समुद्र और तालाब से उम्मीद: भारत में मछली पालन बना मज़बूत आजीविका का आधार
Gaon Connection | Jan 14, 2026, 18:06 IST
कभी सिर्फ़ गुज़ारे भर का साधन माने जाने वाला मत्स्य पालन आज भारत में रोज़गार, आय और सुरक्षा का मज़बूत आधार बन रहा है। सरकारी योजनाओं, बेहतर तकनीक और बाज़ार तक पहुँच से मछुआरों और मछली पालने वाले किसानों की ज़िंदगी में बड़ा बदलाव आया है।
समुद्र किनारे रहने वाले मछुआरे हों या गाँव के तालाबों में मछली पालने वाले किसान, भारत में करोड़ों परिवारों की रोज़ी-रोटी पानी से जुड़ी है। कभी यह काम सिर्फ़ गुज़ारे भर का साधन माना जाता था, लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। सरकार के ताज़ा आँकड़े बताते हैं कि मत्स्य पालन आज भारत की तेज़ी से बढ़ती आजीविका और खेती से जुड़ी अर्थव्यवस्था का मज़बूत स्तंभ बन चुका है।
पिछले दस वर्षों में भारत का मछली उत्पादन दोगुने से भी ज़्यादा हो गया है। साल 2013-14 में जहाँ देश में करीब 96 लाख टन मछली पैदा होती थी, वहीं 2024-25 में यह आंकड़ा लगभग 198 लाख टन तक पहुँच गया। इसका मतलब सिर्फ़ इतना नहीं कि मछली ज़्यादा पैदा हो रही है, बल्कि यह भी कि लाखों परिवारों की आमदनी और रोज़गार के मौके बढ़े हैं।
आज भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मछली उत्पादक देश है। देश की लगभग तीन करोड़ से ज़्यादा आबादी, मछुआरे, मछली पालक, महिलाएँ, मज़दूर और छोटे व्यापारी, किसी न किसी रूप में इस काम से जुड़े हैं। तटीय इलाक़ों से लेकर गाँवों के तालाबों तक, मत्स्य पालन अब सिर्फ़ परंपरा नहीं, बल्कि एक संगठित आजीविका बनता जा रहा है।
ये भी पढ़ें: मछली पालन का भविष्य: स्वदेशी प्रजातियाँ बन सकती हैं सबसे बड़ा सहारा
इस बदलाव के पीछे बड़ी वजह हैं बीते कुछ सालों में शुरू की गई सरकारी योजनाएँ। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना, नीली क्रांति और मत्स्य अवसंरचना से जुड़ी योजनाओं के तहत हज़ारों करोड़ रुपये का निवेश किया गया। इससे तालाबों का सुधार हुआ, हैचरी बनीं, ठंडा भंडारण, मछली परिवहन और बाज़ार तक पहुँच आसान हुई।
इसका सीधा असर मछुआरों की ज़िंदगी पर पड़ा है। पहले जहाँ मछली पकड़ना जोखिम भरा काम था, न बीमा, न सहारा, अब लाखों मछुआरों को दुर्घटना बीमा का लाभ मिल रहा है। समुद्र में हादसा हो या नाव पलटने की आशंका, परिवार पूरी तरह बेसहारा न रहे, इसके लिए सुरक्षा दी जा रही है। इसके साथ ही मछुआरों और मछली पालकों को किसान क्रेडिट कार्ड भी मिल रहे हैं, ताकि उन्हें साहूकारों पर निर्भर न रहना पड़े।
मत्स्य पालन अब सिर्फ़ पकड़ने तक सीमित नहीं रहा। तालाबों में वैज्ञानिक तरीके से मछली पालना, बायोफ्लॉक और पिंजरा पद्धति जैसी तकनीकें अपनाई जा रही हैं। इससे कम जगह और कम पानी में भी ज़्यादा उत्पादन संभव हो रहा है। औसतन अब एक हेक्टेयर में लगभग 4.7 टन मछली पैदा हो रही है, जो पहले के मुकाबले कहीं ज़्यादा है।
निर्यात के मोर्चे पर भी यह क्षेत्र मज़बूत हुआ है। भारत आज 130 से अधिक देशों को समुद्री खाद्य उत्पाद भेज रहा है। साल 2023-24 में भारत ने 60 हज़ार करोड़ रुपये से ज़्यादा का मछली और समुद्री खाद्य निर्यात किया। इसका मतलब है कि देश के मछुआरों और प्रोसेसिंग यूनिट्स का काम अब वैश्विक बाज़ार तक पहुँच रहा है।
सबसे अहम बात यह है कि इस क्षेत्र ने बड़े पैमाने पर रोज़गार भी पैदा किया है। सरकारी आँकड़ों के मुताबिक़, बीते वर्षों में मत्स्य पालन से जुड़े कामों से करीब 75 लाख नए रोज़गार बने हैं। इनमें महिलाएँ भी बड़ी संख्या में शामिल हैं, चाहे वह मछली की सफ़ाई हो, प्रोसेसिंग हो या स्थानीय बाज़ार में बिक्री।
