पहाड़ों के भीतर छिपा सच: पानी कैसे तय करता है चट्टानों की उम्र
Gaon Connection | Jan 08, 2026, 16:26 IST
गढ़वाल हिमालय में किए गए एक नए वैज्ञानिक अध्ययन से पता चला है कि पानी की उपलब्धता और सूक्ष्म जीव चट्टानों के टूटने की गति को कैसे प्रभावित करते हैं। शोध बताता है कि नम लघु हिमालय में चट्टानें शुष्क उच्च हिमालय की तुलना में कई गुना तेज़ी से टूटती हैं। यह प्रक्रिया न सिर्फ़ मिट्टी और नदियों को आकार देती है, बल्कि जलवायु संतुलन में भी अहम भूमिका निभाती है।
हिमालय को आम तौर पर हम मज़बूत, अडिग और हज़ारों साल से वैसे ही खड़े पहाड़ों के रूप में देखते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि हिमालय की चट्टानें हर दिन, हर पल एक धीमी लेकिन लगातार चलने वाली प्रक्रिया से गुजर रही हैं। इस प्रक्रिया को अपक्षय कहा जाता है, यानी चट्टानों का धीरे-धीरे टूटना, घुलना और मिट्टी में बदलना। यही प्रक्रिया नदियों को मिट्टी और खनिज देती है, खेती के लिए ज़मीन तैयार करती है और लंबे समय में धरती की जलवायु को भी संतुलित रखने में मदद करती है।
गढ़वाल हिमालय में किए गए एक नए वैज्ञानिक अध्ययन ने इसी प्रक्रिया को गहराई से समझने की कोशिश की है और यह बताया है कि पानी की उपलब्धता और सूक्ष्म जीव, यानी बैक्टीरिया, चट्टानों के टूटने में कितनी बड़ी भूमिका निभाते हैं।
इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने हिमालय के दो अलग-अलग हिस्सों में एक ही तरह की ग्रेनाइट चट्टानों का अध्ययन किया। एक इलाका लघु हिमालय का है, जहाँ मानसून की बारिश अच्छी होती है और वातावरण ज़्यादा नम रहता है। दूसरा इलाका उच्च हिमालय का है, जहाँ बारिश कम होती है और मौसम अपेक्षाकृत सूखा और ठंडा रहता है। चट्टान दोनों जगह एक जैसी है, लेकिन मौसम और पानी की मात्रा अलग होने के कारण अपक्षय की रफ्तार में बड़ा फर्क देखने को मिला। शोध से पता चला कि जहाँ पानी ज़्यादा है, यानी लघु हिमालय में, वहाँ चट्टानें उच्च हिमालय की तुलना में लगभग तीन से चार गुना तेज़ी से टूटती हैं। इसका मतलब यह है कि पानी चट्टानों के टूटने की प्रक्रिया को बहुत तेज़ कर देता है।
लघु हिमालय में ज़्यादा बारिश के कारण पानी चट्टानों की दरारों में आसानी से घुस जाता है। यह पानी खनिजों के साथ रासायनिक प्रतिक्रिया करता है, जिससे सोडियम, कैल्शियम और पोटैशियम जैसे तत्व चट्टानों से बाहर निकलकर मिट्टी और नदियों में पहुँच जाते हैं। इसी वजह से वहाँ मिट्टी बनने की प्रक्रिया तेज़ होती है और नदियों में पोषक तत्वों का प्रवाह भी ज़्यादा होता है। इसके उलट, उच्च हिमालय में पानी कम होने के कारण चट्टानों का अपक्षय धीमी गति से होता है। वहाँ अपक्षय की परत भी पतली पाई गई और मिट्टी ज़्यादा समय तक टिक नहीं पाती।
इस अध्ययन की एक खास बात यह है कि वैज्ञानिकों ने चट्टानों की “उम्र” और अपक्षय की गति जानने के लिए यू-सीरीज़ आइसोटोप नाम की एक आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया। इस तकनीक से यह पता चलता है कि किसी चट्टान में अपक्षय कब शुरू हुआ और वह कितने समय से टूट रही है। नतीजों से पता चला कि लघु हिमालय में चट्टानों का अपक्षय लगभग डेढ़ लाख साल से चल रहा है, जबकि उच्च हिमालय में यह समय करीब साठ हज़ार साल के आसपास है। इसका साफ़ मतलब है कि शुष्क इलाकों में मिट्टी और अपक्षय की परत ज़्यादा समय तक बनी नहीं रह पाती, क्योंकि वहाँ पानी की कमी रहती है।
