Wheat Export: गेहूं पर भारत का मास्टरस्ट्रोक, 4 साल बाद एक्सपोर्ट खुलते ही बढ़ी डिमांड, कई देश भारत से खरीदारी को तैयार
Gaon Connection | Apr 13, 2026, 13:33 IST
भारत चार साल बाद गेहूं निर्यात के लिए तैयार है। सरकार निर्यात कोटा तय कर रही है। इससे किसानों को बेहतर दाम मिलेंगे और कृषि अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। मिस्र, इंडोनेशिया जैसे देश भारतीय गेहूं खरीदने में रुचि दिखा रहे हैं। यह कदम भारत को वैश्विक खाद्य आपूर्ति में एक भरोसेमंद सप्लायर के रूप में स्थापित करेगा।
खेत में अपनी गेहूं की फसल देखता हुआ किसान
करीब चार साल तक निर्यात पर नियंत्रण रखने के बाद भारत ने एक बार फिर गेहूं के वैश्विक बाजार में वापसी का बड़ा संकेत दिया है। सरकार गेहूं निर्यात को बढ़ाने की दिशा में तेजी से कदम उठा रही है और जल्द ही डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ फॉरेन ट्रेड (DGFT) के जरिए निर्यात कोटा तय किया जाएगा। यह फैसला ऐसे समय में लिया गया है जब देश में 120 मिलियन टन का रिकॉर्ड उत्पादन अनुमानित है और घरेलू भंडार भी पर्याप्त स्तर पर मौजूद हैं।
भारत के इस फैसले के बाद मिस्र, इंडोनेशिया, म्यांमार और बांग्लादेश जैसे देशों ने भारतीय गेहूं खरीदने में दिलचस्पी दिखाई है। वैश्विक स्तर पर ईरान युद्ध जैसे जियोपॉलिटिकल तनावों के कारण सप्लाई चेन प्रभावित हुई है और खाद्यान्न कीमतों में बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। ऐसे में भारत खुद को एक भरोसेमंद सप्लायर के रूप में स्थापित करने की रणनीति पर काम कर रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, भारत का गेहूं प्रतिस्पर्धी कीमतों—करीब 275 से 280 डॉलर प्रति टन—पर उपलब्ध है, जिससे इसकी मांग और बढ़ सकती है।
फरवरी 2026 में सरकार ने 2.5 मिलियन टन गेहूं और 0.5 मिलियन टन प्रोसेस्ड गेहूं उत्पादों के निर्यात की अनुमति दी थी। अब DGFT द्वारा निर्यात कोटा आवंटन की प्रक्रिया अंतिम चरण में है। इसके साथ ही आटा (atta) और मैदा (maida) जैसे उत्पादों के निर्यात को भी बढ़ाने की योजना है, जिससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार को नई गति मिलेगी।
सरकार का मानना है कि निर्यात बढ़ाने से देश में मौजूद अधिशेष गेहूं का बेहतर उपयोग होगा और किसानों को उनकी उपज का बेहतर दाम मिल सकेगा। इससे किसानों की आय बढ़ेगी और कृषि अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी। साथ ही घरेलू बाजार में कीमतों को संतुलित बनाए रखने में भी मदद मिल सकती है। हालांकि, यह चुनौती भी बनी हुई है कि निर्यात बढ़ाने के साथ घरेलू आपूर्ति और कीमतों का संतुलन कैसे बनाए रखा जाए।
इस सकारात्मक परिदृश्य के बीच कुछ चिंताएं भी सामने आई हैं। हाल ही में हुई बेमौसम बारिश, ओलावृष्टि और तेज हवाओं ने 9 राज्यों के 152 जिलों में करीब 4.2 मिलियन हेक्टेयर गेहूं फसल को प्रभावित किया है। इसके कारण 20-30 प्रतिशत तक गुणवत्ता में गिरावट आई है, जिसमें दानों का रंग बदलना, चमक कम होना और नमी बढ़ना शामिल है। उत्पादन में भी करीब 2 मिलियन टन तक की कमी का अनुमान है।
इन चुनौतियों के बावजूद देश में गेहूं की उपलब्धता मजबूत बनी हुई है। कृषि मंत्रालय के अनुसार 2025-26 में उत्पादन 120 मिलियन टन तक पहुंच सकता है, जो पिछले साल के 117 मिलियन टन से अधिक है। वहीं भारतीय खाद्य निगम (FCI) के पास अप्रैल की शुरुआत में 22 मिलियन टन से ज्यादा गेहूं का स्टॉक मौजूद है, जो निर्धारित बफर से कहीं अधिक है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम केवल व्यापारिक नहीं बल्कि रणनीतिक भी है। सही समय पर निर्यात बढ़ाकर भारत न केवल वैश्विक खाद्य आपूर्ति में अपनी भूमिका मजबूत कर सकता है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार संबंधों को भी नया आयाम दे सकता है। कुल मिलाकर, गेहूं निर्यात का यह फैसला किसानों की आय बढ़ाने, बाजार में संतुलन बनाए रखने और वैश्विक स्तर पर भारत की स्थिति मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।