Gaon Se: उत्तराखंड की पहचान बना रिंगाल बाँस, परंपरा को नई पहचान दे रहे रुद्रप्रयाग के कारीगर
Gaon Connection | Mar 13, 2026, 17:59 IST
उत्तराखंड के पहाड़ों में रिंगाल बाँस सिर्फ एक पौधा नहीं, बल्कि लोगों की आजीविका और संस्कृति का अहम हिस्सा है। पहले जहाँ इससे केवल टोकरी, चटाइयाँ और घरेलू उपयोग की चीजें बनाई जाती थीं, वहीं अब पहाड़ के कारीगर इसे नए डिज़ाइन और आधुनिक रूप देकर बाजार तक पहुँचाने की कोशिश कर रहे हैं।
उत्तराखंड के पहाड़ों में जीविका के लिए इस्तेमाल होता है रिंगाल बांस।
उत्तराखंड के पहाड़ों में सदियों से रिंगाल बांस सिर्फ एक पौधा नहीं, बल्कि लोगों की आजीविका और संस्कृति का अहम हिस्सा रहा है। पहले जहाँ इससे केवल टोकरी, चटाइयाँ और घरेलू उपयोग की चीजें बनाई जाती थीं, वहीं अब पहाड़ के कारीगर इसे नए डिज़ाइन और आधुनिक रूप देकर बाजार तक पहुँचाने की कोशिश कर रहे हैं। रिंगाल न सिर्फ पहाड़ की पहचान है बल्कि वहाँ के लोगों के लिए अपनी परंपरा और हुनर को जीवित रखने का जरिया भी है।
रुद्रप्रयाग की ठंडी सुबह में जब सूरज की पहली किरणें बर्फ से ढकी पहाड़ियों को छूती हैं, तो उनकी रोशनी धीरे-धीरे नीचे उतरती हुई बाँस की झाड़ियों और पत्तों पर चमकने लगती है। हवा में फैलती सरसराहट जैसे किसी कहानी की शुरुआत हो। यही रिंगाल की सरसराहट है, जिससे पहाड़ के कारीगर अपनी जिंदगी और परंपरा को बुनते हैं। उन्हीं कारीगरों में से एक हैं दीपक लाल, जो पिछले कई सालों से इस कला को आगे बढ़ा रहे हैं।
दीपक लाल बताते हैं कि उन्होंने यह काम अपने आसपास के बुजुर्गों और परिवार के लोगों को देखकर सीखा। बचपन से ही वे अपने पिता को रिंगाल की बुनाई करते देखते थे। स्कूल से लौटकर घंटों बैठकर यह देखते रहते कि कैसे एक साधारण बाँस की लकड़ी उनके पिता के हाथों में आकार लेकर सुंदर टोकरी बन जाती है। करीब 18 साल की उम्र से उन्होंने खुद भी इस काम को शुरू कर दिया और आज तक इसे जारी रखा है।
समय के साथ दीपक ने इस पारंपरिक कला में कुछ नए प्रयोग भी किए हैं। पहले जहाँ केवल टोकरी या घरेलू सामान बनाए जाते थे, वहीं अब वे रिंगाल से ट्रे, सजावटी टोकरियाँ, लैंप, मंदिर और कई तरह की फैंसी चीजें भी बना रहे हैं। उनका कहना है कि अगर इस काम में आधुनिक औजार और थोड़ा तकनीकी सहयोग मिल जाए, तो जो काम पहले पाँच दिन में होता था, वह एक दिन में हो सकता है और कारीगरों की आय भी बढ़ सकती है।
रिंगाल बांस की खासियत यह है कि यह पतला, लचीला और ठंडे मौसम में पनपने वाला पौधा है। इसे जंगल से लाना, छाल उतारना, सुखाना और फिर बुनाई के लिए तैयार करना काफी मेहनत का काम होता है। लेकिन इसकी एक खास बात यह भी है कि इसे काटने के बाद भी पौधा फिर से उग आता है और दोबारा इस्तेमाल के लिए तैयार हो जाता है।