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इस शोध का सबसे रोचक पहलू यह है कि इसमें सूक्ष्म जीवों, यानी बैक्टीरिया की भूमिका को भी सामने लाया गया है। आम तौर पर हम सोचते हैं कि चट्टानें सिर्फ़ पानी और हवा से टूटती हैं, लेकिन इस अध्ययन से पता चला कि बैक्टीरिया भी इस प्रक्रिया में सक्रिय भागीदार हैं। कम टूटी हुई, नई चट्टानों में बैक्टीरिया सीधे खनिजों को तोड़कर उनसे पोषक तत्व निकालते हैं। वहीं ज़्यादा पुरानी और पोषक तत्वों से गरीब मिट्टी में ये सूक्ष्म जीव जैविक अम्ल बनाते हैं, जिससे पोटैशियम जैसे ज़रूरी तत्व पौधों के लिए उपलब्ध हो सकें। इस तरह ये बैक्टीरिया मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं।
इतना ही नहीं, अध्ययन में यह भी सामने आया है कि ये सूक्ष्म जीव मिट्टी में मौजूद कार्बन डाइऑक्साइड को पकड़कर उसे दूसरे रासायनिक रूपों में बदलने में मदद करते हैं। यह प्रक्रिया जलवायु के लिहाज़ से बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे वातावरण में मौजूद कार्बन को संतुलित करने में मदद मिलती है। यानी चट्टानों का अपक्षय और सूक्ष्म जीवों की गतिविधि मिलकर जलवायु संतुलन में भी योगदान देती है।
आज के समय में, जब जलवायु परिवर्तन के कारण बारिश का पैटर्न बदल रहा है और कहीं ज़्यादा बारिश तो कहीं ज़्यादा सूखा देखने को मिल रहा है, ऐसे अध्ययन और भी ज़रूरी हो जाते हैं। हिमालय हमारी नदियों का स्रोत है, खेती और पीने के पानी का आधार है और करोड़ों लोगों की ज़िंदगी इससे जुड़ी हुई है। अगर भविष्य में बारिश कम हुई या ज़्यादा अनियमित हुई, तो मिट्टी बनने की प्रक्रिया, नदियों में पोषक तत्वों का प्रवाह और प्राकृतिक रूप से कार्बन को पकड़ने की क्षमता—all कुछ प्रभावित हो सकता है।
कुल मिलाकर यह अध्ययन बताता है कि हिमालय सिर्फ़ पत्थरों और बर्फ़ का ढेर नहीं है, बल्कि एक जीवित और सक्रिय प्रणाली है। यहाँ पानी, चट्टान और सूक्ष्म जीव मिलकर लगातार काम कर रहे हैं और तय कर रहे हैं कि मिट्टी कैसी बनेगी, नदियाँ कैसी होंगी और जलवायु कैसे बदलेगी। बाहर से धीमी दिखने वाली यह प्रक्रिया असल में हमारे पर्यावरण और भविष्य से गहराई से जुड़ी हुई है।
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गढ़वाल हिमालय में किए गए एक नए वैज्ञानिक अध्ययन ने इसी प्रक्रिया को गहराई से समझने की कोशिश की है और यह बताया है कि पानी की उपलब्धता और सूक्ष्म जीव, यानी बैक्टीरिया, चट्टानों के टूटने में कितनी बड़ी भूमिका निभाते हैं।
इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने हिमालय के दो अलग-अलग हिस्सों में एक ही तरह की ग्रेनाइट चट्टानों का अध्ययन किया। एक इलाका लघु हिमालय का है, जहाँ मानसून की बारिश अच्छी होती है और वातावरण ज़्यादा नम रहता है। दूसरा इलाका उच्च हिमालय का है, जहाँ बारिश कम होती है और मौसम अपेक्षाकृत सूखा और ठंडा रहता है। चट्टान दोनों जगह एक जैसी है, लेकिन मौसम और पानी की मात्रा अलग होने के कारण अपक्षय की रफ्तार में बड़ा फर्क देखने को मिला। शोध से पता चला कि जहाँ पानी ज़्यादा है, यानी लघु हिमालय में, वहाँ चट्टानें उच्च हिमालय की तुलना में लगभग तीन से चार गुना तेज़ी से टूटती हैं। इसका मतलब यह है कि पानी चट्टानों के टूटने की प्रक्रिया को बहुत तेज़ कर देता है।
पहाड़ों के भीतर छिपा सच: पानी कैसे तय करता है चट्टानों की उम्र
