गोबरधन योजना: कृषि कचरा बन सकता है आय का नया ज़रिया,जानिए कैसे करें इसके लिए आवेदन

Gaon Connection | Feb 17, 2026, 15:31 IST
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भारत में हर साल 35 करोड़ टन कृषि कचरा पैदा होता है, जिसे अब तक बोझ समझा जाता था। लेकिन सरकारी योजनाएं और नई सोच इस "कचरे" को बिजली, खाद और स्वच्छ ईंधन में बदल रही हैं। गोबरधन जैसी पहल से गाँव-गाँव में बायोगैस प्लांट लग रहे हैं और किसानों की जेब में अतिरिक्त आमदनी भी आ रही है।
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भारत में हर साल करीब 35 करोड़ टन कृषि कचरा पैदा होता है जैसे फसलों के अवशेष, भूसा, पराली, पशुओं का गोबर और खाने-पीने की बर्बादी। पहले यह सब या तो जलाया जाता था या यूं ही सड़ता रहता था। लेकिन अब सोच बदल रही है। नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के मुताबिक, इस कृषि कचरे में सालाना 18,000 मेगावाट से ज़्यादा बिजली पैदा करने की ताकत है। ज़रा सोचिए, जो चीज़ धुएं में उड़ जाती थी, वो लाखों घरों के बल्ब जला सकती है।

गोबरधन, गोबर से भी बन रहा है धन

सरकार की गोबरधन योजना इस बदलाव की रीढ़ बन रही है। इसका पूरा नाम है "गैल्वनाइजिंग ऑर्गेनिक बायो-एग्रो रिसोर्सेज धन" यानी जैविक कचरे से धन बनाना। योजना के तहत गोबर, फसल अवशेष और खाने का बचा-खुचा कचरा मिलकर बायोगैस और जैविक खाद में बदल जाते हैं। 14 जनवरी 2026 तक देश के 51 फीसदी से ज़्यादा ज़िलों में 979 बायोगैस प्लांट काम कर रहे हैं। ये संयंत्र किसानों को सस्ता ईंधन देते हैं, रासायनिक खाद की ज़रूरत कम करते हैं और गाँव की हवा साफ रखते हैं।

पराली नहीं जलाएंगे, मशीनें संभाल लेंगी

पंजाब और हरियाणा की पराली जलाने की समस्या देश भर में चर्चा में रहती है। इससे निपटने के लिए फसल अवशेष प्रबंधन (CRM) योजना के तहत साल 2018-19 से अब तक 3,926 करोड़ रुपये की मदद दी गई है। इसके साथ 42,000 से ज़्यादा कस्टम हायरिंग केंद्र बने हैं और 3.24 लाख मशीनें किसानों को उपलब्ध कराई गई हैं। ये मशीनें पराली को खेत की मिट्टी में मिला देती हैं, जिससे ज़मीन उपजाऊ बनती है और धुआं नहीं उठता।

बुनियादी ढांचे में भी बड़ा निवेश

कृषि अवसंरचना कोष (AIF) के ज़रिए अब तक 1,13,419 परियोजनाओं में 66,310 करोड़ रुपये मंज़ूर किए गए हैं। इसमें कोल्ड स्टोरेज, गोदाम, प्रसंस्करण केंद्र और कस्टम हायरिंग सेंटर शामिल हैं। इन सुविधाओं से कटाई के बाद होने वाली बर्बादी कम होती है और किसानों को उनकी फसल का सही दाम मिलता है। पशुपालन अवसंरचना विकास कोष (AHIDF) के 15,000 करोड़ रुपये से पशुधन क्षेत्र में भी "कचरे से संपदा" का काम हो रहा है। गाय-भैंस का गोबर बायोगैस बनाता है, खाल और हड्डियां भी अब बेकार नहीं जातीं, इनसे उद्योग चलते हैं और नए रोज़गार बनते हैं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगर यही रफ्तार रही तो भारत की चक्रीय अर्थव्यवस्था 2050 तक 2 ट्रिलियन डॉलर की हो सकती है और इससे 1 करोड़ नए रोज़गार बन सकते हैं।

आप भी जुड़ सकते हैं गोबरधन से

गोबर्धन योजना से जुड़ने के दो आसान रास्तें हैं। पहला अपनी ग्राम पंचायत में जाइए और बताइए कि आप गोबरधन से जुड़ना चाहते हैं। वहाँ स्व-सहायता समूह (SHG), किसान उत्पादक संगठन (FPO) या दूध सहकारी समिति के ज़रिए पात्रता जाँची जाती है। एक बार चुने जाने के बाद सरकारी टीम प्रोजेक्ट बनाने और प्लांट लगवाने में मदद करती है। हर जिले में सामुदायिक बायोगैस संयंत्र के लिए 50 लाख रुपये तक की सरकारी सहायता मिल सकती है।

दूसरा रास्ता उन किसानों और उद्यमियों के लिए है जो खुद प्लांट लगाना चाहते हैं। gobardhan.sbm.gov.in पर जाइए, "Register Your Biogas Plant" पर क्लिक करिए, User ID बनाइए और अपनी ज़मीन, पशु और ज़रूरत की जानकारी भरिए। यह पंजीकरण पूरी तरह मुफ्त है। बायो-CNG या CBG संयंत्र लगाने के इच्छुक gobardhan.co.in पर जा सकते हैं। इस योजना की खासियत यह है कि जल शक्ति, कृषि, पशुपालन और ऊर्जा, चार मंत्रालय एक साथ काम करते हैं, इसलिए किसान को अलग-अलग दफ्तर के चक्कर नहीं काटने पड़ते। खेत का कचरा अब बोझ नहीं, यह देश की नई ताकत है और इस ताकत का हिस्सा बनना अब पहले से कहीं ज़्यादा आसान है।
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