भारत-इज़राइल साझेदारी: फिशरीज और एक्वाकल्चर में सहयोग बढ़ाने पर जोर
इज़राइल के एलात शहर में आयोजित “ब्लू फूड सिक्योरिटी: सी द फ्यूचर 2026” वैश्विक शिखर सम्मेलन में भारत ने खाद्य सुरक्षा और ब्लू इकोनॉमी को लेकर अपनी मजबूत भूमिका पेश की। केंद्रीय
इज़राइल में आयोजित “ब्लू फूड सिक्योरिटी: सी द फ्यूचर 2026” वैश्विक शिखर सम्मेलन में जब दुनिया के कई देशों के मंत्री और नीति-निर्माता एक मंच पर जुटे, तो चर्चा का केंद्र सिर्फ़ समुद्र नहीं था, बल्कि उससे जुड़ी करोड़ों ज़िंदगियाँ भी थीं। इसी मंच पर भारत ने अपनी बात सिर्फ़ आँकड़ों के ज़रिये नहीं, बल्कि किसानों, मछुआरों और तटीय समुदायों के अनुभवों के साथ रखी।
केंद्रीय मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्री राजीव रंजन सिंह के नेतृत्व में भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने साफ़ संदेश दिया कि भारत ब्लू इकोनॉमी को केवल आर्थिक अवसर के रूप में नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा, रोज़गार और पर्यावरण संतुलन के साझा भविष्य के रूप में देखता है।
के एलात शहर में सम्मेलन के दौरान आयोजित ग्लोबल मिनिस्टीरियल पैनल डिस्कशन में भारत ने अपने मत्स्य क्षेत्र की उपलब्धियों को दुनिया के सामने रखा। मंत्री ने बताया कि पिछले एक दशक में भारत ने मत्स्य उत्पादन, एक्वाकल्चर विस्तार और निर्यात के क्षेत्र में तेज़ प्रगति की है। आज भारत दुनिया के अग्रणी मत्स्य उत्पादक देशों में शामिल है और लाखों छोटे मछुआरे, महिला स्वयं सहायता समूह और ग्रामीण उद्यमी इस बदलाव का हिस्सा बन चुके हैं। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि भारत का अनुभव दिखाता है कि अगर तकनीक, नीति और ज़मीनी स्तर के लोगों की भागीदारी एक साथ आए, तो समुद्र आधारित खाद्य सुरक्षा को मज़बूत किया जा सकता है।
यह चर्चा सिर्फ़ मंच तक सीमित नहीं रही। भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने इज़राइल के नेशनल सेंटर फॉर मैरिकल्चर (NCM), एलात का दौरा भी किया, जो समुद्री एक्वाकल्चर नवाचार का प्रमुख केंद्र माना जाता है। यहाँ उन्हें मछलियों और झींगों की उन्नत ब्रूडस्टॉक तकनीक, आधुनिक हैचरी सिस्टम, इंटीग्रेटेड मल्टी-ट्रॉफिक एक्वाकल्चर (IMTA) मॉडल और रोग प्रबंधन के नए तरीकों के बारे में जानकारी दी गई। इन प्रयोगशालाओं और फार्मों को देखकर प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों को यह समझने का मौका मिला कि कैसे सीमित जल संसाधनों के बावजूद इज़राइल समुद्री खेती में उच्च उत्पादकता हासिल कर रहा है।
भारत और इज़राइल के बीच बातचीत में यह सहमति उभरी कि दोनों देश मिलकर संयुक्त अनुसंधान, तकनीक हस्तांतरण और प्रशिक्षण कार्यक्रमों पर काम करेंगे। भारत के तटीय राज्यों जैसे आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और केरल में समुद्री खेती की अपार संभावनाएँ हैं, लेकिन वहाँ जलवायु परिवर्तन, समुद्री रोग, चक्रवात और बाज़ार तक पहुँच जैसी चुनौतियाँ भी मौजूद हैं। इज़राइल के साथ सहयोग से भारत इन चुनौतियों से निपटने के लिए उन्नत समाधान विकसित कर सकता है, जिन्हें भारतीय परिस्थितियों के अनुसार ढाला जा सके।
