किस राज्य में कितने स्टार्टअप? लोकसभा के जवाब से खुली तस्वीर, महाराष्ट्र सबसे आगे, यूपी-दिल्ली की तेज़ छलांग
Gaon Connection | Feb 03, 2026, 18:56 IST
लोकसभा में दिए गए एक लिखित जवाब से देश में स्टार्टअप्स की असली तस्वीर सामने आई है। सरकार के मुताबिक 31 दिसंबर 2025 तक देश में दो लाख से ज़्यादा स्टार्टअप्स को मान्यता मिल चुकी है। महाराष्ट्र, कर्नाटक और दिल्ली जैसे बड़े शहरी राज्य आगे हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश जैसे राज्य भी तेज़ी से उभर रहे हैं। महिलाओं की भागीदारी और सरकारी फंडिंग योजनाएँ इस स्टार्टअप यात्रा के अहम पहलू हैं।
भारत में स्टार्टअप को लेकर अक्सर चर्चा बड़े शहरों और चमकती इमारतों तक सिमट जाती है। लेकिन लोकसभा में सरकार द्वारा दिए गए एक लिखित जवाब ने यह साफ कर दिया है कि स्टार्टअप सिर्फ महानगरों की कहानी नहीं रह गए हैं, बल्कि धीरे-धीरे देश के अलग-अलग राज्यों में अपनी जड़ें जमा रहे हैं। 31 दिसंबर 2025 तक उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (डीपीआईआईटी) के तहत कुल 2 लाख 7 हज़ार से ज़्यादा स्टार्टअप्स को मान्यता दी जा चुकी है।
अगर राज्यवार तस्वीर देखें तो महाराष्ट्र इस दौड़ में सबसे आगे है। यहाँ करीब 36 हज़ार स्टार्टअप्स दर्ज हैं। मुंबई और पुणे जैसे शहरों में पहले से मौजूद उद्योग, निवेशक नेटवर्क और तकनीकी माहौल ने महाराष्ट्र को यह बढ़त दिलाई है। इसके बाद कर्नाटक का नंबर आता है, जहाँ लगभग 21 हज़ार स्टार्टअप्स हैं। बेंगलुरु को देश की “स्टार्टअप राजधानी” कहा जाता है और आँकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं।
दिल्ली और उत्तर प्रदेश की कहानी भी अलग उचाईयों को छूने की राह पर निकल चुकी है। दिल्ली में करीब 20 हज़ार स्टार्टअप्स हैं, जबकि उत्तर प्रदेश में यह संख्या 20 हज़ार के पार पहुँच चुकी है। कुछ साल पहले तक यूपी को स्टार्टअप राज्य के रूप में कम ही देखा जाता था, लेकिन अब नोएडा, गाजियाबाद, लखनऊ और कानपुर जैसे शहरों से नई कंपनियाँ सामने आ रही हैं। यह बदलाव बताता है कि स्टार्टअप का दायरा अब सिर्फ दक्षिण और पश्चिम भारत तक सीमित नहीं है।
गुजरात, तमिलनाडु और तेलंगाना भी इस सूची में मजबूती से खड़े हैं जहाँ गुजरात में लगभग 17 हज़ार, तमिलनाडु में 13 हज़ार से ज़्यादा और तेलंगाना में 11 हज़ार से अधिक स्टार्टअप्स दर्ज हैं। हरियाणा, केरल, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में भी हज़ारों की संख्या में स्टार्टअप्स काम कर रहे हैं। हालांकि पूर्वोत्तर राज्यों और कुछ छोटे केंद्रशासित प्रदेशों में यह संख्या कम है, लेकिन वहाँ भी शुरुआत हो चुकी है।
इस पूरी तस्वीर का एक अहम पहलू है महिलाओं की भागीदारी। सरकार के जवाब के मुताबिक लगभग 48 प्रतिशत मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स में कम से कम एक महिला निदेशक या साझेदार शामिल है। यह आँकड़ा बताता है कि स्टार्टअप की दुनिया में महिलाएँ सिर्फ पीछे से सहारा नहीं दे रहीं, बल्कि सीधे नेतृत्व की भूमिका निभा रही हैं। महाराष्ट्र, दिल्ली और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में महिला भागीदारी करीब आधी के आसपास बताई गई है।
