Online Gaming: बस एक नोटिफिकेशन…और किताबें हो जाती बंद! माता-पिता कैसे रखें बच्चों पर ध्यान?
Preeti Nahar | Feb 06, 2026, 18:12 IST
साल 2026 में ऑनलाइन गेमिंग की लत ने बच्चों को अकेलेपन की ओर धकेला है। गाजियाबाद, कैथल और भोपाल में हुई घटनाओं ने देश के माता-पिताओं को सोचने पर मजबूर कर दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऑनलाइन गेमिंग का बच्चों के दिमाग और व्यवहार पर गहरा असर पड़ रहा है। यह समस्या अब पूरे देश में फैल रही है क्योंकि ऑनलाइन गेम खेलते समय हमारे दिमाग में डोपामिन नाम का एक रसायन निकलता है जो खुशी और सेटिसफैक्शन का एहसास कराता है। इसी वजह से बच्चे बार-बार गेम खेलने की इच्छा रखते हैं। धीरे-धीरे, दिमाग को इस तुरंत मिलने वाली खुशी की आदत पड़ जाती है।
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ये सिर्फ हेडलाइन्स नहीं हैं, ये आज के समाज की सच्चाई है जो आए दिन हम सबको सोचने पर मजबूर कर रही है कि आख़िर बच्चों का ध्यान स्क्रीन से कैसे हटाया जाए। ऑनलाइन गेम्स की लत और बच्चों के बिगड़ते मानसिक हालात उन्हें अकेलेपन की तरफ धकेल रहे हैं और ये कुछ हैरान करने वाले हादसे साल 2026 के हैं। इन तीनों ही हादसों ने पूरे देश को चौंका दिया है। ऑनलाइन गेमिंग से जुड़ी इन दुखद घटनाओं ने फिर से चिंता बढ़ा दी है कि क्या बच्चों और किशोरों के लिए अत्यधिक ऑनलाइन गेम खेलना उनके मानसिक स्वास्थ्य के लिए खतरा बन रहा है। विशेषज्ञों और डॉक्टरों का कहना है कि ऑनलाइन गेमिंग की लत बच्चों के दिमाग और व्यवहार पर गहरा असर डालती है और यह समस्या अब सिर्फ एक शहर या परिवार तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश में फैल रही है।
कोरोना काल के दौरान मोबाइल फ़ोन बच्चों की पढ़ाई के लिए बेहद ज़रूरी हो गया था और मोबाइल ही एक ज़रिया था, जिसकी मदद से बच्चों को घर पर ही शिक्षा दी जा रही थी। कई अभिभावकों ने क़र्ज़ पर स्मार्टफोन लेकर अपने बच्चों को दिया। इसका असर ये हुआ स्मार्टफोन लगभग हर घर का हिस्सा बन गया और खासकर छोटे बच्चों को अपना खुद का निजी स्मार्टफोन मिल गया। प्रथम' (Pratham) फाउंडेशन की 'असर' (ASER) 2020 की रिपोर्ट (वेव 1) के मुताबिक जहाँ पहले गाँवों में कोविड के समय 36.5 प्रतिशत घरों में स्मार्टफोन था, वहीं कोविड के बाद के दो सालों के अंदर-अंदर 61.8 प्रतिशत घरों में स्मार्टफोन पहुँच चुका है। रिपोर्ट में लिखा है कि 2020 में लगभग एक-तिहाई ग्रामीण बच्चों के पास पढ़ाई के लिए कोई ऑनलाइन सामग्री नहीं थी, जबकि स्कूलों ने डिजिटल माध्यमों (जैसे स्मार्टफोन 61.8% घरों में) का उपयोग बढ़ा दिया था।
इसी सिलसिले में पुखरायां के सरकारी स्कूल में अंग्रेजी के अध्यापक ज्ञानेंद्र सिंह से बात की उन्होंने गाँव कनेक्शन को बताया, "कोरोना के समय पर में जिस पब्लिक स्कूल में पढ़ाता था वहां माता-पिता की एक ही शिकायत हमेशा रहती थी की उनका बच्चा पढ़ता नहीं और दिन भर मोबाइल फ़ोन पर लगा रहता है।"वो आगे कहते हैं, "बच्चे मोबाइल पर पढ़ाई छोड़ कर बाकी सब करते हैं जैसे गेम खेलना, रील्स बनान। आज कल तकनीक का ज़माना है मोबाइल से बच्चे पढाई करते हैं गूगल पर सर्च करते हैं और इसमें कोई दिक्कत भी नहीं लेकिन माता पिता का ये फ़र्ज़ बनता है कि वो अपने बच्चों पर नज़र रखे की वो मोबाइल पर क्या कर रहे हैं और कितनी देर मोबाइल चला रहे है, बच्चों को बाहर खेलने के लिए प्रोत्साहित करें और उनके साथ समय भी बिताएं।"