सरकार अब सिर्फ़ उत्पादन बढ़ाने की नहीं, बल्कि मछुआरों की ज़िंदगी को सुरक्षित और सम्मानजनक बनाने की बात कर रही है। ऑफ-सीज़न में सहायता, पोषण सहयोग, डिजिटल बाज़ार से जोड़ना और मछली किसान उत्पादक संगठनों को मज़बूत करना, ये सभी कदम इसी दिशा में हैं।
ये भी पढ़ें: मछली उत्पादन में आत्मनिर्भर बन रहा उत्तर प्रदेश, मछली पालन की तरफ बढ़ रहा है युवाओं का रुझान
पिछले दस वर्षों में भारत का मछली उत्पादन दोगुने से भी ज़्यादा हो गया है। साल 2013-14 में जहाँ देश में करीब 96 लाख टन मछली पैदा होती थी, वहीं 2024-25 में यह आंकड़ा लगभग 198 लाख टन तक पहुँच गया। इसका मतलब सिर्फ़ इतना नहीं कि मछली ज़्यादा पैदा हो रही है, बल्कि यह भी कि लाखों परिवारों की आमदनी और रोज़गार के मौके बढ़े हैं।
आज भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मछली उत्पादक देश है। देश की लगभग तीन करोड़ से ज़्यादा आबादी, मछुआरे, मछली पालक, महिलाएँ, मज़दूर और छोटे व्यापारी, किसी न किसी रूप में इस काम से जुड़े हैं। तटीय इलाक़ों से लेकर गाँवों के तालाबों तक, मत्स्य पालन अब सिर्फ़ परंपरा नहीं, बल्कि एक संगठित आजीविका बनता जा रहा है।
ये भी पढ़ें: मछली पालन का भविष्य: स्वदेशी प्रजातियाँ बन सकती हैं सबसे बड़ा सहारा
इस बदलाव के पीछे बड़ी वजह हैं बीते कुछ सालों में शुरू की गई सरकारी योजनाएँ। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना, नीली क्रांति और मत्स्य अवसंरचना से जुड़ी योजनाओं के तहत हज़ारों करोड़ रुपये का निवेश किया गया। इससे तालाबों का सुधार हुआ, हैचरी बनीं, ठंडा भंडारण, मछली परिवहन और बाज़ार तक पहुँच आसान हुई।
इसका सीधा असर मछुआरों की ज़िंदगी पर पड़ा है। पहले जहाँ मछली पकड़ना जोखिम भरा काम था, न बीमा, न सहारा, अब लाखों मछुआरों को दुर्घटना बीमा का लाभ मिल रहा है। समुद्र में हादसा हो या नाव पलटने की आशंका, परिवार पूरी तरह बेसहारा न रहे, इसके लिए सुरक्षा दी जा रही है। इसके साथ ही मछुआरों और मछली पालकों को किसान क्रेडिट कार्ड भी मिल रहे हैं, ताकि उन्हें साहूकारों पर निर्भर न रहना पड़े।
पानी से पलायन नहीं, रोज़गार: मत्स्य पालन से बदलती ग्रामीण अर्थव्यवस्था
मत्स्य पालन अब सिर्फ़ पकड़ने तक सीमित नहीं रहा। तालाबों में वैज्ञानिक तरीके से मछली पालना, बायोफ्लॉक और पिंजरा पद्धति जैसी तकनीकें अपनाई जा रही हैं। इससे कम जगह और कम पानी में भी ज़्यादा उत्पादन संभव हो रहा है। औसतन अब एक हेक्टेयर में लगभग 4.7 टन मछली पैदा हो रही है, जो पहले के मुकाबले कहीं ज़्यादा है।
निर्यात के मोर्चे पर भी यह क्षेत्र मज़बूत हुआ है। भारत आज 130 से अधिक देशों को समुद्री खाद्य उत्पाद भेज रहा है। साल 2023-24 में भारत ने 60 हज़ार करोड़ रुपये से ज़्यादा का मछली और समुद्री खाद्य निर्यात किया। इसका मतलब है कि देश के मछुआरों और प्रोसेसिंग यूनिट्स का काम अब वैश्विक बाज़ार तक पहुँच रहा है।
सबसे अहम बात यह है कि इस क्षेत्र ने बड़े पैमाने पर रोज़गार भी पैदा किया है। सरकारी आँकड़ों के मुताबिक़, बीते वर्षों में मत्स्य पालन से जुड़े कामों से करीब 75 लाख नए रोज़गार बने हैं। इनमें महिलाएँ भी बड़ी संख्या में शामिल हैं, चाहे वह मछली की सफ़ाई हो, प्रोसेसिंग हो या स्थानीय बाज़ार में बिक्री।
सरकार अब सिर्फ़ उत्पादन बढ़ाने की नहीं, बल्कि मछुआरों की ज़िंदगी को सुरक्षित और सम्मानजनक बनाने की बात कर रही है। ऑफ-सीज़न में सहायता, पोषण सहयोग, डिजिटल बाज़ार से जोड़ना और मछली किसान उत्पादक संगठनों को मज़बूत करना, ये सभी कदम इसी दिशा में हैं।
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