600 रुपये तक महंगी हुई चीनी! निर्यात, एथेनॉल और घटते स्टॉक ने बढ़ाई चिंता, जानिए क्या बोले चीनी उद्योग संगठन
Jul 18, 2026, 17:58 IST
देश में चीनी की कीमतों में जुलाई के दौरान करीब 600 रुपये प्रति क्विंटल तक की बढ़ोतरी हुई है। उत्पादन घटने, कमज़ोर गन्ना फसल, निर्यात और एथेनॉल डायवर्जन से स्टॉक पर दबाव बना है। चालू सीज़न के अंत में शुरुआती स्टॉक 33–35 लाख टन तक सिमट सकता है। हालांकि ISMA और NFCSF का कहना है कि फिलहाल देश में पर्याप्त चीनी उपलब्ध है और जमाखोरी या घबराकर खरीदारी की आवश्यकता नहीं है। उद्योग ने समय से पेराई शुरू कर आपूर्ति बनाए रखने का भरोसा दिया है।
स्टॉक कई साल के निचले स्तर पर पहुँचने की आशंका!
देश में चीनी की कीमतों में लगातार आ रही तेजी ने बाज़ार और उपभोक्ताओं दोनों की चिंता बढ़ा दी है। जुलाई में चीनी की एक्स-फ़ैक्टरी कीमतों में करीब 600 रुपये प्रति क्विंटल तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। चीनी उत्पादन के अनुमान घटने, गन्ने की कमज़ोर फसल, निर्यात और एथेनॉल के लिए अधिक डायवर्जन जैसे कारणों से कीमतों पर दबाव बना है। वहीं उद्योग का मानना है कि चालू पेराई सीज़न के अंत में चीनी का शुरुआती स्टॉक कई दशकों के सबसे निचले स्तर पर पहुँच सकता है, जिससे आने वाले महीनों में बाज़ार की स्थिति और संवेदनशील बनी रह सकती है।
हालांकि, इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ISMA) और नेशनल फ़ेडरेशन ऑफ़ कोऑपरेटिव शुगर फ़ैक्ट्रीज़ लिमिटेड (NFCSF) ने साफ़ किया है कि फिलहाल देश में घरेलू मांग पूरी करने के लिए पर्याप्त चीनी उपलब्ध है और किसी तरह की कमी की आशंका नहीं है। उद्योग संगठनों ने व्यापारियों, थोक विक्रेताओं और खरीदारों से सट्टेबाज़ी और जमाखोरी से बचने की अपील करते हुए कहा कि मौजूदा मूल्य वृद्धि के पीछे घबराहट फैलाने जैसी कोई बुनियादी वजह नहीं है।
जून के अंत में महाराष्ट्र और कर्नाटक में एस-ग्रेड चीनी की एक्स-फ़ैक्टरी कीमत लगभग 3,850 रुपये प्रति क्विंटल थी, जो अब बढ़कर 4,400 से 4,450 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुँच गई है। वहीं उत्तर प्रदेश समेत उत्तरी राज्यों में एम-ग्रेड चीनी की कीमत 4,450 से 4,550 रुपये प्रति क्विंटल के स्तर पर पहुँच चुकी है। इस बढ़ोतरी का असर खुदरा बाज़ार में भी दिखाई देने लगा है और आने वाले दिनों में कीमतों में और बढ़ोतरी की आशंका जताई जा रही है।
चीनी उद्योग के अनुसार, चालू 2025-26 पेराई सीज़न में देश का कुल चीनी उत्पादन लगभग 279 लाख टन रहने का अनुमान है, जबकि घरेलू खपत करीब 285 लाख टन रह सकती है। लगातार दूसरे वर्ष उत्पादन खपत से कम रहने की स्थिति बन रही है। सीज़न की शुरुआत में उद्योग ने 309 लाख टन उत्पादन का अनुमान लगाया था, लेकिन उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में गन्ने की कमज़ोर फसल के कारण उत्पादन उम्मीद से काफी कम रहा। 15 मई 2026 तक उत्तर प्रदेश का चीनी उत्पादन घटकर 89.70 लाख टन रह गया, जो पिछले एक दशक का सबसे निचला स्तर है। महाराष्ट्र में भी उत्पादन 99.20 लाख टन तक ही पहुँच सका।