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इस सम्मेलन में भाग लेने वाले अन्य देशों के प्रतिनिधियों के साथ भी भारत ने अनुभव साझा किए। घाना और अज़रबैजान जैसे देशों के मंत्रियों के साथ हुई बातचीत में यह बात सामने आई कि दुनिया के कई विकासशील देश एक जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं- बढ़ती आबादी, घटते संसाधन और बदलता मौसम। ऐसे में “ब्लू फूड” यानी समुद्र से मिलने वाले भोजन को भविष्य की खाद्य सुरक्षा का अहम हिस्सा माना जा रहा है। भारत ने इस मंच से यह भी स्पष्ट किया कि टिकाऊ मत्स्य पालन केवल उत्पादन बढ़ाने का सवाल नहीं है, बल्कि यह समुद्री पारिस्थितिकी को बचाने, मछुआरों की आजीविका सुरक्षित करने और अगली पीढ़ी के लिए संसाधन बचाने का भी मामला है।
भारत के लिए यह सम्मेलन इसलिए भी महत्वपूर्ण रहा क्योंकि देश में मत्स्य पालन क्षेत्र तेज़ी से बदल रहा है। सरकार की योजनाओं के तहत आधुनिक मछली बंदरगाह, कोल्ड चेन नेटवर्क, प्रोसेसिंग यूनिट और डिजिटल मार्केटिंग प्लेटफॉर्म विकसित किए जा रहे हैं। तटीय और अंतर्देशीय दोनों क्षेत्रों में एक्वाकल्चर को बढ़ावा दिया जा रहा है, ताकि किसान केवल खेती पर निर्भर न रहें और जल आधारित आजीविका से भी आय बढ़ा सकें। इज़राइल जैसे देशों से तकनीकी सहयोग इस बदलाव को और तेज़ कर सकता है।
सम्मेलन के दौरान यह बात बार-बार सामने आई कि ब्लू इकोनॉमी का मतलब केवल समुद्र से मुनाफ़ा कमाना नहीं है। यह समुद्र के साथ संतुलन बनाकर आगे बढ़ने का रास्ता है। भारत ने यह भी रेखांकित किया कि जलवायु परिवर्तन के दौर में समुद्री संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है। समुद्र का तापमान बढ़ रहा है, मछलियों के प्रवास के पैटर्न बदल रहे हैं और तटीय इलाकों में कटाव और तूफ़ानों का ख़तरा बढ़ रहा है। ऐसे में विज्ञान आधारित नीतियाँ, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और स्थानीय समुदायों की भागीदारी ही टिकाऊ समाधान दे सकती है।
इज़राइल यात्रा के दौरान भारत और इज़राइल के अधिकारियों ने यह भी चर्चा की कि कैसे संयुक्त प्रशिक्षण कार्यक्रमों के ज़रिये भारतीय युवाओं और शोधकर्ताओं को समुद्री खेती की आधुनिक तकनीकों से जोड़ा जा सकता है। इससे न केवल कौशल विकास होगा, बल्कि भारत में नए स्टार्टअप और उद्यम भी उभर सकते हैं, जो ब्लू इकोनॉमी को नई दिशा देंगे।
कुल मिलाकर, “ब्लू फूड सिक्योरिटी: सी द फ्यूचर 2026” समिट में भारत की मौजूदगी केवल एक औपचारिक भागीदारी नहीं थी। यह भारत की उस सोच का संकेत थी, जिसमें समुद्र को संसाधन नहीं बल्कि साझेदार माना जाता है। खाद्य सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास तीनों को एक साथ आगे बढ़ाने की यह कोशिश आने वाले वर्षों में भारत की वैश्विक भूमिका को और मज़बूत कर सकती है।
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