अगर नुकसान से बचना है तो अगले कुछ दिनों में ये ज़रूरी काम निपटा लें किसान

Gaon Connection | Jan 23, 2026, 11:40 IST
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बदलते मौसम को देखते हुए उत्तर प्रदेश कृषि अनुसंधान परिषद (उपकार) ने किसानों के लिए अगले दो सप्ताह की खेती से जुड़ी अहम सलाह जारी की है।

<p>आलू में एफिड (माहू) कीट की रोकथाम करें।<br></p>

इस बार जनवरी महीने में कड़ाके की ठंड पड़ रही है, जिसका रबी फसलों पर असर पड़ रहा है। ऐसे में उत्तर प्रदेश कृषि अनुसंधान परिषद (उपकार) ने मौसम को देखते हुए किसानों के लिए अगले दो सप्ताह की खेती से जुड़ी सलाह भी जारी की गई है।



जिन क्षेत्रों में वर्षा की संभावना नहीं है उन क्षेत्रों में कृषक गेहूं की फसल की निगरानी करते हुए ज़रूरत के हिसाब से खेतों में पर्याप्त नमी बनाये रखें।



गेहूं में संकरी और चौड़ी पत्ती दोनों प्रकार के खरपतवारों के एक साथ नियंत्रण के लिए पिनोक्साडेन (एक्सिल 5 ई.सी.) 1.0 लीकाफर्न्ट्राजोन (एफीनीटि) 50 ग्रा. को 500 ली. पानी में घोलकर या सल्फोसल्फ्यूरान 75 प्रतिशत मेटासल्फ्यूरॉन मेथाइल 20 प्रतिशत डब्लू.जी. 20 ग्राम 1250 मिली. सर्फेक्टेंट प्रति हे. या मेट्रीब्यूजिन 70 प्रतिशत डब्लू.पी. की 250 से 300 ग्राम मात्रा को 500 से 600 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से फ्लैटफैननॉजिल से प्रथम सिंचाई के बाद 25 से 30 दिन की अवस्था पर छिड़काव करें।



रासायनिक कीटनाशकों का प्रयोग ज़रूरी हो तो आने वाले 48 घंटों के बाद ही कृषि विज्ञान केन्द्रों, कृषि विश्वविद्यालयों के वैज्ञानिकों या कृषि विभाग के अधिकारियों की सलाह अनुसार करें।



जिन खेतों में माहू दिखाई दे रहे है उनके नियंत्रण के लिए कृषक यलो स्टिकी ट्रैप को खेत में लगायें।



चने की फसल में एक सिंचाई फूल आने से पहले करनी चाहिये। फूल आते समय सिंचाई बिल्कुल न करें।



चने में फलीबेधक कीट के नियंत्रण के लिए एनपीवी 2 प्रतिशत ए.एस. 200 से 250 एलई/हेक्टेयर की दर से लगभग 250 से 300 लीटर पानी में घोलकर प्रयोग करने से इसका प्रभावी नियंत्रण किया जा सकता है। 2 छोटी अथवा 1 बड़ी सूड़ी प्रति 10 पौधा मिलने पर इसका रासायनिक नियंत्रण करें। इस के लिए एथियन 50 प्रतिशत ई.सी. की 1.2 ली. मात्रा प्रति हेक्टेयर अथवा फ्लूबेडामाइड 39.35 प्रतिशत एससी. की 100 मिली. मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से 500 से 600 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।



मटर में फूल आने के समय ज़रूरी सिंचाई करें और पत्तियों, फलियों और तनों पर सफेद चूर्ण की तरह फैले बुकनी रोग (पाउडरी मिल्डयू) की रोकथाम के लिये घुलनशील गंधक 80 प्रतिशत 2 किग्रा. अथवा ट्राईडेमोफॉन 25 प्रतिशत डबलूपी. 250 ग्राम/हेक्टेयर लगभग 500-600 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।



