Gaon Se: क्या 10 रुपये से बदल सकती है हजारों जिंदगियां? महाराष्ट्र की इस महिला की कहानी जानें
Gaon Connection | Mar 18, 2026, 18:57 IST
पढ़ाई का सपना था, लेकिन घर की जिम्मेदारियों ने उन्हें जल्दी शादी के बंधन में बांध दिया। हालात ऐसे थे कि भाई और उनकी शादी एक ही मंडप में कर दी गई, ताकि खर्च कम हो सके। जिंदगी ने शुरुआत से ही उन्हें समझा दिया था कि रास्ता आसान नहीं होगा। महाराष्ट्र के उस्मानाबाद जिले की सूखी जमीन और कठिन हालातों के बीच पली-बढ़ी कमल कुंभार की कहानी सिखाती है जिंदगी से हार नहीं माननी बल्कि दूसरों को साथ लेकर चलना ही असल सफलता है।
गाँव की मिट्टी से निकली कहानी
गाँव की कहानियों में अक्सर संघर्ष होता है, लेकिन कुछ कहानियाँ ऐसी होती हैं जो सिर्फ संघर्ष नहीं, बदलाव की मिसाल बन जाती हैं। यह कहानी भी ऐसी ही एक महिला की है, जो बताती है कि अगर हिम्मत हो तो छोटी सी शुरुआत भी बड़ी पहचान बन सकती है। अगर कभी profit and loss account की बात करनी हो तो भारत की गृहणियों से बात करिएगा। भारत की महिलाओं से बात करिएगा। भले वो किसी excel sheet पर अपने हिसाब किताब को दर्ज नहीं करती हैं लेकिन वो अपने घर के हिसाब को चलाना बखूबी जानती हैं। यानी कि वो उद्यमी भी बन सकती हैं। वो उससे बड़ी balance sheets को भी चला सकती हैं।
महाराष्ट्र में कमल कुंभार ऐसी ही एक महिला हैं जिन्होंने उन्नीस सौ अठानबे में मात्र दस रुपए से अपने काम की शुरुआत की और धीरे धीरे अलग अलग प्रयोग करते हुए सफलता असफलता के बीच चलते हुए उन्होंने एक producer company बनाई। बहुत सी और महिलाओं को जोड़ा और अब अच्छी खासी आमदनी हो जाती है अपनी ही उद्यमिता से। अपने घर की चार दीवारी के अंदर शुरू हुई एक कहानी आज बहुत सी और चार दीवारियों की कहानी बदल रही है। महाराष्ट्र के उस्मानाबाद जिले की सूखी जमीन, तपती धूप और संघर्षों से भरी जिंदगी। इन्हीं परिस्थितियों में एक औरत खड़ी हुई जिसने मिट्टी से अपनी तकदीर गढ़ी वो हैं, कमल कुंभार। कभी जिनके पास पढ़ाई का मौका नहीं था, न कोई सहारा, आज वही बन चुकी हैं हजारों महिलाओं की ताकत।
कमल की कहानी शुरू होती है संघर्ष से। पाँच सौ रुपए की छोटी पूंजी और एक बड़ा सपना लेकर उन्होंने शुरू किया चूड़ियों का काम। धूप, धूल, ताने सब सहते हुए उन्होंने अपने डर से बड़ी अपनी हिम्मत बनाई। उन्हें समझ आ गया था अगर खुद आगे बढ़ना है तो औरों को साथ लेकर चलना होगा। उन्होंने गाँव की महिलाओं को जोड़ा। सिखाया कि कैसे अपने पैरों पर खड़ा होना है। ऊर्जा सखी बनकर ये महिलाएं अब घर घर रोशनी पहुँचा रही हैं।
कमल कुंभार बताती हैं, "मेरी शादी तय हो गई थी। मैंने सन उन्नीस सौ तिरानवे में दसवीं की पढ़ाई पूरी की। मेरा सपना था कि ग्यारहवीं या बारहवीं की पढ़ाई शुरू करूं। आंगनबाड़ी या Tailoring का काम करूं। लेकिन घर के हालात बुरे थे। भाई की शादी तय हो गई थी। भाई ने कहा था कि दोनों की शादी एक ही मंडप में करेंगे। खर्चा कम होगा। अब जो है महिलाओं की सोच बदल गई है। पुरुष हैं लेकिन महिलाएं ज्यादा साथ देती हैं। अब loan के लिए bank के पीछे नहीं पड़ना पड़ता। लगभग हर घर से मैं कहूंगी कि अस्सी प्रतिशत महिलाएं अब अपना business चला रही हैं। बिज़नेस नहीं तो कम से कम बकरियाँ पाल रही हैं। अपने खुद के खेत में काम करती हैं।"
