KOOD: मिलें नीलेश मिसरा की पहली फिल्म ‘कूद’ के मेकर्स से, जानें क्या है उनकी राय

Anshika Dixit | Apr 11, 2026, 15:05 IST
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नीलेश मिसरा की फिल्म 'कूद' एक ऐसी यात्रा है जो दर्शकों को खुद के साथ जोड़ने पर मजबूर करती है। यह फिल्म केवल दिखाई नहीं देती, बल्कि दर्शकों के जीवन में उतर जाती है। इस फिल्स से जुड़ें लोगों ने अपने अनुभव शेयर किए हैं। उन्होंने बताया कि कैसे हर सदस्य ने अपने जुनून को इस प्रोजेक्ट में समर्पित किया, चाहे वो फिल्म की सह नायिका हों, स्क्रीनप्ले राइटर हों, चीफ ए डी हों या फिर इस पूरी फिल्म को कैमरे में कैद करने वाले डीओपी।

फिल्म कूद के मेकर्स की राय
फिल्म कूद के मेकर्स की राय
फिल्म कूद के मेकर्स की राय
नीलेश मिसरा की फिल्म 'कूद' एक ऐसी कहानी है जो जल्दबाजी नहीं करती, बल्कि किरदारों के साथ ठहरकर, खामोशी को बोलने और पलों को थोड़ा लंबा महसूस करने का मौका देती है। यह फिल्म सिर्फ देखी नहीं जाती, बल्कि जी जाती है। फिल्म के निर्माण से जुड़े लोगों के अनुभवों से पता चलता है कि कैसे एक कहानी को पर्दे पर उतारने के लिए हर किसी ने अपना सौ प्रतिशत दिया।

फिल्म के निर्देशक और मुख्य किरदार नीलेश मिसरा

नीलेश मिसरा
नीलेश मिसरा
नीलेश मिसरा
नीलेश मिसरा, जो हमेशा से कहानियों को कहने के लिए जाने जाते हैं, चाहे वो पत्रकारिता हो, गाने हों या रेडियो शो। मिसरा हमेशा अपने श्रोताओं, पाठकों और अब दर्शकों के लिए खूबसूरत और सीधी-सादी कहानियाँ लाते रहे हैं। उनकी कहानियाँ जितनी सीधी होती हैं, उतनी ही अंदर तक असर करने की ताकत रखती हैं। अभिनेता के तौर पर अपने अनुभव के बारे में निलेश मिसरा कहते हैं, "मैं काफी समय से माइक के सामने एक्टिंग कर रहा हूँ! इतने सालों से मैंने अपनी आवाज़ से एक्टिंग की है। यह पहली बार है जब मैं कैमरे के सामने आया हूँ। लेकिन यह एक नया अनुभव रहा है, जिसने मुझे बहुत कुछ सिखाया है! मैं हमेशा नई चीजें आजमाने और हर घबराहट भरे पहले कदम को पूरे उत्साह के साथ उठाने के लिए तैयार रहता हूँ!"

फिल्म की सह-अभिनेत्री रहीं केतकी कुलकर्णी

केतकी कुलकर्णी
केतकी कुलकर्णी
केतकी कुलकर्णी
फिल्म की सह-अभिनेत्री केतकी कुलकर्णी के लिए यह सफर एक तरह से पूरा होने जैसा था। केतकी कहती हैं, "FM पर उनकी कहानियाँ सुनने से लेकर उनके साथ एक ही क्रिएटिव स्पेस साझा करने तक, सब कुछ ज्यादा देर तक अजनबी नहीं लगा। सेट पर एक सहजता और अपनापन था, जिससे एक गंभीर कहानी भी हल्की लगने लगी, जिसे दिल सहजता से जिया जा सका। दिन इतने स्वाभाविक तरीके से बीते कि कब खत्म हो गए, पता ही नहीं चला। उनके अनुसार, इतने करीब से किसी कहानी को बनते देखना किसी जादू से कम नहीं था।"