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सब्जी मटर की फसल में वातारण में नमी व कोहरे के कारण डाउनी मिल्ड्यू व पाउडरी मिल्ड्यू का प्रकोप होने की सम्भावना रहती है तो प्रकोप की दशा में 25 से 30 किग्रा प्रति हेक्टेयर की दर से गंधक के चूर्ण का छिड़काव करें



बसन्तकालीन गन्ने की बुवाई के लिए नवीन उन्नत किस्मों यथा कोशा.-13235, कोलख.-14201, को.-15023, कोशा.-17231, कोशा.-18231, कोलख.-16202, को. शा.-14233 आदि की बुवाई के लिए बीज की व्यवस्था करें ताकि समय से बुवाई की जा सकें। लालसड़न रोग से संक्रमित किस्म को.-0238 की बुवाई न करें और पेड़ी भी न लें। ऐसे खेतों में दोबारा गन्ने की बुवाई न करें।



सिंगल बड/एस.टी.पी. विधि से नर्सरी 25 जनवरी से तैयार करें। चीनी मिल में आपूर्ति किये जा रहे गन्ने की कटाई के बाद पेड़ी प्रबंधन ज़रूर करें। जिन खेतों में जड़बेधक व प्ररोहबेधक कीट दिखाई दें उनमें संस्तुति अनुसार क्लोरपाईरीफॉस का प्रयोग करें।



आलू में एफिड (माहू) कीट की रोकथाम के लिए नीम सीड कर्नेल स्ट्रैक्ट 5.0 ग्राम प्रति लीटर या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 प्रतिशत एसएल 0.5 मिली0/लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें और आवश्यकतानुसार 8-10 दिन बाद दूसरा छिड़काव करें।



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जनवरी माह में आम की पुरानी अनत्पादक बागों पर पुनरोद्धार तकनीक से घनी शाखाओं की छटाई करें और छटाई वाले भाग पर कॉपर ऑक्सीक्लोराइड का लेप लगायें।



आम के अगेती बौर को खर्रा या दहिया रोग से बचाने के लिए घुलनशील गंधक के 0.2 प्रतिशत घोल (2.0 ग्राम प्रति लीटर पानी) का प्रथम छिड़काव करें।



केले की फसल में माहू की रोकथाम के लिए इमिडाक्लोप्रिड 17.8 प्रतिशत एसएल 0.5 मिली0 रसायन को प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें और ज़रूरत के हिसाब से 8-10 दिन बाद दूसरा छिड़काव करें।



किसानों को सलाह दी जाती है कि वे स्थानीय पशु चिकित्सक से सलाह लेकर अंतपरजीवी दवाओं का प्रयोग करें।



राष्ट्रीय पशुरोग नियंत्रण कार्यक्रम के अन्तर्गत पशुओं में एफएमडी का टीकाकरण 22.01.2026 से प्रत्येक जनपद के समस्त पशु चिकित्सालयों के माध्यम से टीकाकरण कार्यकर्ताओं द्वारा मुफ्त कराया जाना प्रस्तावित है, जिसका लाभ कृषक/पशुपालक अपने जनपदीय मुख्य पशुचिकित्सा अधिकारी या निकटस्थ पशुचिकित्सा अधिकारी से संपर्क कर उठा सकते हैं।



पौधशाला में पौध उगान के लिए शीशम, सागौन, खैर, यूकोलिप्टस, आंवला, हरड़, बहेड़ा, गुलमोहर, कदम, बबूल आदि का बीज इकट्ठा किया जाय। वृक्षारोपण के लिए जगह का चयन कर लें और अग्रिम मृदा काम के लिए कार्यवाही कर ली जाये। इस सम्बन्ध में तकनीकी मापदण्ड/प्रजाति चयन के सम्बन्ध में जानकारी वन विभाग के निकटतम रेंज कार्यालय/ग्रीन चौपाल से प्राप्त की जा सकती है।



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