इस बात से नकारा नहीं जा सकता की मोबाइल का सही तरह से प्रयोग किया जाए तो ये बच्चों की पढ़ाई के लिए वरदान साबित हो सकता है, लेकिन मोबाइल पर आने वाले तमाम सोशल मीडिया एप्लीकेशन और गेम्स इस तरह तैयार किए जाते हैं कि लोग उनमे अपना ज़्यादा से ज़्यादा समय दें और इसी आधार पर अटेंशन इकोनॉमी चलती हैं।
इसी पर सामाजिक अध्येयता विभांशु कल्ला कहते हैं, "स्क्रीन टाइम, अटेंशन इकोनॉमी का हिस्सा है, पूरे विश्व में स्क्रीन पर रुकने का समय बड़ी टेक कंपनियों के मुनाफे का आधार बन चुका है। इसमें उपभोक्ताओं को किसी सुविधा के लिए एडिक्ट बनाया जाता है, धीरे- धीरे लोग अपनी मानसिक संतुष्टि के लिए इन सुविधाओं पर निर्भर हो जाते हैं, इसे लिम्बिक कैपिटलिज्म (Limbic Capitalism)कहते हैं।
टीनएजर्स लिम्बिक कैपिटलिज्म के सबसे आसान शिकार हैं । इस आयु वर्ग के किशोर इन्टरनेट पर नए-नए आते हैं, इन पर भौतिक दुनिया में परिजनों और शिक्षकों की ढ़ेर सारी पाबंदियाँ होती हैं, जबकि इंटरनेट पर खुद को को आज़ाद पाते हैं, लेकिन जल्द ही ये आजादी एडिक्शन में तब्दील हो जाती है।"
IAMAI की Internet in India Report 2025 के अनुसार, भारत में एक्टिव इंटरनेट यूजर्स की संख्या 95.8 करोड़ तक पहुंच गई है। जोकि 2024 की तुलना में आठ गुना ज्यादा हैं। कुल इंटरनेट यूजर्स में से 57 प्रतिशत (54.8 करोड़) ग्रामीण क्षेत्रों से हैं। रिपोर्ट बताती है कि गांवों में इंटरनेट अपनाने की रफ्तार शहरों के मुकाबले चार गुना ज्यादा है। हालांकि रिपार्ट ये भी बताती है कि देश की 38% आबादी (करीब 57.9 करोड़ लोग) अभी भी इंटरनेट से दूर है, लेकिन ये अंतर भी कुछ ही साल में धीरे-धीरे कम हो जाएगा।
दिल्ली के गंगाराम अस्पताल के साइकायट्रिस्ट डॉ राजीव मेहता बताते हैं कि- जब ऑनलाइन गेमिंग मनोरंजन की हद पार कर जाती है, तो यह मानसिक तनाव, चिड़चिड़ापन और भावनात्मक अस्थिरता पैदा कर सकती है। कई गेम्स में हार-जीत, स्कोर और लगातार टास्क पूरे करने का दबाव होता है। यह दबाव बच्चों के आत्मविश्वास और आत्म-सम्मान को ठेस पहुंचाता है। बार-बार हारने पर वे खुद को असफल मानने लगते हैं और अकेलापन महसूस कर सकते हैं।
- ऑनलाइन गेम खेलते समय हमारे दिमाग में डोपामिन नाम का एक रसायन निकलता है जो खुशी और सेटिसफैक्शन का एहसास कराता है। इसी वजह से बच्चे बार-बार गेम खेलने की इच्छा रखते हैं। धीरे-धीरे, दिमाग को इस तुरंत मिलने वाली खुशी की आदत पड़ जाती है।
- इसके बाद पढ़ाई, परिवार या सामाजिक गतिविधियाँ उन्हें उबाऊ लगने लगती हैं। यही स्थिति आगे चलकर गेमिंग एडिक्शन यानी गेमिंग की लत का रूप ले लेती है। इस सिचुएशन में अगर इन गेम्स को जब बच्चों से छीन लिया जाता है या किसी भी कारण से बच्चों को इन गेम्स से दूर जाना पड़े तो उनकी मानसिक हेल्थ बिगड़ जाती है, जिसकी शुरूआत डिप्रेशन से होती है और आत्महत्या तक भी जा सकती है।
