राष्ट्रीय मत्स्य पालन सचिव सम्मेलन: मछुआरों की आय बढ़ाने और ब्लू इकोनॉमी को मजबूत करने की नई रणनीति
Gaon Connection | Jan 17, 2026, 19:07 IST
राष्ट्रीय मत्स्य पालन सचिव सम्मेलन में केंद्र और राज्यों ने मछुआरों की आय बढ़ाने, एक्वाकल्चर को मजबूत करने और ब्लू इकोनॉमी को गति देने के लिए रणनीति बनाई। सम्मेलन में डिजिटल रजिस्ट्रेशन, एक्वापार्क, समुद्री शैवाल खेती, क्लस्टर मॉडल, निर्यात बढ़ाने और जलवायु-अनुकूल तकनीकों को प्राथमिकता दी गई।
भारत में मत्स्य पालन सिर्फ आजीविका का एक साधन नहीं रहा, अब यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बनता जा रहा है। इसी सोच और लक्ष्य के साथ केंद्रीय मत्स्य पालन विभाग ने एक राष्ट्रीय मत्स्य पालन सचिव सम्मेलन आयोजित किया, जहाँ देशभर के 25 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के वरिष्ठ अधिकारियों, वैज्ञानिकों और प्रतिनिधियों ने भाग लिया। यह सम्मेलन नई योजनाओं की समीक्षा करने, उपलब्धियों को समझने और आने वाले वर्षों के लिए एक मजबूत रोडमैप तय करने के लिए बुलाया गया था।
सम्मेलन का आयोजन नई दिल्ली के एनएएससी कॉम्प्लेक्स, पूसा रोड में किया गया, जिसमें प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY), मत्स्य पालन व जलीय कृषि अवसंरचना विकास कोष (FIDF) तथा प्रधानमंत्री मत्स्य किसान समृद्धि सह-योजना (PM-MKSSY) सहित सभी बड़ी केंद्र योजनाओं की प्रगति और चुनौतियों की समीक्षा हुई। इस दौरान समुद्री मत्स्य पालन गणना 2025, मूल्य वर्धित समुद्री खाद्य निर्यात और योजनाओं के लक्ष्यों पर अपडेट भी साझा किया गया।
सम्मेलन की अध्यक्षता केंद्रीय मत्स्य पालन विभाग के सचिव डॉ. अभिलक्ष लिखी ने की। उन्होंने कहा कि मत्स्य पालन क्षेत्र का विकास समय पर कार्रवाई, मजबूत कार्यान्वयन और वैज्ञानिक नियोजन पर निर्भर करेगा। उन्होंने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से आग्रह किया कि योजनाओं से जुड़े फंड का वितरण समय-सीमा में और प्रभावी तरीके से किया जाए ताकि योजना के लाभ जमीनी स्तर तक प्रभावी रूप से पहुंचें। उन्होंने यह भी बताया कि इंटीग्रेटेड एक्वापार्क, समुद्री शैवाल की खेती, क्लाइमेट-रेज़िलिएंट कोस्टल फिशरमैन विलेजेज (CRCFVs), क्लस्टर डेवलपमेंट और आर्टिफिशियल रीफ जैसी विकास गतिविधियों को समयबद्ध रूप से आगे बढ़ाना आवश्यक है।
सम्मेलन में डिजिटलीकरण पर भी विशेष जोर दिया गया। डॉ. लिखी ने राज्यों को कहा कि वे नेशनल फिशरीज़ डिजिटल पोर्टल पर मत्स्य पालन, एक्वाकल्चर और मत्स्य किसान पंजीकरण को बढ़ाएँ। इससे न सिर्फ डाटाबेस मजबूत होगा, बल्कि योजनाओं की निगरानी भी बेहतर ढंग से हो सकेगी। साथ ही उन्होंने एक्वाकल्चर बीमा कवरेज को व्यापक रूप से अपनाने को कहा ताकि मछुआरों की आजीविका सुरक्षित बनी रहे और प्राकृतिक आपदाओं के प्रभाव को कम किया जा सके।
सम्मेलन में इनलैंड मत्स्य पालन (जलगृह/तालाब) पर भी चर्चा हुई। इनलैंड जलाशयों का उपयोग अभी अपेक्षाकृत कम है और उसे विकसित करने की ज़रूरत है। संयुक्त सचिव (इनलैंड) श्री सागर मेहरा ने कहा कि नीतिगत समर्थन के बावजूद इनलैंड क्लस्टर पूरी तरह विकसित नहीं हुए हैं, और उन्हें उच्च मूल्य वाली प्रजातियों के साथ बाजार-उन्मुख बनाना आवश्यक है ताकि इन क्षेत्रों का निर्यात क्षमता भी बढ़ सके।