पहाड़ों में पहले रिंगाल से बनी चीजें मुख्य रूप से घरेलू उपयोग के लिए होती थीं। अनाज रखने, सब्जियाँ ढोने या पशुओं के लिए चारा ले जाने में इनका इस्तेमाल किया जाता था। लेकिन जब इन हस्तशिल्प वस्तुओं की माँग बाजार में बढ़ी, तो कारीगरों को एहसास हुआ कि यह सिर्फ जरूरत की चीज नहीं, बल्कि एक कला भी है जो लोगों को आकर्षित कर सकती है।
हालांकि इस परंपरा को बचाए रखना आसान नहीं है। जंगलों में रिंगाल पहले की तुलना में कम मिलता है, बाजार में प्लास्टिक की सस्ती चीजों ने जगह बना ली है और नई पीढ़ी इस मेहनत भरे काम में ज्यादा रुचि नहीं दिखाती। इसके बावजूद दीपक लाल जैसे कारीगर इस कला को जिंदा रखने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं।
जब किसी के हाथ में रिंगाल की बनी टोकरी आती है, तो उसकी बुनाई में सिर्फ धागे या बांस की पट्टियां नहीं होतीं, बल्कि उसमें पहाड़ की मेहनत, परंपरा और जीवन की कहानी भी छिपी होती है। यह कहानी सिर्फ एक कारीगर की नहीं, बल्कि पूरे पहाड़ की है, जो अपने हुनर और अपनी सांस्कृतिक पहचान को संभालकर आगे बढ़ रहा है।
पहाड़ हमें सिखाते हैं कि सादगी में भी गहरा सौंदर्य छिपा होता है। और रिंगाल की नरम बुनाई में वही मजबूत डोर दिखाई देती है, जो परंपरा, मेहनत और उम्मीद को पीढ़ी दर पीढ़ी जोड़कर रखती है।
रिंगाल बाँस की बुनाई
पहाड़ी मेहनत और परंपरा का मेल है रिंगाल कला
रूद्रप्रयाग, उत्तराखंड
बुजुर्गों से सीखी कला
रिंगाल कारीगर, दीपक लाल
पारंपरिक कला के सथ हुए नए प्रयोग
रिंगाल से बन रहे हैं कई सजावटी सामान
क्या है रिंगाल की खासियत?
कभी न खत्म होने वाला रिंगाल बाँस
पहाड़ों में पहले रिंगाल से बनी चीजें मुख्य रूप से घरेलू उपयोग के लिए होती थीं। अनाज रखने, सब्जियाँ ढोने या पशुओं के लिए चारा ले जाने में इनका इस्तेमाल किया जाता था। लेकिन जब इन हस्तशिल्प वस्तुओं की माँग बाजार में बढ़ी, तो कारीगरों को एहसास हुआ कि यह सिर्फ जरूरत की चीज नहीं, बल्कि एक कला भी है जो लोगों को आकर्षित कर सकती है।
कला को जिंदा रखने के लिए लगातार प्रयास हो
प्लास्टिक के दौर में रिंगाल अभी भी जिंदा
जब किसी के हाथ में रिंगाल की बनी टोकरी आती है, तो उसकी बुनाई में सिर्फ धागे या बांस की पट्टियां नहीं होतीं, बल्कि उसमें पहाड़ की मेहनत, परंपरा और जीवन की कहानी भी छिपी होती है। यह कहानी सिर्फ एक कारीगर की नहीं, बल्कि पूरे पहाड़ की है, जो अपने हुनर और अपनी सांस्कृतिक पहचान को संभालकर आगे बढ़ रहा है।
पहाड़ हमें सिखाते हैं कि सादगी में भी गहरा सौंदर्य छिपा होता है। और रिंगाल की नरम बुनाई में वही मजबूत डोर दिखाई देती है, जो परंपरा, मेहनत और उम्मीद को पीढ़ी दर पीढ़ी जोड़कर रखती है।