स्क्रीनप्ले राइटर अनुलता राज नायर

अनुलता राय नायर
अनुलता राय नायर
After joining Neelesh Misra’s Writers’ Mandali in 2014, I went on to write over 300 stories, eventually growing into the role of Creative Head. From *Yaadon Ka Idiot Box* to government projects and branded content, I’ve written extensively across formats, including for some of the biggest audio platforms.After years of writing, I felt a strong pull towards films. After studying many books, I realize that screenwriting is a completely different craft. I embraced it as a challenge—enrolling in multiple online classes and immersing myself in countless YouTube tutorials.One of the toughest parts was learning to write in the *Final Draft* format, the industry standard. But the desire to learn kept me going, and I picked it up. I began to understand the fundamental differences between writing for audio and for visual storytelling. In audio, the more descriptive and lyrical the language, the better it works.
इस कहानी को आकार दिया इसकी स्क्रीनप्ले राइटर अनुलता राज नायर ने, जिनका सफर सीखने और कई चीजें दोबारा समझने से भरा रहा। ऑडियो के लिए लंबे समय तक लिखने के बाद उनका रुझान फिल्मों की ओर हुआ, लेकिन उन्होंने जल्द ही महसूस किया कि यह कला कितनी अलग है।

वह कहती हैं, “स्क्रीनराइटिंग पूरी तरह अलग कला है।” जहाँ ऑडियो में वह खुलकर और विस्तार से लिख सकती थीं, वहीं फिल्मों में कम शब्दों में बात कहने की जरूरत होती है। “असली ताकत कम शब्दों में होती है।” इस बदलाव के साथ तालमेल बैठाना और Final Draft जैसे टूल्स सीखना भी उनके सफर का हिस्सा रहा।

वह आगे कहती हैं, “मैंने सीखा कि स्क्रीनराइटर निर्देशक नहीं होता। उसे विजुअल माध्यम के लिए जगह छोड़नी होती है।” और इसी जगह में ‘कूद’ धीरे-धीरे जीवंत हो उठी।

चीफ A D रितम नन्दी

Chief AD- Ritam Nandy
Chief AD- Ritam Nandy
Chief AD- Ritam Nandy
फिर बात आती है सेट की लय की। रितम के लिए यह फिल्म योजना और सहजता के बीच बनी। चीफ असिस्टेंट डायरेक्टर के रूप में उनका काम सिर्फ शूट संभालना नहीं था, बल्कि पूरी प्रक्रिया को संतुलित रखना भी था। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि फिल्म की सोच सही दिशा में रहे और सेट का माहौल संतुलित बना रहे, जिससे कहानी बिना रुकावट के आगे बढ़ सके।

‘कूद’ जैसी फिल्म में, खामोशी और ठहराव भी उतने ही अहम हैं जितने संवाद, वहाँ यह संतुलन और भी जरूरी हो जाता है।

कूद फिल्म के डीओपी अभिषेक वर्मा

अभिषेक वर्मा
अभिषेक वर्मा
From documenting reality to crafting it through cinema, Kood marks my transition into fiction as a Director of Photography. My journey as a documentary filmmaker has always been rooted in capturing truth as it unfolds, but this film allowed me to build moments, shape light, and design emotion frame by frame. It has been a deeply fulfilling shift—from observing stories to visually creating them. Kood represents a new chapter, one I step into with gratitude for the team and the learning that came with it.
और फिर बात आती है इसे कैमरे में कैद करने की। डीओपी अभिषेक वर्मा के लिए ‘कूद’ एक बदलाव की तरह थी-जहाँ उन्होंने हकीकत को सिर्फ दिखाने से आगे बढ़कर उसे महसूस कराने की कोशिश की। डॉक्यूमेंट्री की दुनिया में रहने के बाद उन्होंने फिक्शन में कदम रखा, जहाँ वो सिर्फ देखने वाले नहीं, बल्कि पलों को रचने वाले बन गए। रोशनी, मूवमेंट और भावनाएं अब खुद बनानी पड़ती थीं, एक-एक फ्रेम में।

इन सभी लोगों के इस सफर की कहानी ने मिलकर सिर्फ एक फिल्म नहीं बनाई, बल्कि एक खास स्पेस तैयार किया। एक ऐसा माहौल, जहाँ कहानियों को जल्दीबाजी में नहीं बताया गया, अभिनय को मजबूर नहीं किया गया और विजुअल्स सिर्फ दिखे नहीं, बल्कि महसूस भी किए गए। क्योंकि कई बार हम जो देखते हैं, वह कहानी का सिर्फ एक हिस्सा होता है-बाकी हिस्सा उस सफर में छिपा होता है, जो उसे जीवंत बनाते हैं।

तो क्या आपने ‘कूद’ देखी? अगर हांँ, तो हमें जरूर बताइए कि आपको इसमें सबसे ज्यादा क्या खास लगा। फिल्म का लिंक नीचे दिया जा रहा है। अभी तक नहीं देखी तो ये फिल्म जरूर देखें और अपना अनुभव शेयर करें।

https://www.youtube.com/watch?v=b6EJa74GnHM&t=319s
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