स्टार्टअप्स के इस बढ़ते आँकड़े के पीछे सरकारी योजनाओं की भी बड़ी भूमिका है। केंद्र सरकार ने स्टार्टअप इंडिया के तहत कई वित्तीय और संस्थागत योजनाएँ शुरू की हैं। ‘फंड ऑफ फंड्स फॉर स्टार्टअप्स’ के जरिए निवेश को बढ़ावा दिया जा रहा है, ताकि छोटे और नए उद्यमों तक पूँजी पहुँच सके। वहीं ‘स्टार्टअप इंडिया सीड फंड स्कीम’ शुरुआती दौर के स्टार्टअप्स को संबल देती है, जिससे वे अपने विचार को ज़मीन पर उतार सकें। इसके अलावा ‘क्रेडिट गारंटी स्कीम’ बैंकों से कर्ज़ लेने में स्टार्टअप्स की मदद करती है।
हालाँकि आँकड़े यह भी बताते हैं कि निवेश और संसाधनों का वितरण सभी राज्यों में समान नहीं है। जहाँ पहले से उद्योग और निवेश का मजबूत ढांचा है, वहाँ स्टार्टअप्स की संख्या और फंडिंग दोनों ज़्यादा हैं। दूसरी ओर, ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में स्टार्टअप्स की रफ्तार अभी धीमी है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर इन इलाकों में स्थानीय समस्याओं से जुड़े समाधान विकसित किए जाएँ, तो स्टार्टअप न सिर्फ रोज़गार देंगे बल्कि पलायन रोकने में भी मददगार साबित हो सकते हैं।
सवाल सिर्फ यह नहीं है कि किस राज्य में कितने स्टार्टअप हैं, बल्कि यह भी है कि ये स्टार्टअप किस तरह की समस्याओं पर काम कर रहे हैं। क्या वे खेती, पशुपालन, जल, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे ग्रामीण मुद्दों से जुड़े हैं? या फिर उनका दायरा सिर्फ शहरी उपभोक्ताओं तक सीमित है? अगर स्टार्टअप आंदोलन को सच में समावेशी बनाना है, तो उसे गाँव और कस्बों की ज़रूरतों से जोड़ना होगा। लोकसभा में दिए गए इस जवाब से इतना साफ है कि भारत का स्टार्टअप नक्शा तेज़ी से बदल रहा है। बड़े राज्य आगे हैं, लेकिन नए खिलाड़ी भी उभर रहे हैं। अब चुनौती यह है कि इस रफ्तार को देश के हर कोने तक पहुँचाया जाए, ताकि स्टार्टअप सिर्फ आंकड़ों की कहानी न बनें, बल्कि ज़मीन पर बदलाव की ताकत बन सकें।
अगर राज्यवार तस्वीर देखें तो महाराष्ट्र इस दौड़ में सबसे आगे है। यहाँ करीब 36 हज़ार स्टार्टअप्स दर्ज हैं। मुंबई और पुणे जैसे शहरों में पहले से मौजूद उद्योग, निवेशक नेटवर्क और तकनीकी माहौल ने महाराष्ट्र को यह बढ़त दिलाई है। इसके बाद कर्नाटक का नंबर आता है, जहाँ लगभग 21 हज़ार स्टार्टअप्स हैं। बेंगलुरु को देश की “स्टार्टअप राजधानी” कहा जाता है और आँकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं।
दिल्ली और उत्तर प्रदेश की कहानी भी अलग उचाईयों को छूने की राह पर निकल चुकी है। दिल्ली में करीब 20 हज़ार स्टार्टअप्स हैं, जबकि उत्तर प्रदेश में यह संख्या 20 हज़ार के पार पहुँच चुकी है। कुछ साल पहले तक यूपी को स्टार्टअप राज्य के रूप में कम ही देखा जाता था, लेकिन अब नोएडा, गाजियाबाद, लखनऊ और कानपुर जैसे शहरों से नई कंपनियाँ सामने आ रही हैं। यह बदलाव बताता है कि स्टार्टअप का दायरा अब सिर्फ दक्षिण और पश्चिम भारत तक सीमित नहीं है।
