पूर्वोत्तर के किसानों को देशभर के बाजारों से जोड़ रहा है एनई-रेस पोर्टल, सिक्किम के किसानों को हुआ करोड़ों का फायदा
Gaon Connection | Feb 06, 2026, 13:20 IST
पूर्वोत्तर राज्यों के किसानों के लिए अपनी उपज बेचना अब पहले से कहीं ज्यादा आसान हो गया है। सरकार द्वारा शुरू किया गया 'पूर्वोत्तर क्षेत्र कृषि-वस्तु ई-कनेक्ट' यानी एनई-रेस पोर्टल इन इलाकों के किसानों को देश के किसी भी कोने के खरीदारों से सीधे जोड़ रहा है। यह डिजिटल मंच न केवल किसानों की आमदनी बढ़ाने में मदद कर रहा है, बल्कि उन्हें राष्ट्रीय बाजार तक पहुंच भी प्रदान कर रहा है।
एनई-रेस असल में एक ऑनलाइन बाजार है जो पूर्वोत्तर के किसानों, किसान उत्पादक संगठनों, स्वयं सहायता समूहों और सहकारी समितियों को पूरे देश के खरीदारों के साथ जोड़ता है। इस पोर्टल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां किसान अपनी फसल और कृषि उत्पाद सीधे खरीदारों को बेच सकते हैं। इससे बिचौलियों का खर्च बच जाता है और किसानों को उनकी मेहनत की उचित कीमत मिलती है। साधारण शब्दों में कहें तो यह एक डिजिटल हाट बाजार है जहां पूर्वोत्तर का किसान अपना सामान रख सकता है और देश के किसी भी राज्य या शहर का व्यापारी उसे देखकर खरीद सकता है।
23 जनवरी 2026 तक के ताजा आंकड़े बताते हैं कि यह पोर्टल लगातार लोकप्रिय हो रहा है और किसानों के बीच इसकी स्वीकार्यता बढ़ रही है। अब तक कुल 6,807 किसान, विक्रेता और किसान उत्पादक कंपनियां इस मंच से जुड़ चुकी हैं। वहीं दूसरी तरफ, देश भर से 735 खरीदार भी इस पोर्टल का हिस्सा बन चुके हैं। पोर्टल पर फिलहाल 1,797 तरह की कृषि वस्तुएं सूचीबद्ध हैं, जिनमें विभिन्न प्रकार की फसलें, सब्जियां, फल, मसाले और अन्य कृषि उत्पाद शामिल हैं। सबसे उत्साहजनक बात यह है कि अब तक इस मंच के जरिए लगभग 895.56 लाख रुपए यानी करीब 9 करोड़ रुपए का कारोबार हो चुका है। यह आंकड़ा साफ दर्शाता है कि डिजिटल माध्यम से किसानों और खरीदारों को जोड़ने की यह पहल कितनी सफल साबित हो रही है।
सिक्किम राज्य में यह पोर्टल विशेष रूप से कारगर साबित हुआ है। पहाड़ी इलाके में स्थित यह छोटा राज्य जैविक खेती के लिए पूरे देश में जाना जाता है। यहां के किसान गुणवत्ता वाली फसलें उगाते हैं, लेकिन भौगोलिक दूरी और परिवहन की चुनौतियों के कारण उन्हें अच्छे बाजार नहीं मिल पाते थे। एनई-रेस पोर्टल ने इस समस्या का समाधान निकाल दिया है।
सिक्किम के खरीदारों ने इस डिजिटल मंच के माध्यम से अब तक 130 मीट्रिक टन कृषि उपज खरीदी है, जिसकी कुल कीमत 54.40 लाख रुपए बैठती है। राज्य के कुल 251 किसान अब तक इस पोर्टल से जुड़ चुके हैं और नियमित रूप से अपनी उपज को यहां बेच रहे हैं। यह संख्या धीरे-धीरे बढ़ रही है क्योंकि जैसे-जैसे किसान इसके फायदे देख रहे हैं, वैसे-वैसे अधिक से अधिक लोग इस मंच का हिस्सा बनना चाह रहे हैं।
पोर्टल को इस्तेमाल करना आसान बनाने और किसानों तक इसकी पहुंच सुनिश्चित करने के लिए सरकार ने कई व्यावहारिक सुविधाएं शुरू की हैं। किसानों की सुविधा के लिए बहुभाषी हेल्पडेस्क और हेल्पलाइन सेवाओं की व्यवस्था की गई है, जहां वे अपनी स्थानीय भाषा में मदद ले सकते हैं। यह सुविधा खासतौर पर उन किसानों के लिए उपयोगी है जो हिंदी या अंग्रेजी में सहज नहीं हैं। पूर्वोत्तर राज्यों में अलग-अलग भाषाएं बोली जाती हैं, इसलिए बहुभाषी सहायता व्यवस्था बेहद जरूरी है।