National Library of Medicine के अनुसार - दुनिया भर में हुए कई शोध इस बात की पुष्टि करते हैं कि अत्यधिक ऑनलाइन गेमिंग और मानसिक समस्याओं के बीच गहरा संबंध है। रिसर्च के अनुसार, जिन बच्चों और किशोरों में इंटरनेट गेमिंग डिसऑर्डर (Internet Gaming Disorder) पाया गया, उनमें डिप्रेशन (Depression), एंग्जायटी (Anxiety) और स्ट्रेस (Stress) का स्तर सामान्य बच्चों की तुलना में ज्यादा था। इसके साथ ही, उनमें नींद न आने की समस्या, थकान और चिड़चिड़ापन भी आम था।
Indian Journal of Social Psychiatryअध्ययन में यह बात सामने आई कि जो बच्चे ज्यादा देर तक ऑनलाइन गेम खेलते हैं, उनकी जीवनशैली बुरी तरह प्रभावित होती है। वे देर रात तक जागते हैं, समय पर खाना नहीं खाते और शारीरिक गतिविधियों से दूर हो जाते हैं। इससे न केवल उनका शारीरिक स्वास्थ्य कमजोर होता है, बल्कि मानसिक संतुलन भी बिगड़ने लगता है। उनकी सामाजिक जिंदगी सीमित हो जाती है और वे असल दुनिया से कटने लगते हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने भी इस समस्या को गंभीरता से लिया है और गेमिंग डिसऑर्डर को एक मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी स्थिति के रूप में मान्यता दी है। WHO के अनुसार, "जब कोई व्यक्ति गेमिंग पर नियंत्रण खो देता है और इसके कारण उसकी पढ़ाई, काम, रिश्ते और दैनिक जीवन प्रभावित होने लगते हैं, तो इसे गंभीर चेतावनी के रूप में देखा जाना चाहिए।" अगर यह स्थिति महीनों तक बनी रहे, तो विशेषज्ञ की मदद लेना बहुत जरूरी हो जाता है।
साइकायट्रिस्ट डॉ राजीव मेहता बताते हैं कि- बच्चों को ऑनलाइन गेमिंग की लत से बचाने के लिए और उनका फोकस स्थिर रखने के लिए कुछ जरूरी उपाय है जिनका खास ख्याल सिर्ऱ बच्चों को ही नहीं रखना बल्कि स्कूल शिक्षकों से लेकर माता-पिता, गार्जियन सबको रखना होगा।
1 - इस समस्या से निपटने में माता-पिता और शिक्षकों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। अक्सर माता-पिता बच्चों को शांत रखने या व्यस्त रखने के लिए उन्हें मोबाइल दे देते हैं, लेकिन बाद में यही आदत एक बड़ी समस्या बन जाती है। बच्चों के स्क्रीन टाइम (Screen Time) पर ध्यान देना, उनसे खुलकर बात करना और उनकी भावनाओं को समझना बहुत जरूरी है। सिर्फ डांटने या मोबाइल छीनने से यह समस्या हल नहीं होती।
2 - स्कूलों को भी इस मुद्दे पर गंभीरता दिखानी चाहिए। शिक्षकों को बच्चों के व्यवहार में आ रहे बदलावों को समझना चाहिए। अगर कोई बच्चा लगातार चुप रहने लगे, पढ़ाई में पिछड़ने लगे या गुस्सैल व्यवहार दिखाए, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। स्कूल काउंसलर (School Counselor) और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की मदद से समय रहते बच्चों को सही रास्ता दिखाया जा सकता है।
3- हालांकि, हर तरह की गेमिंग नुकसानदायक नहीं होती। सीमित और नियंत्रित समय तक गेम खेलना बच्चों के लिए मनोरंजन और सीखने का जरिया भी बन सकता है। कुछ गेम्स से समस्या-सुलझाने की क्षमता और टीमवर्क (Teamwork) जैसे कौशल विकसित होते हैं। समस्या तब शुरू होती है, जब संतुलन बिगड़ जाता है और गेमिंग ही जीवन का मुख्य हिस्सा बन जाती है।
4- बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए माता-पिता की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। उन्हें बच्चों से बिना किसी झिझक के बात करनी चाहिए, स्क्रीन टाइम की सीमा तय करनी चाहिए और शारीरिक गतिविधियों, शौक और परिवार के साथ समय बिताने को बढ़ावा देना चाहिए। अगर बच्चा परिवार से दूर होने लगे, चिड़चिड़ा हो जाए, नींद और पढ़ाई में कमी आए या जिन कामों में पहले मज़ा आता था, उनमें रुचि खो दे, तो यह खतरे की घंटी है।
5- ऐसी स्थिति में सिर्फ स्क्रीन टाइम कम करना काफी नहीं है। समय रहते किसी मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ, काउंसलर या चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट की मदद लेना ज़रूरी है। इससे बच्चे के लिए एक संतुलित दिनचर्या, भावनात्मक जुड़ाव और असली दुनिया में एक मज़बूत सपोर्ट सिस्टम फिर से तैयार किया जा सकता है।
ऑनलाइन गेमिंग अपने आप में बुरी नहीं है, लेकिन इसकी लत बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए खतरनाक साबित हो सकती है। डिप्रेशन, चिंता, नींद की समस्या और सामाजिक दूरी जैसे लक्षण इसके संकेत हैं। अगर माता-पिता, शिक्षक और समाज मिलकर बच्चों को संतुलित जीवनशैली की ओर ले जाने में मदद करें, तो इस खतरे से काफी हद तक बचा जा सकता है।
: हरियाणा, कैथल में किशोर ने ऑनलाइन गेम का टास्क पूरा करने के लिए अपने ही पिता की गर्दन पर चाकू रख दिया!
: मोबाइल गेम की लत के कारण, परिवार ने डांटा, भोपाल में 14 वर्षीय छात्र ने लगा ली फांसी!
ये सिर्फ हेडलाइन्स नहीं हैं, ये आज के समाज की सच्चाई है जो आए दिन हम सबको सोचने पर मजबूर कर रही है कि आख़िर बच्चों का ध्यान स्क्रीन से कैसे हटाया जाए। ऑनलाइन गेम्स की लत और बच्चों के बिगड़ते मानसिक हालात उन्हें अकेलेपन की तरफ धकेल रहे हैं और ये कुछ हैरान करने वाले हादसे साल 2026 के हैं। इन तीनों ही हादसों ने पूरे देश को चौंका दिया है। ऑनलाइन गेमिंग से जुड़ी इन दुखद घटनाओं ने फिर से चिंता बढ़ा दी है कि क्या बच्चों और किशोरों के लिए अत्यधिक ऑनलाइन गेम खेलना उनके मानसिक स्वास्थ्य के लिए खतरा बन रहा है। विशेषज्ञों और डॉक्टरों का कहना है कि ऑनलाइन गेमिंग की लत बच्चों के दिमाग और व्यवहार पर गहरा असर डालती है और यह समस्या अब सिर्फ एक शहर या परिवार तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश में फैल रही है।
कोरोना काल में अधिक बढ़ा मोबाइल का चलन
बच्चों में बढ़ती मोबाइल गेम की लत<br>
इसी सिलसिले में पुखरायां के सरकारी स्कूल में अंग्रेजी के अध्यापक ज्ञानेंद्र सिंह से बात की उन्होंने गाँव कनेक्शन को बताया, "कोरोना के समय पर में जिस पब्लिक स्कूल में पढ़ाता था वहां माता-पिता की एक ही शिकायत हमेशा रहती थी की उनका बच्चा पढ़ता नहीं और दिन भर मोबाइल फ़ोन पर लगा रहता है।"वो आगे कहते हैं, "बच्चे मोबाइल पर पढ़ाई छोड़ कर बाकी सब करते हैं जैसे गेम खेलना, रील्स बनान। आज कल तकनीक का ज़माना है मोबाइल से बच्चे पढाई करते हैं गूगल पर सर्च करते हैं और इसमें कोई दिक्कत भी नहीं लेकिन माता पिता का ये फ़र्ज़ बनता है कि वो अपने बच्चों पर नज़र रखे की वो मोबाइल पर क्या कर रहे हैं और कितनी देर मोबाइल चला रहे है, बच्चों को बाहर खेलने के लिए प्रोत्साहित करें और उनके साथ समय भी बिताएं।"
