कि विदेशी यानी एग्जॉटिक मछलियाँ यमुना नदी में कैसे आईं, इस पर डॉ धर्म नाथ झा बताते हैं, "अगर एग्जॉटिक की बात करें तो कई बार हम लोग घर में जो एक्वेरियम रखते हैं उसके लिए लोग कहीं से लाए होंगे बाहर से, तो एक्वेरियम में रखे, फिर उसका साइज़ बड़ा हो गया या फिर किसी कारण से.. दो-तीन कारण होते हैं, एक तो जो घर की मछलियाँ एक्वेरियम में हैं वो बड़ी हो जाती हैं तो लोग उसको नदी में डाल देते हैं कि उसको अब छोड़ दिया जाए। या फिर बहुत सारे जगह मछलियों को नदी में धार्मिक अनुष्ठानों के चलते भी छोड़ते हैं, ऐसे में भी मछलियाँ आ जाती हैं।
प्रयागराज में गंगा नदी का उदाहरण समझाते हुए डॉ झा कहते हैं, "प्रयागराज में हमार इंस्टीट्यूट कई दशकों से हैं, हम यहाँ गंगा रिवर सिस्टम पर काम कर रहे हैं। अगर उसके आंकड़ों को देखें तेो साल 2000-2000 के आसपास हमने तिलापिया को देखा, उसके बाद साल 2007 के आसपास हमने यहाँ पर कॉमन कार्प को भी देखा। लेकिन ये एक-दो दिनों में तो हुआ नहीं होगा, इसमें सालों लगे होंगे।"
थाई मांगुर की मौजूदगी खास तौर पर खतरे की घंटी है। यह मछली कम ऑक्सीजन वाले पानी में भी ज़िंदा रह सकती है, क्योंकि यह हवा से सांस लेती है। यही वजह है कि दिल्ली के सबसे प्रदूषित हिस्सों में भी यह आसानी से पाई जाती है, लेकिन इसकी बढ़त का मतलब है देसी मछलियों का और पीछे धकेला जाना।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए National Green Tribunalने भी हस्तक्षेप किया है। अदालत ने यमुना बेसिन के राज्यों को देसी मछलियों की रक्षा, अवैध मछली पकड़ पर रोक, जल प्रवाह बनाए रखने और प्रदूषण नियंत्रण के निर्देश दिए हैं। लेकिन सवाल ये है कि हमारी देसी प्रजातियों को कैसे बचाया जा सकता है, या फ़िर उन्हें वापस कैसे लौटाया जा सकता है।
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डॉ धर्म नाथ झा मछलियों को बचाने पर कहते हैं, "देखिए जैसे एक उसमें जो हमारी इंडिजिनस स्पीशीज़ है, रोहू, कतला, नैन जिन्हें 'इंडियन मेजर कार्प' (Indian Major Carp) यानी , आईएमसी (IMC) बोलते हैं। ये गंगा नदी सिस्टम की मूल मछलियाँ हैं। यदि ऊपर में ऊपर की तरफ (hilly stretch) देखें तो 'महाशीर' (Mahseer) जो है यहाँ की मछली है जो कि वॉटर डिटेरियोरेशन (water deterioration) के कारण या कम फ्लो के कारण, कम पानी के कारण खत्म हो रहीं हैं।"
वो आगे बताते हैं, "इन्हें बचाने के लिए एक 'रैंचिंग' (ranching) कार्यक्रम होता है। रैंचिंग कार्यक्रम में ये किया जाता है कि ये सब मछली को जो ब्रूडर (brooder) है नदी की, उसको लेकर के बाहर में उसका ब्रीडिंग करवा करके उसके मछली के साइज़ को, जो बच्चे रहते हैं उसको बड़ा करके 10 ग्राम तक के बच्चे को फिर नदी में छोड़ा जाता है। उससे क्या होता है कि इनकी सर्वाइवल (survival) नदी में बढ़ जाती है क्योंकि इनके लिए जो है कोई दूसरा उतना ज़्यादा पकड़ नहीं पाते हैं।"
वो आगे कहते हैं, "और फिर ये ऐसा एक्सपेक्टेशन है कि जितना रैंचिंग के माध्यम से मछलियाँ छोड़ी जाती हैं, यदि कुछ भी नहीं मिला मान लीजिए 10% भी इसका सर्वाइव कर गया तो नेक्स्ट एक-दो साल में एक जो रोहू, कतला, नैन ये सब जो हैं लाखों मछलियाँ अंडे देती हैं। तो उससे यदि 10% भी हम मछली जो छोड़ रहे हैं 10% बच गया तो फिर अगले साल एक-दो-तीन साल में उनकी संख्या बढ़ सकती है। तो रैंचिंग एक ज़्यादा इफेक्टिव तरीका हम लोगों को लगा।"
लेकिन मछलियाँ तभी बढ़ेंगी, जब इनके पकड़ने पर रोक लगाई जाए, लेकिन मछली के इस व्यवसाय से हज़ारों घर चलते हैं, उन्हें कैसे रोका जाए, इस पर डॉ धर्म नाथ सलाह देते हैं, "मछली पकड़ने पर कुछ रिस्ट्रिक्शन होना चाहिए। जो जाल जो होता है जिससे मछली पकड़ी जाती है, तो मछुआरे लोगों को अवेयर करके कि ये जो मछलियाँ हैं आईएमसी जो कि अच्छे जल में रहती है, जो गंगा-यमुना की मूल मछली है, उसको आप न पकड़ें, छोटी साइज़ की न पकड़ें, जब बड़ी हो जाती है तभी पकड़ें। ब्रीडिंग सीज़न में ब्रूडर को न पकड़ें।"
"और बाकी जो हमारे बैराज अथॉरिटी है उस सब से कह के कि पानी को कुछ मेंटेन करके छोड़ा जाए। साथ ही बहुत जगह आप देखेंगे सैंड माइनिंग (sand mining) वगैरह भी होता है तो उस पे भी कुछ रिस्ट्रिक्शन यदि लगा दिया जाए तो उससे क्या होता है ब्रीडिंग पीरियड में अंडा सब है अच्छा जो है वहाँ से डिस्टर्बेंस होता है सैंड माइनिंग सब से। तो वो सब यदि थोड़ा सा रुक जाए तो मछलियों को बचाया जा सकता है, "उन्होंने आगे कहा।
आज यमुना नदी एक चेतावनी दे रही है। अगर अब भी हमने उसके बहाव, उसकी जैव विविधता और उसके जीवन को बचाने की कोशिश नहीं की, तो आने वाली पीढ़ियाँ उसमें रहने वाली मछलियों को सिर्फ़ तस्वीरों और किताबों में ही जानेंगी।
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