गुजरात, तमिलनाडु और तेलंगाना भी इस सूची में मजबूती से खड़े हैं जहाँ गुजरात में लगभग 17 हज़ार, तमिलनाडु में 13 हज़ार से ज़्यादा और तेलंगाना में 11 हज़ार से अधिक स्टार्टअप्स दर्ज हैं। हरियाणा, केरल, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में भी हज़ारों की संख्या में स्टार्टअप्स काम कर रहे हैं। हालांकि पूर्वोत्तर राज्यों और कुछ छोटे केंद्रशासित प्रदेशों में यह संख्या कम है, लेकिन वहाँ भी शुरुआत हो चुकी है।
इस पूरी तस्वीर का एक अहम पहलू है महिलाओं की भागीदारी। सरकार के जवाब के मुताबिक लगभग 48 प्रतिशत मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स में कम से कम एक महिला निदेशक या साझेदार शामिल है। यह आँकड़ा बताता है कि स्टार्टअप की दुनिया में महिलाएँ सिर्फ पीछे से सहारा नहीं दे रहीं, बल्कि सीधे नेतृत्व की भूमिका निभा रही हैं। महाराष्ट्र, दिल्ली और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में महिला भागीदारी करीब आधी के आसपास बताई गई है।
स्टार्टअप्स के इस बढ़ते आँकड़े के पीछे सरकारी योजनाओं की भी बड़ी भूमिका है। केंद्र सरकार ने स्टार्टअप इंडिया के तहत कई वित्तीय और संस्थागत योजनाएँ शुरू की हैं। ‘फंड ऑफ फंड्स फॉर स्टार्टअप्स’ के जरिए निवेश को बढ़ावा दिया जा रहा है, ताकि छोटे और नए उद्यमों तक पूँजी पहुँच सके। वहीं ‘स्टार्टअप इंडिया सीड फंड स्कीम’ शुरुआती दौर के स्टार्टअप्स को संबल देती है, जिससे वे अपने विचार को ज़मीन पर उतार सकें। इसके अलावा ‘क्रेडिट गारंटी स्कीम’ बैंकों से कर्ज़ लेने में स्टार्टअप्स की मदद करती है।
हालाँकि आँकड़े यह भी बताते हैं कि निवेश और संसाधनों का वितरण सभी राज्यों में समान नहीं है। जहाँ पहले से उद्योग और निवेश का मजबूत ढांचा है, वहाँ स्टार्टअप्स की संख्या और फंडिंग दोनों ज़्यादा हैं। दूसरी ओर, ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में स्टार्टअप्स की रफ्तार अभी धीमी है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर इन इलाकों में स्थानीय समस्याओं से जुड़े समाधान विकसित किए जाएँ, तो स्टार्टअप न सिर्फ रोज़गार देंगे बल्कि पलायन रोकने में भी मददगार साबित हो सकते हैं।
सवाल सिर्फ यह नहीं है कि किस राज्य में कितने स्टार्टअप हैं, बल्कि यह भी है कि ये स्टार्टअप किस तरह की समस्याओं पर काम कर रहे हैं। क्या वे खेती, पशुपालन, जल, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे ग्रामीण मुद्दों से जुड़े हैं? या फिर उनका दायरा सिर्फ शहरी उपभोक्ताओं तक सीमित है? अगर स्टार्टअप आंदोलन को सच में समावेशी बनाना है, तो उसे गाँव और कस्बों की ज़रूरतों से जोड़ना होगा। लोकसभा में दिए गए इस जवाब से इतना साफ है कि भारत का स्टार्टअप नक्शा तेज़ी से बदल रहा है। बड़े राज्य आगे हैं, लेकिन नए खिलाड़ी भी उभर रहे हैं। अब चुनौती यह है कि इस रफ्तार को देश के हर कोने तक पहुँचाया जाए, ताकि स्टार्टअप सिर्फ आंकड़ों की कहानी न बनें, बल्कि ज़मीन पर बदलाव की ताकत बन सकें।