Heart Failure इलाज हुआ भारी: 17% परिवार कर्ज या संपत्ति बेचने को मजबूर, 70% के पास नहीं हेल्थ इंश्योरेंस

Gaon Connection | Mar 23, 2026, 18:35 IST
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भारत में हार्ट फेल्योर से ग्रसित मरीजों पर चिकित्सा का वित्तीय दबाव बढ़ता जा रहा है। दस में से सात मरीज ऐसे हैं जिनके पास स्वास्थ्य बीमा नहीं है, जिसके कारण उन्हें उपचार के खर्च स्वयं उठाने पड़ते हैं।
हार्ट फेलियर मरीजों के पास नही्ं बीमा
हार्ट फेलियर मरीजों के पास नही्ं बीमा
देशभर के 21 राज्यों में करीब दो हजार हार्ट फेलियर मरीजों के परिवार पर हुई स्टडी में दावा किया गया है कि इलाज और उसके खर्च का असर ऐसा है कि 17 फीसदी लोग कर्ज लेने या संपत्ति बेचने पर मजबूर हैं। एक तिहाई परिवारों की आय तक घट गई।

हार्ट फेल्योर के मरीजों पर इलाज का भारी बोझ पड़ रहा है। भारत में 10 में से 7 हार्ट फेल्योर मरीजों के पास हेल्थ इंश्योरेंस नहीं है। इसके चलते वे इलाज का 90% से ज्यादा खर्च अपनी जेब से उठाते हैं। इस वजह से हर तीसरे परिवार की आय घट गई है और 17.7% परिवारों को कर्ज लेना पड़ा या अपनी संपत्ति बेचनी पड़ी। यह खुलासा देश के 21 सरकारी अस्पतालों में 1,859 मरीजों पर हुए एक अध्ययन में हुआ है, जो ग्लोबल हार्ट जर्नल में प्रकाशित हुआ है।

इलाज का भारी बोझ, आय पर सीधा असर

हार्ट फेल्योर, यानी दिल की गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों के लिए इलाज एक बड़ी चुनौती बन गया है। देश भर के 21 सरकारी अस्पतालों में किए गए एक अध्ययन में यह बात सामने आई है कि करीब 70% यानी 10 में से 7 मरीजों के पास कोई हेल्थ इंश्योरेंस नहीं है। इसका मतलब है कि उन्हें इलाज का ज्यादातर खर्च खुद उठाना पड़ता है। अध्ययन के मुताबिक, इन मरीजों को हर साल औसतन ₹1,06,566 खर्च करने पड़ते हैं, जो उनके कुल स्वास्थ्य खर्च का 92.6% है। यानी इलाज का लगभग पूरा पैसा मरीज और उनके परिवार को अपनी कमाई से देना पड़ता है।

इस आर्थिक तंगी का सीधा असर लोगों की आमदनी पर भी पड़ा है। अध्ययन में पाया गया कि लगभग 32.3% मरीजों और 36.2% परिवारों की मासिक आय पिछले एक साल में कम हो गई है। यह दिखाता है कि बीमारी के साथ-साथ आर्थिक बोझ भी लोगों को परेशान कर रहा है।

कर्ज और संपत्ति बेचने की नौबत

जब इलाज का खर्च बहुत ज्यादा हो जाता है, तो लोगों को मजबूरी में कर्ज लेना पड़ता है या अपनी जमा-पूंजी खर्च करनी पड़ती है। अध्ययन में यह भी पता चला कि 37.7% परिवारों को 'कैटास्ट्रॉफिक हेल्थ स्पेंडिंग' यानी बहुत ज्यादा स्वास्थ्य खर्च का सामना करना पड़ा। यह तब होता है जब स्वास्थ्य पर होने वाला खर्च परिवार की कुल आय का एक बड़ा हिस्सा बन जाता है। इससे भी बुरी बात यह है कि 17.7% परिवारों को तो कर्ज लेने, अपनी बचत खत्म करने या फिर अपनी संपत्ति बेचने तक की नौबत आ गई। यह स्थिति हार्ट फेल्योर जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज की महंगी प्रकृति को दर्शाती है।

बीमा वालों की स्थिति बेहतर

जिन मरीजों के पास हेल्थ इंश्योरेंस था, उनकी स्थिति उन लोगों से थोड़ी बेहतर थी जिनके पास बीमा नहीं था। बीमा होने से इलाज का खर्च कम हो जाता है। अध्ययन में देखा गया कि बीमा धारकों में अत्यधिक खर्च का प्रतिशत 30.8% था, जबकि बिना बीमा वालों में यह आंकड़ा 40.3% तक पहुँच गया। इसी तरह, कर्ज लेने या मजबूरी में खर्च करने वाले बीमा धारकों का प्रतिशत 13.6% था, जो बिना बीमा वालों के 18.9% से कम है। इससे साफ है कि हेल्थ इंश्योरेंस लोगों को बड़े आर्थिक झटकों से बचाने में मदद करता है।

विशेषज्ञों की राय और आगे की राह

विशेषज्ञों का कहना है कि हार्ट फेल्योर जैसी बीमारियों में लंबे समय तक इलाज और दवाओं की जरूरत पड़ती है, जिससे खर्च लगातार बढ़ता जाता है। ऐसे में, अगर स्वास्थ्य बीमा का कवरेज नहीं बढ़ाया गया और सरकारी सहायता भी कम रही, तो यह आर्थिक बोझ एक बड़ी सामाजिक समस्या बन सकता है। यह अध्ययन ग्लोबल हार्ट जर्नल में 12 मार्च को प्रकाशित हुआ है। इसमें पीजीआई चंडीगढ़ और संजय गांधी अस्पताल, लखनऊ जैसे देश भर के 21 अस्पतालों के मरीजों के खर्च का डेटा शामिल किया गया है। त्रिवेंद्रम के चित्रा तिरुनाल मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर पी जीमन इस अध्ययन के प्रमुख लेखक हैं।
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