गन्ने की कमज़ोर फसल के बावजूद केंद्र सरकार ने दिसंबर 2025 में 15 लाख टन चीनी निर्यात की अनुमति दी थी। इसके बाद फ़रवरी 2026 में अतिरिक्त 5 लाख टन निर्यात कोटा भी जारी किया गया। शुरुआती महीनों में वैश्विक बाज़ार में अनुकूल कीमतें नहीं मिलने से निर्यात धीमा रहा, लेकिन बाद में इसमें तेजी आई और निर्यात पर रोक लगने से पहले लगभग 8 लाख टन चीनी विदेश भेजी जा चुकी थी। बाद में सरकार ने 30 सितंबर 2026 तक चीनी निर्यात पर रोक लगा दी।
उद्योग का कहना है कि महाराष्ट्र और कर्नाटक में एथेनॉल उत्पादन के लिए अधिक गन्ना डायवर्जन और निर्यात के कारण चीनी का स्टॉक अपेक्षाकृत कम हो गया है। पहले उत्तर भारत और महाराष्ट्र-कर्नाटक के बीच चीनी की एक्स-फ़ैक्टरी कीमतों में लगभग 200 रुपये प्रति क्विंटल का अंतर रहता था, लेकिन अब यह घटकर करीब 100 रुपये प्रति क्विंटल रह गया है। उद्योग का मानना है कि यदि इन राज्यों में स्टॉक और घटता है तो वहाँ कीमतें उत्तर भारत के बराबर पहुँच सकती हैं।
हालांकि, ISMA और NFCSF ने संयुक्त बयान में कहा कि केंद्र सरकार के साथ हुई समीक्षा में यह स्पष्ट हुआ है कि फिलहाल देश में घरेलू मांग पूरी करने के लिए पर्याप्त चीनी उपलब्ध है। उद्योग ने व्यापारियों और खरीदारों से अपील की है कि वे अफ़वाहों के आधार पर जमाखोरी या सट्टेबाज़ी से बचें, क्योंकि इससे कृत्रिम संकट पैदा होता है।
चालू सीज़न की शुरुआत यानी 1 अक्टूबर 2025 को देश में लगभग 47 लाख टन चीनी का शुरुआती स्टॉक था। इसमें 279 लाख टन उत्पादन जोड़ने पर कुल उपलब्धता 326 लाख टन रही। घरेलू खपत 285 लाख टन और लगभग 8 लाख टन निर्यात के बाद 1 अक्टूबर 2026 को शुरुआती स्टॉक केवल 33 से 35 लाख टन रहने का अनुमान है, जो कई वर्षों के सबसे निचले स्तरों में माना जा रहा है।
उद्योग के अनुसार, इस स्टॉक में से लगभग 10 लाख टन चीनी व्यापारियों और स्टॉकिस्टों के पास रहती है। ऐसे में यदि नई पेराई समय पर शुरू नहीं होती तो अक्टूबर और नवंबर के दौरान बाज़ार में आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। यही वजह है कि चीनी मिलों ने कृषि और मौसम की परिस्थितियों के अनुसार 2026-27 का पेराई सीज़न यथासंभव जल्दी शुरू करने पर सहमति जताई है, ताकि नई चीनी जल्द बाज़ार में पहुँचे और कीमतों पर दबाव कम हो।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मानसून सामान्य नहीं रहा और गन्ने की फसल प्रभावित हुई, तो त्योहारी सीज़न के दौरान चीनी की कीमतों में और तेजी आ सकती है। इससे न केवल उपभोक्ताओं को अधिक कीमत चुकानी पड़ेगी, बल्कि सरकार के पास अतिरिक्त बिक्री कोटा जारी करने की गुंजाइश भी सीमित रह जाएगी।
उद्योग ने कहा है कि यदि गन्ने का उत्पादन कमज़ोर रहा तो एथेनॉल उत्पादन भी प्रभावित होगा और अगले वर्ष भारत से चीनी निर्यात की संभावना लगभग समाप्त हो सकती है। ISMA और NFCSF ने भरोसा दिलाया कि वे केंद्र सरकार के साथ मिलकर देशभर में चीनी की निर्बाध आपूर्ति, समय पर उपलब्धता और कीमतों में स्थिरता बनाए रखने के लिए लगातार काम करेंगे। साथ ही गन्ना किसानों, चीनी मिलों और उपभोक्ताओं तीनों के हितों का संतुलन बनाए रखने का प्रयास जारी रहेगा।
