Rajasthan: रेगिस्तान में जल, जंगल, ज़मीन को बचाने की लड़ाई तेज, ‘ओरण’ में ज़मीन दर्ज़ कराने की उठी माँग

Gaon Connection | Feb 21, 2026, 17:52 IST
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जल, जंगल और ज़मीन के संरक्षण के लिए राजस्थान में लोगों का एक नया आंदोलन शुरू हुआ है। कई राज्यों के लोग 400 किलोमीटर की यात्रा कर चुके हैं। स्थानीय लोगों का डर है कि संरक्षित जमीनों पर प्राइवेट कंपनियाँ अधिग्रहण कर लेंगी। जैसलमेर और बाड़मेर के गाँव वाले लाखों बीघा भूमि को 'ओरण' के रूप में सरकारी दस्तावेज़ों में दर्ज कराने की माँग कर रहे हैं। जानिए क्यों उठ रही है पर्यावरण बचाने की माँग?
राजस्थान में जल, जंगल और ज़मीन को बचाने को लेकर आंदोलन तेज
राजस्थान में जल, जंगल और ज़मीन को बचाने को लेकर आंदोलन तेज
राजस्थान में जल, जंगल और ज़मीन को बचाने की लड़ाई एक बार फिर तेज हो गई है। पश्चिमी राजस्थान, खासकर जैसलमेर और बाड़मेर के गांवों में लोग लाखों बीघा ज़मीन को ‘ओरण’ के रूप में राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज कराने की माँग को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। ओरण न सिर्फ ग्राम्य संस्कृति और आस्था से जुड़ी भूमि है, बल्कि यह मरुस्थलीय पारिस्थितिकी, पशुधन और वन्यजीवों के संरक्षण का मजबूत आधार भी है। विकास के नाम पर इस जमीन को बंजर बताकर कंपनियों को सौंपे जाने के खिलाफ अब गाँव-गाँव से आवाज़ उठ रही है।

क्या है ओरण बचाओ आंदोलन

राजस्थान में जल, जंगल और ज़मीन को बचाने को लेकर आंदोलन तेज हो गया है। गाँवों के लोग लाखों बीघा ज़मीन को ‘ओरण’ में दर्ज़ कराने को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। ओरण बचाओ संघर्ष समिति के नेतृत्व में चल रहे इस आंदोलन में पर्यावरण प्रेमी, किसान और पशुपालक पैदल यात्रा कर प्रशासन तक अपनी माँग पहुँचा रहे हैं। समिति के नेता सुमेर सिंह सांवता का कहना है कि वर्षों के संघर्ष के बाद कुछ भूमि को ओरण के रूप में दर्ज किया गया, लेकिन अभी भी करीब 25 लाख बीघा ज़मीन को कानूनी संरक्षण की ज़रूरत है। यह आंदोलन न केवल गोड़ावण जैसे दुर्लभ जीवों और विदेशी पक्षियों के आवास को बचाने की लड़ाई है, बल्कि खेजड़ी जैसे राज्य वृक्ष और आने वाली पीढ़ियों के पर्यावरणीय भविष्य को सुरक्षित करने का प्रयास भी है, जिसमें महिलाओं की भागीदारी आंदोलन को नई ताकत दे रही है।

क्या है ओरण संस्कृति?

Oran Movement
Oran Movement
राजस्थान, खासकर पश्चिम राजस्थान के जैसलमेर और बाड़मेर में “ओरण” ग्राम्य संस्कृति की एक अत्यंत प्राचीन परंपरा है। यह किसी गाँव में समुदाय द्वारा पर्यावरण संरक्षण, पशुधन और आस्था के लिहाज से छोड़ी गई वह भूमि होती है, जिसे गाँव के लोग लोक देवताओं के नाम समर्पित कर देते हैं।

पर्यावरण प्रेमी और ओरण बचाओ संघर्ष समिति के नेतृत्वकर्ता सुमेर सिंह सांवता बताते हैं, "जैसलमेर के लोगों के 15 साल के संघर्ष के बाद सरकार ने तीन लाख बीघा भूमि राजस्व रिकॉर्ड के खसरे में ‘ओरण’ में दर्ज की है, हमारी माँग है कि जैसलमेर के विभिन्न गाँवों में फैली करीब 25 लाख बीघा भूमि को ओरण के नाम से दर्ज किया जाए, ताकि इस जमीन को कंपनियों के अधिग्रहण से बचाया जा सके।"

क्यों जरूरी है ओरण संरक्षण?

‘ओरण’ के नाम से दर्ज होने के बाद इस भूमि पर न तो खेती की जाती है और न ही किसी पेड़ को काटा जाता है। यह भूमि मरुस्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करती है। जैसलमेर, बाड़मेर के ओरण न सिर्फ मरुस्थलीय जीवों जैसे- गोड़ावण, तीतर, हिरण, सियार बल्कि विदेशी पक्षियों जैसे कोरसर, पेलिकन, सोशल लैपविंग, कुरजां आदि का भी ठिकाना हैं। पिछले कुछ वर्षों से विकास के नाम पर रेगिस्तान की इस जमीन को बंजर बताकर विभिन्न कंपनियों को दिया जा रहा है। कंपनियां यहां के पेड़ों और तालाबों को खत्म कर प्लांट स्थापित कर रही हैं।

जहाँ एक तरफ राजस्थान के राज्य वृक्ष खेजड़ी का अस्तित्व संकट में होने से बीकानेर की भूमि से ‘खेजड़ी बचाओ आंदोलन’ शुरू हो चुका है, वहीं, जैसलमेर से ‘ओरण बचाओ आंदोलन’ अपने चरम पर है। पर्यावरण के लिए खड़े हुए इस आंदोलन में महिलाओं की भूमिका भी उतनी ही है, जितनी पुरुषों की, जो हमें राजस्थान में पर्यावरण को बचाने के लिए महिलाओं का आगे आना अमृता देवी बिश्नोई की याद दिलाता है।

पर्यावरण को बचाने के लिए हो रही है पैदल यात्रा

ये पर्यावरण प्रेमी लोगों को जागरुक करने में लगे हैं। यात्रा में साथ चल रहे 35 साल के भोपाल सिंह ‘गांव कनेक्शन’ को बताते हैं, “हमने टीम के साथ 21 जनवरी को यह यात्रा प्रारंभ की थी। इस दौरान जगह-जगह सभाओं का आयोजन किया और रास्ते में आने वाले मुख्य प्रशासनिक अधिकारियों के कार्यालय में जाकर अपना मांग पत्र दिया। हमने अब तक 400 किलोमीटर की यात्रा कर ली है।” करीब एक महीने से पैदल चल रही इस ओरण टीम में पर्यावरण प्रेमी और जैसलमेर के विभिन्न गांवों से आने वाले पशुपालक व किसान शामिल हैं।

हालांकि इस यात्रा को कई राजनीतिक पार्टियों और नेताओं का समर्थन भी मिल रहा है, लेकिन प्रत्यक्ष तौर पर कोई भी राजनेता इस यात्रा में पैदल नहीं चल रहा है। इन पर्यावरण प्रेमियों की मांग है कि ओरण को राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज किया जाए और जैसलमेर में विकास के नाम पर पेड़ों की आहुति देना बंद किया जाए।

नोट: ये ख़बर गाँव कनेक्शन के फ्रीलांसर कुलदीप छंगाणी द्वारा भेजी गई है।
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