स्क्रीन टाइम के आधार पर चलती है अटेंशन इकोनॉमी
भारत में एक्टिव इंटरनेट यूजर्स की संख्या 95.8 करोड़ तक पहुंची
इसी पर सामाजिक अध्येयता विभांशु कल्ला कहते हैं, "स्क्रीन टाइम, अटेंशन इकोनॉमी का हिस्सा है, पूरे विश्व में स्क्रीन पर रुकने का समय बड़ी टेक कंपनियों के मुनाफे का आधार बन चुका है। इसमें उपभोक्ताओं को किसी सुविधा के लिए एडिक्ट बनाया जाता है, धीरे- धीरे लोग अपनी मानसिक संतुष्टि के लिए इन सुविधाओं पर निर्भर हो जाते हैं, इसे लिम्बिक कैपिटलिज्म (Limbic Capitalism)कहते हैं।
टीनएजर्स लिम्बिक कैपिटलिज्म के सबसे आसान शिकार हैं । इस आयु वर्ग के किशोर इन्टरनेट पर नए-नए आते हैं, इन पर भौतिक दुनिया में परिजनों और शिक्षकों की ढ़ेर सारी पाबंदियाँ होती हैं, जबकि इंटरनेट पर खुद को को आज़ाद पाते हैं, लेकिन जल्द ही ये आजादी एडिक्शन में तब्दील हो जाती है।"
IAMAI की Internet in India Report 2025 के अनुसार, भारत में एक्टिव इंटरनेट यूजर्स की संख्या 95.8 करोड़ तक पहुंच गई है। जोकि 2024 की तुलना में आठ गुना ज्यादा हैं। कुल इंटरनेट यूजर्स में से 57 प्रतिशत (54.8 करोड़) ग्रामीण क्षेत्रों से हैं। रिपोर्ट बताती है कि गांवों में इंटरनेट अपनाने की रफ्तार शहरों के मुकाबले चार गुना ज्यादा है। हालांकि रिपार्ट ये भी बताती है कि देश की 38% आबादी (करीब 57.9 करोड़ लोग) अभी भी इंटरनेट से दूर है, लेकिन ये अंतर भी कुछ ही साल में धीरे-धीरे कम हो जाएगा।
ऑनलाइन गेमिंग कब करती है मनोरंजन की हद पार
बच्चों की स्क्रीन टाइम को नियंत्रित करें<br>
- ऑनलाइन गेम खेलते समय हमारे दिमाग में डोपामिन नाम का एक रसायन निकलता है जो खुशी और सेटिसफैक्शन का एहसास कराता है। इसी वजह से बच्चे बार-बार गेम खेलने की इच्छा रखते हैं। धीरे-धीरे, दिमाग को इस तुरंत मिलने वाली खुशी की आदत पड़ जाती है।
- इसके बाद पढ़ाई, परिवार या सामाजिक गतिविधियाँ उन्हें उबाऊ लगने लगती हैं। यही स्थिति आगे चलकर गेमिंग एडिक्शन यानी गेमिंग की लत का रूप ले लेती है। इस सिचुएशन में अगर इन गेम्स को जब बच्चों से छीन लिया जाता है या किसी भी कारण से बच्चों को इन गेम्स से दूर जाना पड़े तो उनकी मानसिक हेल्थ बिगड़ जाती है, जिसकी शुरूआत डिप्रेशन से होती है और आत्महत्या तक भी जा सकती है।
ऑनलाइन गेमिंग और मानसिक समस्याओं के बीच गहरा संबंध
गेमिंग डिसऑर्डर को एक मानसिक स्वास्थ्य समस्या
Indian Journal of Social Psychiatryअध्ययन में यह बात सामने आई कि जो बच्चे ज्यादा देर तक ऑनलाइन गेम खेलते हैं, उनकी जीवनशैली बुरी तरह प्रभावित होती है। वे देर रात तक जागते हैं, समय पर खाना नहीं खाते और शारीरिक गतिविधियों से दूर हो जाते हैं। इससे न केवल उनका शारीरिक स्वास्थ्य कमजोर होता है, बल्कि मानसिक संतुलन भी बिगड़ने लगता है। उनकी सामाजिक जिंदगी सीमित हो जाती है और वे असल दुनिया से कटने लगते हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने भी इस समस्या को गंभीरता से लिया है और गेमिंग डिसऑर्डर को एक मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी स्थिति के रूप में मान्यता दी है। WHO के अनुसार, "जब कोई व्यक्ति गेमिंग पर नियंत्रण खो देता है और इसके कारण उसकी पढ़ाई, काम, रिश्ते और दैनिक जीवन प्रभावित होने लगते हैं, तो इसे गंभीर चेतावनी के रूप में देखा जाना चाहिए।" अगर यह स्थिति महीनों तक बनी रहे, तो विशेषज्ञ की मदद लेना बहुत जरूरी हो जाता है।