हालांकि, इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ISMA) और नेशनल फ़ेडरेशन ऑफ़ कोऑपरेटिव शुगर फ़ैक्ट्रीज़ लिमिटेड (NFCSF) ने साफ़ किया है कि फिलहाल देश में घरेलू मांग पूरी करने के लिए पर्याप्त चीनी उपलब्ध है और किसी तरह की कमी की आशंका नहीं है। उद्योग संगठनों ने व्यापारियों, थोक विक्रेताओं और खरीदारों से सट्टेबाज़ी और जमाखोरी से बचने की अपील करते हुए कहा कि मौजूदा मूल्य वृद्धि के पीछे घबराहट फैलाने जैसी कोई बुनियादी वजह नहीं है।
600 रुपये प्रति क्विंटल तक महंगी हुई चीनी, उत्पादन घटने से बढ़ा दबाव
चीनी उद्योग के अनुसार, चालू 2025-26 पेराई सीज़न में देश का कुल चीनी उत्पादन लगभग 279 लाख टन रहने का अनुमान है, जबकि घरेलू खपत करीब 285 लाख टन रह सकती है। लगातार दूसरे वर्ष उत्पादन खपत से कम रहने की स्थिति बन रही है। सीज़न की शुरुआत में उद्योग ने 309 लाख टन उत्पादन का अनुमान लगाया था, लेकिन उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में गन्ने की कमज़ोर फसल के कारण उत्पादन उम्मीद से काफी कम रहा। 15 मई 2026 तक उत्तर प्रदेश का चीनी उत्पादन घटकर 89.70 लाख टन रह गया, जो पिछले एक दशक का सबसे निचला स्तर है। महाराष्ट्र में भी उत्पादन 99.20 लाख टन तक ही पहुँच सका।
निर्यात, एथेनॉल और कम स्टॉक ने बढ़ाई चिंता
उद्योग का कहना है कि महाराष्ट्र और कर्नाटक में एथेनॉल उत्पादन के लिए अधिक गन्ना डायवर्जन और निर्यात के कारण चीनी का स्टॉक अपेक्षाकृत कम हो गया है। पहले उत्तर भारत और महाराष्ट्र-कर्नाटक के बीच चीनी की एक्स-फ़ैक्टरी कीमतों में लगभग 200 रुपये प्रति क्विंटल का अंतर रहता था, लेकिन अब यह घटकर करीब 100 रुपये प्रति क्विंटल रह गया है। उद्योग का मानना है कि यदि इन राज्यों में स्टॉक और घटता है तो वहाँ कीमतें उत्तर भारत के बराबर पहुँच सकती हैं।
हालांकि, ISMA और NFCSF ने संयुक्त बयान में कहा कि केंद्र सरकार के साथ हुई समीक्षा में यह स्पष्ट हुआ है कि फिलहाल देश में घरेलू मांग पूरी करने के लिए पर्याप्त चीनी उपलब्ध है। उद्योग ने व्यापारियों और खरीदारों से अपील की है कि वे अफ़वाहों के आधार पर जमाखोरी या सट्टेबाज़ी से बचें, क्योंकि इससे कृत्रिम संकट पैदा होता है।
33 लाख टन तक सिमट सकता है शुरुआती स्टॉक, समय पर पेराई शुरू होना होगा अहम
उद्योग के अनुसार, इस स्टॉक में से लगभग 10 लाख टन चीनी व्यापारियों और स्टॉकिस्टों के पास रहती है। ऐसे में यदि नई पेराई समय पर शुरू नहीं होती तो अक्टूबर और नवंबर के दौरान बाज़ार में आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। यही वजह है कि चीनी मिलों ने कृषि और मौसम की परिस्थितियों के अनुसार 2026-27 का पेराई सीज़न यथासंभव जल्दी शुरू करने पर सहमति जताई है, ताकि नई चीनी जल्द बाज़ार में पहुँचे और कीमतों पर दबाव कम हो।
त्योहारी सीज़न में महंगी हो सकती है चीनी
उद्योग ने कहा है कि यदि गन्ने का उत्पादन कमज़ोर रहा तो एथेनॉल उत्पादन भी प्रभावित होगा और अगले वर्ष भारत से चीनी निर्यात की संभावना लगभग समाप्त हो सकती है। ISMA और NFCSF ने भरोसा दिलाया कि वे केंद्र सरकार के साथ मिलकर देशभर में चीनी की निर्बाध आपूर्ति, समय पर उपलब्धता और कीमतों में स्थिरता बनाए रखने के लिए लगातार काम करेंगे। साथ ही गन्ना किसानों, चीनी मिलों और उपभोक्ताओं तीनों के हितों का संतुलन बनाए रखने का प्रयास जारी रहेगा।