CSIR Bio-Bitumen Technology: वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। सीएसआईआर-केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान (सीएसआईआर-सीआरआरआई) और सीएसआईआर-भारतीय पेट्रोलियम संस्थान (सीएसआईआर-आईआईपी) ने मिलकर कृषि अवशेषों से बायो-बिटुमेन बनाने की एक नई तकनीक विकसित की है। इस तकनीक से अब पराली जैसे कृषि कचरे का इस्तेमाल सड़कों के निर्माण में किया जाएगा। यह तकनीक न केवल किसानों को अतिरिक्त आय का जरिया देगी, बल्कि पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण को भी कम करेगी।
किसानों के लिए नई उम्मीद और पर्यावरण की सुरक्षा
![कृषि अवशेष से सड़कों तक" के लिए एक प्रौद्योगिकी हस्तांतरण कार्यक्रम का आयोजन]()
कृषि अवशेष से सड़कों तक" के लिए एक प्रौद्योगिकी हस्तांतरण कार्यक्रम का आयोजन
केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने इस बायो-बिटुमेन तकनीक को "ऐतिहासिक और परिवर्तनकारी कदम" बताया। उन्होंने कहा कि यह तकनीक भारत की जलवायु प्रतिबद्धताओं, नेट ज़ीरो लक्ष्यों और आत्मनिर्भर भारत जैसी पहलों के अनुरूप है। श्री चौहान ने इस बात पर जोर दिया कि उच्च मूल्य वाली अवसंरचना परियोजनाओं में कृषि अवशेषों का उपयोग किसानों के लिए आय के नए अवसर खोलेगा। साथ ही, यह पराली जलाने की समस्या को भी कम करेगा, जिससे पर्यावरण को काफी राहत मिलेगी।
बायो-बिटुमेन तकनीक कैसे काम करती है?
- बायो-बिटुमेन तकनीक एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें कृषि अवशेषों (जैसे पराली, भूसा, लकड़ी के टुकड़े आदि) को उपयोग करके सड़क निर्माण के लिए पारंपरिक बिटुमेन का विकल्प तैयार किया जाता है। यह पूरी प्रक्रिया वैज्ञानिक और पर्यावरण अनुकूल होती है।
- सबसे पहले, खेतों से निकलने वाले कृषि कचरे को इकट्ठा किया जाता है। इसके बाद इस बायोमास को एक विशेष ऊष्मा-रासायनिक (थर्मो-केमिकल) प्रक्रिया से गुजारा जाता है, जिसमें इसे उच्च तापमान पर बिना ऑक्सीजन या बहुत कम ऑक्सीजन में गर्म किया जाता है। इस प्रक्रिया से बायो-ऑयल, गैस और ठोस अवशेष निकलते हैं।
- फिर इस बायो-ऑयल को और शुद्ध (रिफाइन) किया जाता है, ताकि उसमें चिपचिपाहट (viscosity) और मजबूती जैसे गुण विकसित हो सकें। इसके बाद इसे इस तरह तैयार किया जाता है कि यह सड़क बनाने में इस्तेमाल होने वाले पारंपरिक बिटुमेन जैसा काम कर सके।
- अंत में, इस तैयार बायो-बिटुमेन को सड़कों के निर्माण और मरम्मत में इस्तेमाल किया जाता है। यह न केवल पर्यावरण के लिए बेहतर है, बल्कि इससे पराली जलाने की समस्या कम होती है और किसानों को अतिरिक्त आय का स्रोत भी मिल सकता है।
आत्मनिर्भरता और स्वच्छ ऊर्जा की ओर एक कदम
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने इस पहल को भारत की आत्मनिर्भरता और स्वच्छ ऊर्जा की ओर एक महत्वपूर्ण कदम बताया। उन्होंने कहा कि यह तकनीक "अपशिष्ट से धन" के सिद्धांत को दर्शाती है। डॉ. सिंह ने यह भी बताया कि यह पहल कृषि, विज्ञान और प्रौद्योगिकी और अवसंरचना विकास जैसे कई क्षेत्रों के बीच बेहतर तालमेल का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। इसे मजबूत सार्वजनिक-निजी भागीदारी का भी समर्थन प्राप्त है। उन्होंने विश्वास जताया कि यह बायो-बिटुमेन तकनीक राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल के लिए उपयुक्त है, क्योंकि यह टिकाऊ है, पारंपरिक बिटुमेन के साथ संगत है और कार्बन उत्सर्जन को कम करती है।
पेट्रोलियम पर निर्भरता कम करने में सहायक
सीएसआईआर की महानिदेशक डॉ. एन. कलैसेल्वी ने कहा कि यह तकनीक पेट्रोलियम आधारित सामग्री से जैव आधारित सामग्री की ओर एक बड़ा कदम है। यह कई वर्षों के शोध का परिणाम है और इसमें कृषि अवशेषों व जैव-द्रव्यमान का उपयोग किया जाता है। एक खास प्रक्रिया के जरिए इन्हें कच्चे माल में बदला जाता है, जिससे पेट्रोलियम बिटुमेन का पर्यावरण अनुकूल विकल्प तैयार होता है। यह तकनीक अब सड़क निर्माण में उपयोग के लिए तैयार है और इसे सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय द्वारा अपनाया जा सकता है।
दोहरी राष्ट्रीय चुनौतियों का समाधान
यह नई तकनीक कृषि अवशेषों से बायो-बिटुमेन बनाना संभव बनाती है, जो पारंपरिक बिटुमेन का सस्ता, नवीकरणीय और कम प्रदूषण वाला विकल्प है। इससे खेतों में जलाए जाने वाले कचरे से होने वाले प्रदूषण को कम करने और आयातित बिटुमेन पर निर्भरता घटाने में मदद मिलेगी। इस कार्यक्रम में कृषि मंत्रालय, सड़क परिवहन मंत्रालय, सीएसआईआर के वैज्ञानिकों, उद्योग विशेषज्ञों, किसानों और नीति निर्माताओं ने भाग लिया। यह उपलब्धि प्रयोगशाला के शोध को जमीन पर उपयोग होने वाली तकनीक में बदलने की दिशा में एक बड़ा कदम है।