Peppermint Farming: बदलते मौसम का मेंथा ऑयल पर कितना असर? 13 साल की रिसर्च में हुआ बड़ा खुलासा

Preeti Nahar | May 12, 2026, 13:32 IST
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वैज्ञानिकों ने 13 साल तक मेंथा की खेती पर शोध किया। उन्होंने पाया कि बदलते मौसम से मेंथा ऑयल के उत्पादन में 5 गुना तक का अंतर आया। हालांकि, मेंथॉल की गुणवत्ता स्थिर रही। जुलाई का गर्म मौसम तेल उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण पाया गया। किसानों को अब जलवायु परिवर्तन के अनुसार खेती की नई तकनीकें अपनानी होंगी।

मेंथा भारत समेत दुनिया के कई देशों में बड़े स्तर पर उगाई जाने वाली महत्वपूर्ण औषधीय और सुगंधित फसल है। इसका उपयोग दवा, कॉस्मेटिक, टूथपेस्ट, फ्लेवरिंग प्रोडक्ट्स और परफ्यूम इंडस्ट्री में बड़े पैमाने पर किया जाता है। लेकिन अब जलवायु परिवर्तन के दौर में किसानों और इंडस्ट्री दोनों के सामने बड़ा सवाल है कि बदलते तापमान और बारिश का मेंथा ऑयल की गुणवत्ता और उत्पादन पर कितना असर पड़ रहा है। इसी सवाल का जवाब देने के लिए वैज्ञानिकों ने 13 साल तक लगातार रिसर्च की और चौंकाने वाले नतीजे सामने आए।



13 साल तक चला अध्ययन

यह रिसर्च अंतरराष्ट्रीय जर्नल Industrial Crops and Products में प्रकाशित हुई। इसमें 2010 से 2022 तक Mentha piperita cv. Kristinka किस्म के पुदीने पर अध्ययन किया गया। वैज्ञानिकों ने हर साल तापमान, बारिश, आवश्यक तेल (Essential Oil) की मात्रा और उसकी गुणवत्ता का विश्लेषण किया। शोध में पाया गया कि मौसम में साल-दर-साल बड़ा बदलाव देखने को मिला। औसत वार्षिक तापमान 7.7 डिग्री सेल्सियस से 10.2 डिग्री सेल्सियस तक रहा, जबकि सालाना बारिश 454.5 मिमी से 887.1 मिमी तक रिकॉर्ड की गई।



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मेंथा ऑयल उत्पादन में 5 गुना अंतर

शोध का सबसे बड़ा खुलासा यह रहा कि अलग-अलग वर्षों में मेंथा ऑयल उत्पादन में भारी अंतर देखा गया। 2011 में सबसे कम 0.8% तेल उत्पादन हुआ, जबकि 2021 और 2022 में यह बढ़कर 4% तक पहुंच गया। यानी कुछ वर्षों में उत्पादन 5 गुना तक बढ़ गया। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह बदलाव सीधे तौर पर मौसम और पौधों की ग्रोथ अवधि से जुड़ा हुआ है।



मेंथॉल की गुणवत्ता रही स्थिर

अच्छी बात यह रही कि पुदीने के तेल में सबसे महत्वपूर्ण तत्व मेंटहॉल की मात्रा काफी हद तक स्थिर रही। अध्ययन के दौरान औसतन मेंथॉल कंटेंट करीब 69.9% रहा। सबसे ज्यादा 73.5% और सबसे कम 66.3% दर्ज किया गया। इसका मतलब है कि जलवायु परिवर्तन के बावजूद मेंथा ऑयल की मुख्य गुणवत्ता पर ज्यादा असर नहीं पड़ा।



जुलाई का मौसम सबसे अहम

वैज्ञानिकों ने पाया कि पूरे साल के औसत तापमान और बारिश का सीधा संबंध तेल उत्पादन से बहुत मजबूत नहीं था। लेकिन जुलाई महीने के तापमान का असर ज्यादा देखने को मिला। जुलाई के दौरान गर्म मौसम में तेल उत्पादन बेहतर रहा। इसका मतलब है कि फसल की ग्रोथ और कटाई के अहम समय का मौसम ज्यादा मायने रखता है।



सूखा और ज्यादा बारिश दोनों चुनौती

रिसर्च में यह भी बताया गया कि अत्यधिक सूखा, पानी की कमी और असामान्य बारिश पौधों की वृद्धि और तेल की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती है। कुछ मामलों में ज्यादा पानी से बायोमास बढ़ा लेकिन तेल की गुणवत्ता कम हुई, जबकि सूखे की स्थिति में पौधों पर तनाव बढ़ा।



किसानों के लिए क्या है सीख?

विशेषज्ञों का मानना है कि मेंथा किसानों को अब केवल पारंपरिक खेती पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। उन्हें मौसम पूर्वानुमान, सिंचाई प्रबंधन, सही कटाई समय और बेहतर किस्मों पर ध्यान देना होगा। बदलते मौसम को देखते हुए “क्लाइमेट स्मार्ट फार्मिंग” अपनाना जरूरी हो गया है। भारत में मेंथा ऑयल का बड़ा बाजार है और इसका इस्तेमाल फार्मा, FMCG और एक्सपोर्ट सेक्टर में होता है।



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ऐसे में यह रिसर्च बताती है कि कंपनियों को भी भविष्य की रणनीति मौसम आधारित डेटा और बेहतर सप्लाई चेन के आधार पर बनानी होगी। उत्तर प्रदेश के बाराबंकी, सीतापुर, रायबरेली, बदायूं, बरेली जैसे जिलों में देश के कुल मेंथा का 90% उत्पादन होता है। बाकी का 10% उत्पादन गुजरात और पंजाब आदि राज्यों से होता है।



क्या कहती है रिसर्च?

वैज्ञानिकों ने निष्कर्ष निकाला कि आने वाले समय में सिर्फ सालाना तापमान और बारिश के आधार पर उत्पादन का अनुमान लगाना मुश्किल होगा। इसके लिए फसल की ग्रोथ अवधि, मौसम के चरम बदलाव और कृषि प्रबंधन को साथ लेकर नई रणनीति बनानी होगी। कुल मिलाकर यह रिसर्च मेंथा किसानों के लिए बड़ा संकेत है कि जलवायु परिवर्तन अब सिर्फ मौसम की खबर नहीं, बल्कि उनकी कमाई और उत्पादन से सीधे जुड़ा मुद्दा बन चुका है।

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