लघु हिमालय में ज़्यादा बारिश के कारण पानी चट्टानों की दरारों में आसानी से घुस जाता है। यह पानी खनिजों के साथ रासायनिक प्रतिक्रिया करता है, जिससे सोडियम, कैल्शियम और पोटैशियम जैसे तत्व चट्टानों से बाहर निकलकर मिट्टी और नदियों में पहुँच जाते हैं। इसी वजह से वहाँ मिट्टी बनने की प्रक्रिया तेज़ होती है और नदियों में पोषक तत्वों का प्रवाह भी ज़्यादा होता है। इसके उलट, उच्च हिमालय में पानी कम होने के कारण चट्टानों का अपक्षय धीमी गति से होता है। वहाँ अपक्षय की परत भी पतली पाई गई और मिट्टी ज़्यादा समय तक टिक नहीं पाती।
इस अध्ययन की एक खास बात यह है कि वैज्ञानिकों ने चट्टानों की “उम्र” और अपक्षय की गति जानने के लिए यू-सीरीज़ आइसोटोप नाम की एक आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया। इस तकनीक से यह पता चलता है कि किसी चट्टान में अपक्षय कब शुरू हुआ और वह कितने समय से टूट रही है। नतीजों से पता चला कि लघु हिमालय में चट्टानों का अपक्षय लगभग डेढ़ लाख साल से चल रहा है, जबकि उच्च हिमालय में यह समय करीब साठ हज़ार साल के आसपास है। इसका साफ़ मतलब है कि शुष्क इलाकों में मिट्टी और अपक्षय की परत ज़्यादा समय तक बनी नहीं रह पाती, क्योंकि वहाँ पानी की कमी रहती है।
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इस शोध का सबसे रोचक पहलू यह है कि इसमें सूक्ष्म जीवों, यानी बैक्टीरिया की भूमिका को भी सामने लाया गया है। आम तौर पर हम सोचते हैं कि चट्टानें सिर्फ़ पानी और हवा से टूटती हैं, लेकिन इस अध्ययन से पता चला कि बैक्टीरिया भी इस प्रक्रिया में सक्रिय भागीदार हैं। कम टूटी हुई, नई चट्टानों में बैक्टीरिया सीधे खनिजों को तोड़कर उनसे पोषक तत्व निकालते हैं। वहीं ज़्यादा पुरानी और पोषक तत्वों से गरीब मिट्टी में ये सूक्ष्म जीव जैविक अम्ल बनाते हैं, जिससे पोटैशियम जैसे ज़रूरी तत्व पौधों के लिए उपलब्ध हो सकें। इस तरह ये बैक्टीरिया मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं।
हिमालय सिर्फ़ पहाड़ नहीं: चट्टानों, पानी और जलवायु की गहरी कहानी
इतना ही नहीं, अध्ययन में यह भी सामने आया है कि ये सूक्ष्म जीव मिट्टी में मौजूद कार्बन डाइऑक्साइड को पकड़कर उसे दूसरे रासायनिक रूपों में बदलने में मदद करते हैं। यह प्रक्रिया जलवायु के लिहाज़ से बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे वातावरण में मौजूद कार्बन को संतुलित करने में मदद मिलती है। यानी चट्टानों का अपक्षय और सूक्ष्म जीवों की गतिविधि मिलकर जलवायु संतुलन में भी योगदान देती है।
आज के समय में, जब जलवायु परिवर्तन के कारण बारिश का पैटर्न बदल रहा है और कहीं ज़्यादा बारिश तो कहीं ज़्यादा सूखा देखने को मिल रहा है, ऐसे अध्ययन और भी ज़रूरी हो जाते हैं। हिमालय हमारी नदियों का स्रोत है, खेती और पीने के पानी का आधार है और करोड़ों लोगों की ज़िंदगी इससे जुड़ी हुई है। अगर भविष्य में बारिश कम हुई या ज़्यादा अनियमित हुई, तो मिट्टी बनने की प्रक्रिया, नदियों में पोषक तत्वों का प्रवाह और प्राकृतिक रूप से कार्बन को पकड़ने की क्षमता—all कुछ प्रभावित हो सकता है।
कुल मिलाकर यह अध्ययन बताता है कि हिमालय सिर्फ़ पत्थरों और बर्फ़ का ढेर नहीं है, बल्कि एक जीवित और सक्रिय प्रणाली है। यहाँ पानी, चट्टान और सूक्ष्म जीव मिलकर लगातार काम कर रहे हैं और तय कर रहे हैं कि मिट्टी कैसी बनेगी, नदियाँ कैसी होंगी और जलवायु कैसे बदलेगी। बाहर से धीमी दिखने वाली यह प्रक्रिया असल में हमारे पर्यावरण और भविष्य से गहराई से जुड़ी हुई है।
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