राज्य स्तर पर विशेष समन्वयक नियुक्त किए गए हैं जो जमीनी स्तर पर किसानों की मदद करते हैं। ये समन्वयक किसानों को पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन कराने, तकनीकी समस्याओं का हल निकालने, अपने उत्पाद की सही जानकारी डालने और खरीदारों से संपर्क स्थापित करने में मार्गदर्शन देते हैं। इसके अलावा, ये समन्वयक रसद यानी लॉजिस्टिक्स संबंधी मामलों में भी सलाह देते हैं ताकि उपज समय पर और सुरक्षित तरीके से खरीदारों तक पहुंच सके।
सिक्किम में अब तक पांच आउटरीच और ऑनबोर्डिंग कार्यक्रम आयोजित किए जा चुके हैं। इन कार्यक्रमों में किसानों को पोर्टल के बारे में विस्तार से जानकारी दी जाती है, उन्हें व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाता है और उनकी शंकाओं का समाधान किया जाता है। इन कार्यक्रमों का उद्देश्य केवल जानकारी देना ही नहीं, बल्कि किसानों को डिजिटल बाजार के लिए तैयार करना भी है। इसके साथ ही, पोर्टल की पहुंच बढ़ाने के लिए अंतरराज्यीय खरीदार-विक्रेता बैठकों का आयोजन भी किया जा रहा है। इन बैठकों में किसान और व्यापारी आपस में सीधे मिलते हैं, एक-दूसरे की जरूरतों को समझते हैं और लंबे समय के व्यापारिक रिश्ते बनाते हैं। यह सीधा संवाद दोनों पक्षों के लिए फायदेमंद साबित हो रहा है।
पूर्वोत्तर राज्यों में हमेशा से ही गुणवत्ता वाली कृषि उपज होती रही है। यहां की जलवायु और मिट्टी कई तरह की फसलों के लिए उपयुक्त है। खासतौर पर जैविक खेती, मसाले, फल और विशेष किस्म की सब्जियां यहां की पहचान हैं। लेकिन दूर-दराज के इलाके होने, पहाड़ी भूभाग, सीमित परिवहन सुविधाओं और देश के बाकी हिस्सों से कम जुड़ाव के कारण यहां के किसानों को अच्छे बाजार नहीं मिल पाते थे। अक्सर उन्हें अपनी उपज स्थानीय बाजारों में ही कम कीमत पर बेचनी पड़ती थी। बिचौलियों की लंबी श्रृंखला के कारण भी किसानों को उनकी मेहनत का उचित मूल्य नहीं मिल पाता था। एनई-रेस पोर्टल ने इन सभी बाधाओं को तकनीक की मदद से दूर कर दिया है।
अब किसान घर बैठे अपनी उपज की जानकारी पोर्टल पर डाल सकते हैं और पूरे देश के खरीदार उसे देख सकते हैं। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों के व्यापारी सीधे पूर्वोत्तर के किसानों से संपर्क कर सकते हैं और उनसे सामान खरीद सकते हैं। इससे किसानों को बेहतर कीमत मिल रही है और खरीदारों को गुणवत्ता वाला ताजा सामान सीधे उत्पादक से मिल रहा है। यह व्यवस्था दोनों पक्षों के लिए फायदेमंद है। पोर्टल पर पारदर्शिता है, किसान और खरीदार सीधे बात कर सकते हैं और आपसी सहमति से कीमत तय कर सकते हैं। इससे बाजार में उचित प्रतिस्पर्धा भी बनती है और किसानों को उनकी उपज की असली कीमत का पता चलता है।
पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय के राज्य मंत्री डॉ. सुकांत मजूमदार ने हाल ही में राज्यसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में यह सारी जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि यह पोर्टल पूर्वोत्तर के किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने में अहम भूमिका निभा रहा है। सरकार का उद्देश्य इस पहल को और विस्तार देना है ताकि पूर्वोत्तर के हर किसान इस डिजिटल बाजार से जुड़ सके। जैसे-जैसे अधिक किसान और खरीदार इस मंच से जुड़ेंगे, कारोबार की मात्रा बढ़ेगी और पूर्वोत्तर की कृषि अर्थव्यवस्था को नई गति मिलेगी। यह पोर्टल न केवल किसानों की आमदनी बढ़ाने का जरिया है, बल्कि पूर्वोत्तर राज्यों को देश की मुख्यधारा की अर्थव्यवस्था से जोड़ने का एक सशक्त माध्यम भी बन रहा है।
23 जनवरी 2026 तक के ताजा आंकड़े बताते हैं कि यह पोर्टल लगातार लोकप्रिय हो रहा है और किसानों के बीच इसकी स्वीकार्यता बढ़ रही है। अब तक कुल 6,807 किसान, विक्रेता और किसान उत्पादक कंपनियां इस मंच से जुड़ चुकी हैं। वहीं दूसरी तरफ, देश भर से 735 खरीदार भी इस पोर्टल का हिस्सा बन चुके हैं। पोर्टल पर फिलहाल 1,797 तरह की कृषि वस्तुएं सूचीबद्ध हैं, जिनमें विभिन्न प्रकार की फसलें, सब्जियां, फल, मसाले और अन्य कृषि उत्पाद शामिल हैं। सबसे उत्साहजनक बात यह है कि अब तक इस मंच के जरिए लगभग 895.56 लाख रुपए यानी करीब 9 करोड़ रुपए का कारोबार हो चुका है। यह आंकड़ा साफ दर्शाता है कि डिजिटल माध्यम से किसानों और खरीदारों को जोड़ने की यह पहल कितनी सफल साबित हो रही है।
सिक्किम राज्य में यह पोर्टल विशेष रूप से कारगर साबित हुआ है। पहाड़ी इलाके में स्थित यह छोटा राज्य जैविक खेती के लिए पूरे देश में जाना जाता है। यहां के किसान गुणवत्ता वाली फसलें उगाते हैं, लेकिन भौगोलिक दूरी और परिवहन की चुनौतियों के कारण उन्हें अच्छे बाजार नहीं मिल पाते थे। एनई-रेस पोर्टल ने इस समस्या का समाधान निकाल दिया है।
सिक्किम के खरीदारों ने इस डिजिटल मंच के माध्यम से अब तक 130 मीट्रिक टन कृषि उपज खरीदी है, जिसकी कुल कीमत 54.40 लाख रुपए बैठती है। राज्य के कुल 251 किसान अब तक इस पोर्टल से जुड़ चुके हैं और नियमित रूप से अपनी उपज को यहां बेच रहे हैं। यह संख्या धीरे-धीरे बढ़ रही है क्योंकि जैसे-जैसे किसान इसके फायदे देख रहे हैं, वैसे-वैसे अधिक से अधिक लोग इस मंच का हिस्सा बनना चाह रहे हैं।
पोर्टल को इस्तेमाल करना आसान बनाने और किसानों तक इसकी पहुंच सुनिश्चित करने के लिए सरकार ने कई व्यावहारिक सुविधाएं शुरू की हैं। किसानों की सुविधा के लिए बहुभाषी हेल्पडेस्क और हेल्पलाइन सेवाओं की व्यवस्था की गई है, जहां वे अपनी स्थानीय भाषा में मदद ले सकते हैं। यह सुविधा खासतौर पर उन किसानों के लिए उपयोगी है जो हिंदी या अंग्रेजी में सहज नहीं हैं। पूर्वोत्तर राज्यों में अलग-अलग भाषाएं बोली जाती हैं, इसलिए बहुभाषी सहायता व्यवस्था बेहद जरूरी है।
राज्य स्तर पर विशेष समन्वयक नियुक्त किए गए हैं जो जमीनी स्तर पर किसानों की मदद करते हैं। ये समन्वयक किसानों को पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन कराने, तकनीकी समस्याओं का हल निकालने, अपने उत्पाद की सही जानकारी डालने और खरीदारों से संपर्क स्थापित करने में मार्गदर्शन देते हैं। इसके अलावा, ये समन्वयक रसद यानी लॉजिस्टिक्स संबंधी मामलों में भी सलाह देते हैं ताकि उपज समय पर और सुरक्षित तरीके से खरीदारों तक पहुंच सके।
