Economic Survey 2025-26: खेती-किसानी पर क्या कहता है आर्थिक सर्वेक्षण?
Gaon Connection | Jan 29, 2026, 13:31 IST
Economic Survey में भारत की कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के बारे में बात की गई है। Economic Survey में प्राकृतिक खेती, मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार और जल संरक्षण उपायों पर जोर दिया गया है। इसका उद्देश्य लंबे समय तक में खेती को टिकाऊ बनाना और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखना है
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट से पहले संसद में आर्थिक समीक्षा 2026 पेश की, इस बार के Economic Survey में कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया गया है, क्योंकि भारत की लगभग आधी आबादी खेती से जुड़ी है।
दरअसल आर्थिक सर्वेक्षण अर्थव्यवस्था का ‘सर्वे रिपोर्ट कार्ड’ होता है, आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार कृषि और उससे जुड़ी गतिविधियाँ देश की GDP में करीब 16% का योगदान देती हैं, जबकि लगभग 46% आबादी आज भी इस क्षेत्र से जुड़ी है। यही नहीं कृषि आय पिछले दशक में औसतन करीब 5.2% प्रतिवर्ष बढ़ी है। सर्वे के अनुसार कृषि क्षेत्र में रोजगार की हिस्सेदारी लगभग 46% तक बनी हुई है, जो वर्षों से ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों की आजीविका का मुख्य आधार है।आर्थिक समीक्षा में यह भी कहा गया है कि हाल के वर्षों में खाद्यान्नों के उत्पादन में बढ़ोत्तरी हुई है और पशुपालन, मत्स्य पालन और बागवानी जैसेसहयोगी क्षेत्र आय के अवसरों को बेहतर बनाने और ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका को मज़बूत करने में निरंतर महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
आर्थिक समीक्षा में इस को भी दर्ज किया गया है कि पिछले पांच साल के दौरान कृषि और सहयोगी क्षेत्रों में औसत वार्षिक विकास दर स्थिर मूल्य पर 4.4 प्रतिशत रही है। वित्तीय वर्ष 2025-26 की दूसरी तिमाही के दौरान कृषि क्षेत्र की विकास दर 3.5 प्रतिशत रही। दशकीय वृद्धि दर 4.45 प्रतिशत रही, जो कि पिछले दशकों के मुकाबले में ज़्यादा है। यह वृद्धि दर मुख्य रूप से मवेशी (7.1 प्रतिशत) और मछली पकड़ने और उसके पालन (8.8 प्रतिशत) के मामले में सशक्त प्रदर्शन के परिणामस्वरूप संभव हुई है। इसके बाद फसल क्षेत्र का स्थान रहा, जिसमें 3.5 प्रतिशत की वृद्धि दर दर्ज की गई।
वित्तीय वर्ष 2015 से लेकर वित्तीय वर्ष 2024 के दौरान पशुधन क्षेत्र में जबरदस्त वृद्धि दर्ज की गयी। मत्स्य पालन क्षेत्र ने भी बेहतरीन प्रदर्शन किया। साल 2004-14 की तुलना में 2014-2025 के दौरान मछली के उत्पादन में 140 प्रतिशत से भी अधिक (88.14 लाख टन) की बढ़ोत्तरी हुई।
भारत के खाद्यान्न उत्पादन में भी निरंतर वृद्धि हुई है और इसके कृषि वर्ष 2024-25 के दौरान 3,577.3 लाख मीट्रिक टन (एलएमटी) तक पहुंच जाने का अनुमान है, जो कि पिछले वर्ष की तुलना में 254.3 एलएमटी अधिक है। खाद्यान्न उत्पादन में यह बढ़ोतरी चावल, गेहूं, मक्का और मोटे अनाजों (श्री अन्न) की अधिक उपज के कारण संभव हुई है।
बागवानी क्षेत्र, जिसकी कृषि मूल्य वर्धन (जीवीए) में 33 प्रतिशत की हिस्सेदारी है। वर्ष 2024-25 के दौरान, बागवानी क्षेत्र का उत्पादन 362.08 मीट्रिक टन तक पहुंच गया और इसने खाद्यानों के 329.68 एमटी के अनुमानित उत्पादन को पीछे छोड़ दिया। अगस्त 2025 तक, बागवानी क्षेत्र का उत्पादन 2013-14 में 280.70 मिलियन टन से बढ़कर 2024-25 में 367.72 मिलियन टन तक जा पहुंचा।
फलों का उत्पादन 114.51 मिलियन टन, सब्जियों का उत्पादन 219.67 मिलियन टन तथा अन्य बागवानी आधारित फसलों का उत्पादन 33.54 मिलियन टन रहा, जो कि कृषिगत उत्पादन एवं मूल्य में इस क्षेत्र की बढ़ती भूमिका को दर्शाता है।
