Holi: देसी गाय के गोबर के कंडों की राख, फूल, पत्तियों से बन रहा गुलाल, ग्रामीण महिलाओं की आत्मनिर्भरता की कहानी

Gaon Connection | Mar 03, 2026, 15:43 IST
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उत्तर प्रदेश में इस होली रंगों के साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था का भी उत्सव मनाया जा रहा है। योगी आदित्यनाथ सरकार की पहल पर प्राकृतिक तत्वों से ऑर्गेनिक गुलाल तैयार हो रहा है। यह गुलाल गाय के गोबर की राख, गुलाब, चुकंदर और पालक जैसी चीजों से बनता है। इससे पर्यावरण सुरक्षित रहता है और त्वचा को नुकसान नहीं होता।
गोबर से बन रहे हैं Organic रंग
गोबर से बन रहे हैं Organic रंग
होली का खुमार लोगों पर छाने लगा है। होली पर सिंथेटिक रंगों की भी भरमार रहती है, जो सेहत के लिए ख़राब होते हैं। कैमिकल रंगों के इस्तेमाल से चेहरे पर एलर्जी जाने के साथ आंखों की रोशनी भी चली जाती है। लेकिन इस होली हम आपके एक ऐसे बिजनेस के बारे में बताने जा रहे हैं जो पूरी तरह से हेल्दी है।

इस बार उत्तर प्रदेश में होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि गांवों की अर्थव्यवस्था, गोसंवर्धन और महिला सशक्तिकरण का उत्सव बन रही है। योगी आदित्यनाथ सरकार की गोसंवर्धन नीति के तहत प्रदेश के कई जिलों में पूरी तरह प्राकृतिक तत्वों से ‘ऑर्गेनिक गुलाल’ तैयार किया जा रहा है। यह पहल न सिर्फ पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित है, बल्कि ग्रामीण महिलाओं के लिए आय का नया जरिया भी बन रही है।

प्रकृति से बने रंग, सुरक्षित होली की ओर कदम

बाजार में मिलने वाले केमिकल युक्त रंगों से त्वचा और आंखों को नुकसान पहुंचने की शिकायतें आम हैं। ऐसे में गांवों की महिलाएं देसी गाय के गोबर के कंडों की राख, गुलाब की पंखुड़ियाँ, चुकंदर, पालक, जामुन की पत्तियाँ और नील (इंडिगो) जैसे प्राकृतिक तत्वों से गुलाल तैयार कर रही हैं। यह गुलाल पूरी तरह इको-फ्रेंडली है और त्वचा के लिए सुरक्षित माना जा रहा है। रंगों की खुशबू भी प्राकृतिक है, जिससे त्योहार का आनंद दोगुना हो जाता है।

गोबर की राख का वैज्ञानिक आधार

इस ऑर्गेनिक गुलाल की खासियत है देसी गाय के गोबर के कंडों की राख। पारंपरिक रूप से इसे शुद्धिकारक माना जाता रहा है। वैज्ञानिक दृष्टि से इसमें क्षारीय तत्व पाए जाते हैं, जो नमी को कम करने और सूक्ष्मजीवों की वृद्धि को रोकने में सहायक होते हैं। प्रसंस्करण के बाद यह राख गुलाल को मुलायम आधार देती है, जिससे किसी कृत्रिम केमिकल या फिलर की जरूरत नहीं पड़ती।

गाँव-गाँव में रोजगार की बहार

यह पहल केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं है। बुलंदशहर, मथुरा, बिजनौर, सहारनपुर, संभल, उरई और मुरादाबाद सहित प्रदेश के कई जिलों में बड़े पैमाने पर महिलाएं इस काम से जुड़ रही हैं। गोशालाओं से प्राप्त सामग्री का उपयोग कर वे गुलाल तैयार कर रही हैं, जिसकी बाजार में अच्छी माँग है। इससे एक ओर गोवंश संरक्षण को बढ़ावा मिल रहा है, तो दूसरी ओर ग्रामीण महिलाओं की आमदनी भी बढ़ रही है।

त्योहार के साथ बदलाव की बयार

होली रंगों का त्योहार है, लेकिन इस बार यह बदलाव का भी प्रतीक बन रही है। गोमाता से जुड़े प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग कर तैयार यह गुलाल न केवल परंपरा और विज्ञान का संगम है, बल्कि आत्मनिर्भर गांवों की दिशा में मजबूत कदम भी है। पर्यावरण अनुकूल उत्पादों के जरिए ग्रामीण महिलाएं यह संदेश दे रही हैं कि त्योहार मनाने का तरीका भी प्रकृति के साथ सामंजस्य में हो सकता है। इस होली, जब रंग उड़े तो उनमें प्रकृति की खुशबू और गाँव की मेहनत की मिठास भी शामिल हो, यही इस पहल की असली सफलता है।
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