कमल की इस यात्रा में उनके परिवार का भी अहम योगदान रहा। उनके पति ने हर कदम पर उनका साथ दिया। गाँव में लोग क्या कहेंगे, इस सोच से ऊपर उठकर उन्होंने अपनी पत्नी के काम को सम्मान दिया। दोनों ने मिलकर यह साबित किया कि जब पति-पत्नी एक-दूसरे का साथ देते हैं, तो जिंदगी की गाड़ी आसानी से आगे बढ़ती है।
कमल के पति कहते हैं, "पति पत्नी तो बैलगाड़ी के दो पहिए हैं। दोनों मिलकर चलेंगे तो गाड़ी भी चलेगी। पति पत्नी को एक दूसरे का support करना चाहिए। तभी तो घर चलता है। वो महीने के बीस हज़ार कमाती है। मैं सारा खेत देखता हूं। business में भी हाथ बटाता हूं। मैं तो इसी तरह उसका साथ दे सकता हूं। मेरी पत्नी अच्छी है, यह मुझे पता है। तो समाज की बातें क्यों सुनूं? उनकी सुनने लगा तो घर बैठ जाएगा।"
कमल कहती हैं, "माना कि स्त्री इस समाज का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है या कहिए supportive हिस्सा है लेकिन स्त्री को हर जगह सम्मान नहीं मिलता। लेकिन मुझे जिंदगी ने ऐसा मौका दिया, मैं उस कसौटी पर खरी उतरी। बस यही याद रखती हूं। हर मुसीबत का सामना करती हूं।"
आज कमल कुंभार सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि एक पहचान बन चुकी हैं। उनके प्रयासों से एक हजार से ज्यादा महिलाएं आत्मनिर्भर बनी हैं। उन्होंने ‘मंजरी प्रोड्यूसर कंपनी’ के जरिए 50 गाँवों की करीब 2300 महिलाओं को जोड़ा है। ‘वन एकड़ मॉडल’ के तहत गाँव के लोग अब अपने खाने का अनाज खुद उगाने लगे हैं। जो लोग पहले हर हफ्ते बाजार से अनाज खरीदते थे, वे अब अपने आंगन में ही शुद्ध और सुरक्षित भोजन तैयार कर रहे हैं।
आज कमल कुंभार के पास छह सफल व्यवसाय हैं। उनके काम से एक हज़ार से ज्यादा महिलाएं आत्मनिर्भर बनी हैं। नारी शक्ति पुरस्कार और Women Transforming India Award जैसे सम्मान उनके नाम हैं। लेकिन वे आज भी खुद को गाँव की बेटी कहती हैं। क्योंकि जब उन्हें जिंदगी ने गिराया तब मिट्टी से ही अपनी ताकत उठाई।
जहर मुक्त खाना अपने ही आंगन में उगाना सिखाया
कमल बताती है कि हम जहर मुक्त खाना खाएंगे तो हमारे बच्चे भी जहर मुक्त खाना खाना सीखेंगे। उन्हें खाने की पहचान नहीं है तो इसमें उनकी कोई गलती नहीं है। हमारी मंजरी producer company जिसमें पचास गाँव से तेईस सौ सभासद हैं। one acre model के तहत हर घर में जितना अनाज की जरूरत है उतना हम खेत में उगा लेते हैं। जिनके पास खेत नहीं वो अपनी पोषण वाटिका में ही उगाते हैं। वो दो सौ रुपए का अनाज हर हफ्ते खरीदते थे। अब हमने उन्हें जहर मुक्त खाना अपने ही आंगन में उगाना सिखाया है। अब उनके गाँव में जब कोई महिला नया काम शुरू करती है तो लोग कहते हैं कमल ताई की तरह बनो। क्योंकि रोशनी कभी बाहर से नहीं आती, उसे खुद जलाना पड़ता है।
मात्र 10 रूपए से शुरू की producer company
गाँव की मिट्टी से निकली कहानी, जिसने बदली हजारों जिंदगियां
गाँव की महलिाओं को बनाया आत्मनिर्भर
जब एक महिला आगे बढ़ी, तो पूरा गाँव साथ चल पड़ा
जीवन में महिलाओं का साथ जरूरी
घर की जिम्मेदारियों के बीच छूटा सपना, लेकिन हौसला नहीं टूटा
परिवार ने नहीं छोड़ा साथ
बदलती सोच की तस्वीर
पति का साथ बना ताकत
खड़ी की ‘मंजरी प्रोड्यूसर कंपनी’
50 गाँव, 2300 महिलाएं और आत्मनिर्भरता की मिसाल
कमल बन चुकी हैं सफल व्यवसायी
जहर मुक्त खाना अपने ही आंगन में उगाना सिखाया
अब महिलाएं खुद बन रही हैं कमाई का सहारा