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तटीय मत्स्य पालन और मैरीकल्चर पर भी महत्वपूर्ण चर्चा हुई। संयुक्त सचिव (मरीन)नीतू कुमारी प्रसाद ने कहा कि भारत की लंबी तटरेखा को ध्यान में रखते हुए फिनफिश, शेलफिश, IMTA (Integrated Multi-Trophic Aquaculture), समुद्री शैवाल और खुले समुद्र में केज फार्मिंग जैसे आधुनिक और विविध क्षेत्र को अपनाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि वर्तमान में खारे पानी के संसाधनों का केवल एक छोटा हिस्सा ही उपयोग में लाया जा रहा है, जबकि इसके विस्तार से रोजगार और निर्यात दोनों को बढ़ावा मिलेगा। उन्होंने सौर सुखाने, हरित ईंधन तकनीकें जैसी जलवायु-अनुकूल तकनीकों को अपनाने पर भी ज़ोर दिया ताकि उत्पादन की गुणवत्ता बेहतर बने और बाद में होने वाले नुकसान को कम किया जा सके।
ये भी पढ़ें:भारत-इज़राइल साझेदारी: फिशरीज और एक्वाकल्चर में सहयोग बढ़ाने पर जोर
सम्मेलन का आयोजन नई दिल्ली के एनएएससी कॉम्प्लेक्स, पूसा रोड में किया गया, जिसमें प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY), मत्स्य पालन व जलीय कृषि अवसंरचना विकास कोष (FIDF) तथा प्रधानमंत्री मत्स्य किसान समृद्धि सह-योजना (PM-MKSSY) सहित सभी बड़ी केंद्र योजनाओं की प्रगति और चुनौतियों की समीक्षा हुई। इस दौरान समुद्री मत्स्य पालन गणना 2025, मूल्य वर्धित समुद्री खाद्य निर्यात और योजनाओं के लक्ष्यों पर अपडेट भी साझा किया गया।
सम्मेलन की अध्यक्षता केंद्रीय मत्स्य पालन विभाग के सचिव डॉ. अभिलक्ष लिखी ने की। उन्होंने कहा कि मत्स्य पालन क्षेत्र का विकास समय पर कार्रवाई, मजबूत कार्यान्वयन और वैज्ञानिक नियोजन पर निर्भर करेगा। उन्होंने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से आग्रह किया कि योजनाओं से जुड़े फंड का वितरण समय-सीमा में और प्रभावी तरीके से किया जाए ताकि योजना के लाभ जमीनी स्तर तक प्रभावी रूप से पहुंचें। उन्होंने यह भी बताया कि इंटीग्रेटेड एक्वापार्क, समुद्री शैवाल की खेती, क्लाइमेट-रेज़िलिएंट कोस्टल फिशरमैन विलेजेज (CRCFVs), क्लस्टर डेवलपमेंट और आर्टिफिशियल रीफ जैसी विकास गतिविधियों को समयबद्ध रूप से आगे बढ़ाना आवश्यक है।
राष्ट्रीय सम्मेलन में भारत के मत्स्य भविष्य का रोडमैप तय।
सम्मेलन में डिजिटलीकरण पर भी विशेष जोर दिया गया। डॉ. लिखी ने राज्यों को कहा कि वे नेशनल फिशरीज़ डिजिटल पोर्टल पर मत्स्य पालन, एक्वाकल्चर और मत्स्य किसान पंजीकरण को बढ़ाएँ। इससे न सिर्फ डाटाबेस मजबूत होगा, बल्कि योजनाओं की निगरानी भी बेहतर ढंग से हो सकेगी। साथ ही उन्होंने एक्वाकल्चर बीमा कवरेज को व्यापक रूप से अपनाने को कहा ताकि मछुआरों की आजीविका सुरक्षित बनी रहे और प्राकृतिक आपदाओं के प्रभाव को कम किया जा सके।
सम्मेलन में इनलैंड मत्स्य पालन (जलगृह/तालाब) पर भी चर्चा हुई। इनलैंड जलाशयों का उपयोग अभी अपेक्षाकृत कम है और उसे विकसित करने की ज़रूरत है। संयुक्त सचिव (इनलैंड) श्री सागर मेहरा ने कहा कि नीतिगत समर्थन के बावजूद इनलैंड क्लस्टर पूरी तरह विकसित नहीं हुए हैं, और उन्हें उच्च मूल्य वाली प्रजातियों के साथ बाजार-उन्मुख बनाना आवश्यक है ताकि इन क्षेत्रों का निर्यात क्षमता भी बढ़ सके।
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तटीय मत्स्य पालन और मैरीकल्चर पर भी महत्वपूर्ण चर्चा हुई। संयुक्त सचिव (मरीन)नीतू कुमारी प्रसाद ने कहा कि भारत की लंबी तटरेखा को ध्यान में रखते हुए फिनफिश, शेलफिश, IMTA (Integrated Multi-Trophic Aquaculture), समुद्री शैवाल और खुले समुद्र में केज फार्मिंग जैसे आधुनिक और विविध क्षेत्र को अपनाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि वर्तमान में खारे पानी के संसाधनों का केवल एक छोटा हिस्सा ही उपयोग में लाया जा रहा है, जबकि इसके विस्तार से रोजगार और निर्यात दोनों को बढ़ावा मिलेगा। उन्होंने सौर सुखाने, हरित ईंधन तकनीकें जैसी जलवायु-अनुकूल तकनीकों को अपनाने पर भी ज़ोर दिया ताकि उत्पादन की गुणवत्ता बेहतर बने और बाद में होने वाले नुकसान को कम किया जा सके।
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