रबी बुवाई में भरोसे की वापसी: 6.87 लाख हेक्टेयर की बढ़ोतरी, दलहन-तिलहन में उछाल

Gaon Connection | Dec 30, 2025, 15:59 IST
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रबी सीजन 2025-26 में खेती से सकारात्मक संकेत मिले हैं। कुल फसल कवरेज क्षेत्रफल 6.87 लाख हेक्टेयर बढ़ा है, जिसमें दलहन और तिलहन की अहम भूमिका रही।

<p>रबी 2025-26 के ये आंकड़े बताते हैं कि भारतीय खेती केवल मौसम पर निर्भर नहीं रह गई है। यह अब नीति, बाज़ार, तकनीक और अनुभव का संतुलन बनाकर आगे बढ़ रही है।</p>
दिसंबर के आख़िरी हफ्ते में जब उत्तर भारत के खेतों पर कोहरे की चादर बिछी हुई है, उसी वक्त भारत की खेती से एक उम्मीद भरी ख़बर सामने आई है। रबी सीजन में इस बार बुवाई का रकबा न सिर्फ़ बढ़ा है, बल्कि कई अहम फसलों में किसानों का रुझान साफ़ तौर पर मज़बूत होता दिख रहा है।

कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी ताज़ा आँकड़ों के मुताबिक, 26 दिसंबर 2025 तक कुल रबी फसल कवरेज क्षेत्रफल 614.30 लाख हेक्टेयर तक पहुँच गया है। यह आंकड़ा पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 6.87 लाख हेक्टेयर अधिक है। यह बढ़ोतरी सिर्फ़ संख्यात्मक नहीं है, बल्कि यह देश के खेतों में बदलते भरोसे, जोखिम प्रबंधन और बाज़ार संकेतों की कहानी भी कहती है।

दलहन की ओर झुकाव: आत्मनिर्भरता की खेती

इस रबी सीजन की सबसे उल्लेखनीय बात दलहन फसलों के रकबे में 3.65 लाख हेक्टेयर की बढ़ोतरी है। लंबे समय तक दलहन उत्पादन में पिछड़ेपन और आयात निर्भरता की चर्चा करने वाले भारत के लिए यह बदलाव बेहद अहम है।

दलहन के भीतर चना सबसे बड़ी कहानी बनकर उभरा है। चने का रकबा इस साल 4.66 लाख हेक्टेयर बढ़ा है, जो यह दिखाता है कि किसान अब ऐसी फसलों की ओर बढ़ रहे हैं जो: कम पानी में भी बेहतर उपज देती हैं, मिट्टी की उर्वरता बनाए रखती हैं, बाज़ार में स्थिर मांग रखती हैं।

मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में चने की बढ़ती बुवाई इस बात का संकेत है कि किसान अब केवल परंपरा नहीं, बल्कि लाभ और जोखिम दोनों को तौलकर फैसले ले रहे हैं।

गेहूं: स्थिरता की फसल, भरोसे का आधार

देश की रबी खेती का मेरुदंड कहे जाने वाले गेहूं में इस साल स्थिति लगभग स्थिर बनी हुई है।

कुल बोया गया क्षेत्र: 322.68 लाख हेक्टेयर

पिछले वर्ष की समान अवधि से बढ़ोतरी: 0.19 लाख हेक्टेयर

यह मामूली बढ़ोतरी भले ही बड़ी न लगे, लेकिन बदलते मौसम, कोहरे, शीत दिवस और लागत बढ़ने के बावजूद गेहूं का स्थिर रहना बताता है कि किसान अभी भी इसे अपनी खाद्य सुरक्षा और न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के भरोसे की फसल मानते हैं।

तिलहन में मजबूती: तेल आत्मनिर्भरता की दिशा

खाद्य तेल आयात पर भारी निर्भरता झेल रहे भारत के लिए तिलहन फसलों के आंकड़े राहत देने वाले हैं। इस साल तिलहन का कुल रकबा 1.04 लाख हेक्टेयर बढ़ा है। इसमें सबसे बड़ा योगदान सरसों और सफेद सरसों का रहा, जहाँ 1.23 लाख हेक्टेयर की बढ़ोतरी दर्ज की गई।

सरसों की खेती में यह उछाल बताता है कि किसान अब तेलहन को सिर्फ़ सहायक फसल नहीं, बल्कि मुख्य नकदी फसल के रूप में देख रहे हैं। बेहतर MSP, प्रोसेसिंग यूनिट्स की उपलब्धता और स्थानीय बाज़ारों में मांग ने इसमें अहम भूमिका निभाई है।

श्री अन्न और मोटे अनाज

सरकार द्वारा प्रोत्साहित किए जा रहे श्री अन्न (मोटे अनाज) में कुल मिलाकर 0.10 लाख हेक्टेयर की मामूली बढ़ोतरी हुई है। हालाँकि ज्वार जैसे कुछ अनाजों में गिरावट दिखी है, लेकिन रागी और जौ जैसी फसलों में स्थिरता बनी हुई है। विशेषज्ञ मानते हैं कि मोटे अनाजों में बदलाव क्षेत्रीय जलवायु, पशुपालन की ज़रूरत और स्थानीय उपभोग पैटर्न से गहराई से जुड़ा है।

चावल और मक्का

रबी चावल का रकबा इस वर्ष 1.89 लाख हेक्टेयर बढ़ा है, जो सिंचाई सुविधाओं और दक्षिण व पूर्वी भारत में जल उपलब्धता से जुड़ा हुआ है। वहीं मक्का में 0.8 लाख हेक्टेयर की बढ़ोतरी यह संकेत देती है कि पशु आहार और औद्योगिक मांग मक्का को एक महत्वपूर्ण रबी विकल्प बनाए हुए है।

खेतों में बदलती सोच: क्यों बढ़ रहा है रकबा?

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, इस साल रबी बुवाई में बढ़ोतरी के पीछे कई कारण एक साथ काम कर रहे हैं: खरीफ सीजन में अपेक्षाकृत बेहतर बारिश, जलाशयों में पर्याप्त पानी, दलहन और तिलहन के बेहतर दाम, फसल विविधीकरण पर सरकारी ज़ोर दिया जा रहा है।
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