इसके अलावा, भारत विश्व का सबसे बड़ा प्याज उत्पादक देश बन गया है और प्याज के वैश्विक उत्पादन में 25 प्रतिशत का योगदान दे रहा है। सब्जियों, फलों औरआलू के उत्पादन के मामले में भी भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश बन गया है और वह प्रत्येक श्रेणी के वैश्विक उत्पादन में 12-13 प्रतिशत का योगदान दे रहा है।
बजट 2025-26 में उच्च उत्पादकता वाले बीजों पर राष्ट्रीय मिशन की घोषणा की गई है, जिसका उद्देश्य अनुसंधान इको-सिस्टम को मजबूत करना और जलवायु-सहिष्णु उच्च उत्पादकता वाली बीज किस्मों का विकास और प्रसार करना है। साथ ही, 100 से अधिक नई बीज किस्मों को किसानों तक पहुँचाना भी इस मिशन का लक्ष्य है।
सरकार ने कृषि यंत्रीकऱण उप-मिशन (एसएमएएम) के माध्यम से कृषि यंत्रीकरण को बढ़ावा देने के लिए प्रयास किए हैं। इसके अंतर्गत राज्य सरकारों को कृषि यंत्रों के प्रशिक्षण और प्रदर्शन, कस्टम हायरिंग सेटंर (सीएचसी) की स्थापना, और किसानों को कृषि उपकरणों की खरीद में मदद की जाती है। 2014-15 से 2025-6 के बीच इस योजना के तहत कुल 25, 689 सीएचसी स्थापित किए गए हैं, जिनमें 2025-26 के दौरान (30 अक्टूबर 2025 तक) स्थापित 558 सीएचसी शामिल हैं।
31 दिसंबर 2025 तक 49,796 भंडारण परियोजनाओं को मंजूरी दी गई, जिनके लिए 4,832.70 करोड़ रुपये जारी किए गए, जबकि 25,009 दूसरी परियोजाओं को 2,193.16 करोड़ की सब्सिडी उी गई। खेत स्तर अवसंरचना को और मजबूत करने और निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने के उद्देश्य से कृषि अवसंरचना कोष की शुरुआत की गई है। यह 1 लाख करोड़ की वित्तपोषण सुविधा प्रदान करता है, जिसके अंतर्गत कटाई पश्चात प्रबंधन और सामुदायिक कृषि परियोजनाओं के लिए मध्यम अवधि का ऋण, ब्याज अनुदान व ऋण गारंटी की सुविधा उपलब्ध कराई जाती है।
27 नवंबर 2025 तक, एआईएफ के माध्यम से 1,23,002 करोड़ की राशि जुटाई गई जिससे 39 हजार से अधिक कस्टमर हायरिंग सेंटर, लगभग 25 हजार से अधिक प्रोसेसिंग यूनिट, 17 हजार से अधिक गोदाम, 4 हजार से अधिक छंटाई और ग्रेडिंग यूनिट, 2700 से अधिक कोल्ड स्टोरेज परियोजाएं सहित अन्य सुविधाओं का समर्थन किया गया है।
दरअसल आर्थिक सर्वेक्षण अर्थव्यवस्था का ‘सर्वे रिपोर्ट कार्ड’ होता है, आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार कृषि और उससे जुड़ी गतिविधियाँ देश की GDP में करीब 16% का योगदान देती हैं, जबकि लगभग 46% आबादी आज भी इस क्षेत्र से जुड़ी है। यही नहीं कृषि आय पिछले दशक में औसतन करीब 5.2% प्रतिवर्ष बढ़ी है। सर्वे के अनुसार कृषि क्षेत्र में रोजगार की हिस्सेदारी लगभग 46% तक बनी हुई है, जो वर्षों से ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों की आजीविका का मुख्य आधार है।आर्थिक समीक्षा में यह भी कहा गया है कि हाल के वर्षों में खाद्यान्नों के उत्पादन में बढ़ोत्तरी हुई है और पशुपालन, मत्स्य पालन और बागवानी जैसेसहयोगी क्षेत्र आय के अवसरों को बेहतर बनाने और ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका को मज़बूत करने में निरंतर महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
आर्थिक समीक्षा में इस को भी दर्ज किया गया है कि पिछले पांच साल के दौरान कृषि और सहयोगी क्षेत्रों में औसत वार्षिक विकास दर स्थिर मूल्य पर 4.4 प्रतिशत रही है। वित्तीय वर्ष 2025-26 की दूसरी तिमाही के दौरान कृषि क्षेत्र की विकास दर 3.5 प्रतिशत रही। दशकीय वृद्धि दर 4.45 प्रतिशत रही, जो कि पिछले दशकों के मुकाबले में ज़्यादा है। यह वृद्धि दर मुख्य रूप से मवेशी (7.1 प्रतिशत) और मछली पकड़ने और उसके पालन (8.8 प्रतिशत) के मामले में सशक्त प्रदर्शन के परिणामस्वरूप संभव हुई है। इसके बाद फसल क्षेत्र का स्थान रहा, जिसमें 3.5 प्रतिशत की वृद्धि दर दर्ज की गई।