सिक्किम में अब तक पांच आउटरीच और ऑनबोर्डिंग कार्यक्रम आयोजित किए जा चुके हैं। इन कार्यक्रमों में किसानों को पोर्टल के बारे में विस्तार से जानकारी दी जाती है, उन्हें व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाता है और उनकी शंकाओं का समाधान किया जाता है। इन कार्यक्रमों का उद्देश्य केवल जानकारी देना ही नहीं, बल्कि किसानों को डिजिटल बाजार के लिए तैयार करना भी है। इसके साथ ही, पोर्टल की पहुंच बढ़ाने के लिए अंतरराज्यीय खरीदार-विक्रेता बैठकों का आयोजन भी किया जा रहा है। इन बैठकों में किसान और व्यापारी आपस में सीधे मिलते हैं, एक-दूसरे की जरूरतों को समझते हैं और लंबे समय के व्यापारिक रिश्ते बनाते हैं। यह सीधा संवाद दोनों पक्षों के लिए फायदेमंद साबित हो रहा है।
पूर्वोत्तर राज्यों में हमेशा से ही गुणवत्ता वाली कृषि उपज होती रही है। यहां की जलवायु और मिट्टी कई तरह की फसलों के लिए उपयुक्त है। खासतौर पर जैविक खेती, मसाले, फल और विशेष किस्म की सब्जियां यहां की पहचान हैं। लेकिन दूर-दराज के इलाके होने, पहाड़ी भूभाग, सीमित परिवहन सुविधाओं और देश के बाकी हिस्सों से कम जुड़ाव के कारण यहां के किसानों को अच्छे बाजार नहीं मिल पाते थे। अक्सर उन्हें अपनी उपज स्थानीय बाजारों में ही कम कीमत पर बेचनी पड़ती थी। बिचौलियों की लंबी श्रृंखला के कारण भी किसानों को उनकी मेहनत का उचित मूल्य नहीं मिल पाता था। एनई-रेस पोर्टल ने इन सभी बाधाओं को तकनीक की मदद से दूर कर दिया है।
अब किसान घर बैठे अपनी उपज की जानकारी पोर्टल पर डाल सकते हैं और पूरे देश के खरीदार उसे देख सकते हैं। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों के व्यापारी सीधे पूर्वोत्तर के किसानों से संपर्क कर सकते हैं और उनसे सामान खरीद सकते हैं। इससे किसानों को बेहतर कीमत मिल रही है और खरीदारों को गुणवत्ता वाला ताजा सामान सीधे उत्पादक से मिल रहा है। यह व्यवस्था दोनों पक्षों के लिए फायदेमंद है। पोर्टल पर पारदर्शिता है, किसान और खरीदार सीधे बात कर सकते हैं और आपसी सहमति से कीमत तय कर सकते हैं। इससे बाजार में उचित प्रतिस्पर्धा भी बनती है और किसानों को उनकी उपज की असली कीमत का पता चलता है।
पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय के राज्य मंत्री डॉ. सुकांत मजूमदार ने हाल ही में राज्यसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में यह सारी जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि यह पोर्टल पूर्वोत्तर के किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने में अहम भूमिका निभा रहा है। सरकार का उद्देश्य इस पहल को और विस्तार देना है ताकि पूर्वोत्तर के हर किसान इस डिजिटल बाजार से जुड़ सके। जैसे-जैसे अधिक किसान और खरीदार इस मंच से जुड़ेंगे, कारोबार की मात्रा बढ़ेगी और पूर्वोत्तर की कृषि अर्थव्यवस्था को नई गति मिलेगी। यह पोर्टल न केवल किसानों की आमदनी बढ़ाने का जरिया है, बल्कि पूर्वोत्तर राज्यों को देश की मुख्यधारा की अर्थव्यवस्था से जोड़ने का एक सशक्त माध्यम भी बन रहा है।