माता-पिता कैसे रखें बच्चों पर ध्यान
बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए माता-पिता की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण
1 - इस समस्या से निपटने में माता-पिता और शिक्षकों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। अक्सर माता-पिता बच्चों को शांत रखने या व्यस्त रखने के लिए उन्हें मोबाइल दे देते हैं, लेकिन बाद में यही आदत एक बड़ी समस्या बन जाती है। बच्चों के स्क्रीन टाइम (Screen Time) पर ध्यान देना, उनसे खुलकर बात करना और उनकी भावनाओं को समझना बहुत जरूरी है। सिर्फ डांटने या मोबाइल छीनने से यह समस्या हल नहीं होती।
2 - स्कूलों को भी इस मुद्दे पर गंभीरता दिखानी चाहिए। शिक्षकों को बच्चों के व्यवहार में आ रहे बदलावों को समझना चाहिए। अगर कोई बच्चा लगातार चुप रहने लगे, पढ़ाई में पिछड़ने लगे या गुस्सैल व्यवहार दिखाए, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। स्कूल काउंसलर (School Counselor) और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की मदद से समय रहते बच्चों को सही रास्ता दिखाया जा सकता है।
3- हालांकि, हर तरह की गेमिंग नुकसानदायक नहीं होती। सीमित और नियंत्रित समय तक गेम खेलना बच्चों के लिए मनोरंजन और सीखने का जरिया भी बन सकता है। कुछ गेम्स से समस्या-सुलझाने की क्षमता और टीमवर्क (Teamwork) जैसे कौशल विकसित होते हैं। समस्या तब शुरू होती है, जब संतुलन बिगड़ जाता है और गेमिंग ही जीवन का मुख्य हिस्सा बन जाती है।
4- बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए माता-पिता की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। उन्हें बच्चों से बिना किसी झिझक के बात करनी चाहिए, स्क्रीन टाइम की सीमा तय करनी चाहिए और शारीरिक गतिविधियों, शौक और परिवार के साथ समय बिताने को बढ़ावा देना चाहिए। अगर बच्चा परिवार से दूर होने लगे, चिड़चिड़ा हो जाए, नींद और पढ़ाई में कमी आए या जिन कामों में पहले मज़ा आता था, उनमें रुचि खो दे, तो यह खतरे की घंटी है।
5- ऐसी स्थिति में सिर्फ स्क्रीन टाइम कम करना काफी नहीं है। समय रहते किसी मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ, काउंसलर या चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट की मदद लेना ज़रूरी है। इससे बच्चे के लिए एक संतुलित दिनचर्या, भावनात्मक जुड़ाव और असली दुनिया में एक मज़बूत सपोर्ट सिस्टम फिर से तैयार किया जा सकता है।
ऑनलाइन गेमिंग अपने आप में बुरी नहीं है, लेकिन इसकी लत बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए खतरनाक साबित हो सकती है। डिप्रेशन, चिंता, नींद की समस्या और सामाजिक दूरी जैसे लक्षण इसके संकेत हैं। अगर माता-पिता, शिक्षक और समाज मिलकर बच्चों को संतुलित जीवनशैली की ओर ले जाने में मदद करें, तो इस खतरे से काफी हद तक बचा जा सकता है।