वित्तीय वर्ष 2015 से लेकर वित्तीय वर्ष 2024 के दौरान पशुधन क्षेत्र में जबरदस्त वृद्धि दर्ज की गयी। मत्स्य पालन क्षेत्र ने भी बेहतरीन प्रदर्शन किया। साल 2004-14 की तुलना में 2014-2025 के दौरान मछली के उत्पादन में 140 प्रतिशत से भी अधिक (88.14 लाख टन) की बढ़ोत्तरी हुई।
भारत के खाद्यान्न उत्पादन में भी निरंतर वृद्धि हुई है और इसके कृषि वर्ष 2024-25 के दौरान 3,577.3 लाख मीट्रिक टन (एलएमटी) तक पहुंच जाने का अनुमान है, जो कि पिछले वर्ष की तुलना में 254.3 एलएमटी अधिक है। खाद्यान्न उत्पादन में यह बढ़ोतरी चावल, गेहूं, मक्का और मोटे अनाजों (श्री अन्न) की अधिक उपज के कारण संभव हुई है।
बागवानी क्षेत्र, जिसकी कृषि मूल्य वर्धन (जीवीए) में 33 प्रतिशत की हिस्सेदारी है। वर्ष 2024-25 के दौरान, बागवानी क्षेत्र का उत्पादन 362.08 मीट्रिक टन तक पहुंच गया और इसने खाद्यानों के 329.68 एमटी के अनुमानित उत्पादन को पीछे छोड़ दिया। अगस्त 2025 तक, बागवानी क्षेत्र का उत्पादन 2013-14 में 280.70 मिलियन टन से बढ़कर 2024-25 में 367.72 मिलियन टन तक जा पहुंचा।
फलों का उत्पादन 114.51 मिलियन टन, सब्जियों का उत्पादन 219.67 मिलियन टन तथा अन्य बागवानी आधारित फसलों का उत्पादन 33.54 मिलियन टन रहा, जो कि कृषिगत उत्पादन एवं मूल्य में इस क्षेत्र की बढ़ती भूमिका को दर्शाता है।
पिछले दशक में भारतीय कृषि की औसत आय में लगभग 5.23% वार्षिक वृद्धि दर्ज की गई है
इसके अलावा, भारत विश्व का सबसे बड़ा प्याज उत्पादक देश बन गया है और प्याज के वैश्विक उत्पादन में 25 प्रतिशत का योगदान दे रहा है। सब्जियों, फलों औरआलू के उत्पादन के मामले में भी भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश बन गया है और वह प्रत्येक श्रेणी के वैश्विक उत्पादन में 12-13 प्रतिशत का योगदान दे रहा है।
बजट 2025-26 में उच्च उत्पादकता वाले बीजों पर राष्ट्रीय मिशन की घोषणा की गई है, जिसका उद्देश्य अनुसंधान इको-सिस्टम को मजबूत करना और जलवायु-सहिष्णु उच्च उत्पादकता वाली बीज किस्मों का विकास और प्रसार करना है। साथ ही, 100 से अधिक नई बीज किस्मों को किसानों तक पहुँचाना भी इस मिशन का लक्ष्य है।
सरकार ने कृषि यंत्रीकऱण उप-मिशन (एसएमएएम) के माध्यम से कृषि यंत्रीकरण को बढ़ावा देने के लिए प्रयास किए हैं। इसके अंतर्गत राज्य सरकारों को कृषि यंत्रों के प्रशिक्षण और प्रदर्शन, कस्टम हायरिंग सेटंर (सीएचसी) की स्थापना, और किसानों को कृषि उपकरणों की खरीद में मदद की जाती है। 2014-15 से 2025-6 के बीच इस योजना के तहत कुल 25, 689 सीएचसी स्थापित किए गए हैं, जिनमें 2025-26 के दौरान (30 अक्टूबर 2025 तक) स्थापित 558 सीएचसी शामिल हैं।
31 दिसंबर 2025 तक 49,796 भंडारण परियोजनाओं को मंजूरी दी गई, जिनके लिए 4,832.70 करोड़ रुपये जारी किए गए, जबकि 25,009 दूसरी परियोजाओं को 2,193.16 करोड़ की सब्सिडी उी गई। खेत स्तर अवसंरचना को और मजबूत करने और निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने के उद्देश्य से कृषि अवसंरचना कोष की शुरुआत की गई है। यह 1 लाख करोड़ की वित्तपोषण सुविधा प्रदान करता है, जिसके अंतर्गत कटाई पश्चात प्रबंधन और सामुदायिक कृषि परियोजनाओं के लिए मध्यम अवधि का ऋण, ब्याज अनुदान व ऋण गारंटी की सुविधा उपलब्ध कराई जाती है।
27 नवंबर 2025 तक, एआईएफ के माध्यम से 1,23,002 करोड़ की राशि जुटाई गई जिससे 39 हजार से अधिक कस्टमर हायरिंग सेंटर, लगभग 25 हजार से अधिक प्रोसेसिंग यूनिट, 17 हजार से अधिक गोदाम, 4 हजार से अधिक छंटाई और ग्रेडिंग यूनिट, 2700 से अधिक कोल्ड स्टोरेज परियोजाएं सहित अन्य सुविधाओं का समर्थन किया गया है।