Gaon Se: जहाँ बैंक से कैश नहीं, 'बकरी' मिलती है, जानिए महाराष्ट्र के 'गोट बैंक' की अनोखी कहानी

Gaon Connection | Mar 24, 2026, 16:27 IST
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महाराष्ट्र के अकोला ज़िले का एक छोटा सा गाँव कारखेड़ा आज पूरे देश के लिए मिसाल बन गया है। यहाँ के 'गोट बैंक' ने आर्थिक तंगी से जूझ रही ग्रामीण महिलाओं के हाथ में नोटों की गड्डी नहीं, बल्कि स्वावलंबन की डोर थमाई है।
​जहाँ बैंक से कैश नहीं, 'बकरी' मिलती है।​
​जहाँ बैंक से कैश नहीं, 'बकरी' मिलती है।​
जब भी हम 'बैंक' शब्द सुनते हैं, तो आँखों के सामने लंबी लाइनें, कैश काउंटर, चेकबुक और भारी-भरकम ब्याज का खयाल आता है। लेकिन नरेश देशमुख की सोच इससे जुदा थी। बीकॉम और अर्थशास्त्र में पोस्ट-ग्रेजुएट नरेश, जो खुद खेती करते हैं और गाँव के सरपंच भी रह चुके हैं, उन्होंने महसूस किया कि ग्रामीण भारत में असली संपत्ति ज़मीन या पशुधन ही है। उन्होंने देखा कि जिन घरों में बकरियाँ थीं, उन्हें छोटी-मोटी ज़रूरतों के लिए साहूकारों के आगे हाथ नहीं फैलाने पड़ते थे। बस इसी सोच ने जन्म दिया ‘गोट बैंक ऑफ कारखेड़ा’ को।

नरेश देशमुख और उनका बनाया Goat Bank
नरेश देशमुख और उनका बनाया Goat Bank

साल 2018 में शुरू हुए इस बैंक का मॉडल बेहद दिलचस्प और ज़मीनी है:

· ऋण (Loan): बैंक महिलाओं को बकरी उधार देता है।

· ब्याज (Interest): लोन के बदले पैसे नहीं, बल्कि बकरी के होने वाले मेमने (बच्चे) वापस लौटाने होते हैं।

· ट्रेनिंग: महिलाओं को केवल बकरी देकर छोड़ा नहीं जाता, बल्कि उन्हें पशु-पालन, साफ-सफाई और हिसाब-किताब की ट्रेनिंग भी दी जाती है।

बदल गई हज़ारों महिलाओं की तक़दीर

बैंक से जुड़ गईं ग्रामीण महिलाएँ
बैंक से जुड़ गईं ग्रामीण महिलाएँ
शुरुआत में जब नरेश ने यह आईडिया लोगों को बताया, तो उन्हें तानों का सामना करना पड़ा। लोग हँसते हुए पूछते थे, "बकरियों वाला बैंक? भला मेमने कौन लौटाएगा?" लेकिन नरेश ने हार नहीं मानी। उन्होंने खुद बैंक से लोन लिया, 340 बकरियाँ खरीदीं और उन्हें ज़रूरतमंद महिलाओं को सौंप दिया। आज यह प्रयोग एक बड़ा आंदोलन बन चुका है। आँकड़े गवाही देते हैं कि नरेश अब तक 5,000 से ज़्यादा बकरियाँ बाँट चुके हैं और ब्याज के रूप में हज़ारों मेमने वापस भी मिल चुके हैं।

कई जिलों में खुल चुका है बकरी बैंक

गाँव के लोगों को मिला रोजगार
गाँव के लोगों को मिला रोजगार
इस गाँव के तमाम महिलाएँ, जिनके पास पहले न रोज़गार था न आमदनी, आज इस बैंक की बदौलत अपने पैरों पर खड़ी हैं। अब कारखेड़ा की यह पहल सिर्फ एक गाँव तक सीमित नहीं है, आस-पास के ज़िलों में 10 से ज़्यादा सेंटर्स खुल चुके हैं। नरेश देशमुख बताते हैं कि "गाँव की परिस्थितियों ने सिखाया कि पूँजी की कमी को मज़बूरी नहीं बनने देना चाहिए। अगर नीयत साफ़ हो, तो एक बकरी भी किसी की पूरी ज़िंदगी बदल सकती है।"

अगली बार जब आप किसी बैंक की चर्चा करें, तो नोटों और सिक्कों के बीच अकोला के इस 'गोट बैंक' का ज़िक्र ज़रूर कीजिएगा। यह बैंक साबित करता है कि असली क्रेडिट (Credit) वही है जो इंसान को सशक्त बनाए, न कि उसे कर्ज़ के बोझ तले दबा दे। क्या पता, आपकी चर्चा से प्रेरित होकर किसी और गाँव में भी बदलाव की ऐसी ही कोई नई इबारत लिखी जाए!
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