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ट्रंप का टैरिफ ऐलान: भारतीय किसानों के लिए राहत या नई मुसीबत?

Manvendra Singh | Feb 03, 2026, 16:24 IST
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अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump के एक ट्वीट ने भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है। ट्रंप ने दावा किया कि प्रधानमंत्री Narendra Modi से बातचीत के बाद भारत पर लगाए गए अमेरिकी टैरिफ को 50 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया गया है। पहली नज़र में यह खबर भारतीय निर्यातकों के लिए राहत जैसी लगती है, लेकिन इसी ऐलान के साथ एक और दावा जुड़ा है कि भारत अमेरिकी उत्पादों पर आयात शुल्क (टैरिफ) लगभग शून्य कर देगा। यहीं से किसानों की चिंता शुरू होती है।
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इस पूरे घटनाक्रम पर कृषि विशेषज्ञ विजय जावंधिया कहते हैं, "यह मामला केवल टैरिफ घटने-बढ़ने का नहीं है, बल्कि इससे भारतीय खेती की पूरी संरचना प्रभावित हो सकती है। उन्होंने आगे कहा,“अगर अमेरिकी कृषि उत्पाद बिना टैरिफ के भारत में आने लगे, तो यहां का छोटा किसान टिक नहीं पाएगा।”

ट्रंप के ट्वीट में कई बड़े दावे किए गए हैं भारत का रूस से तेल खरीदना कम करना, अमेरिका से बड़े पैमाने पर ऊर्जा और कृषि उत्पाद खरीदना और अमेरिकी सामान पर टैरिफ लगभग शून्य करना। लेकिन इन दावों पर भारत सरकार की ओर से अभी तक कोई स्पष्ट आधिकारिक बयान नहीं आया है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक समझौते की पूरी शर्तें सार्वजनिक नहीं होतीं, तब तक इसे अंतिम व्यापार समझौता मानना जल्दबाजी होगी। किसानों के लिए सबसे अहम सवाल यह है कि क्या भारत सच में अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए अपने बाजार खोलने जा रहा है। अगर ऐसा हुआ, तो इसका सीधा असर खेती-किसानी पर पड़ेगा।

Social media tweet
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18 प्रतिशत टैरिफ: राहत की आधी तस्वीर

टैरिफ 50 प्रतिशत से घटकर 18 प्रतिशत होना भारतीय निर्यातकों के लिए निश्चित तौर पर राहत है। कुछ भारतीय कृषि उत्पादों के लिए यह बहुत अच्छी ख़बर है। बासमती चावल भारत की पहचान है और अमेरिका में इसकी बहुत माँग है। 202 4-25 में भारत ने 304.78 मिलियन डॉलर का बासमती चावल अमेरिका को निर्यात किया। अब कम टैरिफ से यह और सस्ता हो जाएगा और मांग बढ़ेगी। पंजाब और हरियाणा के बासमती उगाने वाले किसानों को इसका सीधा लाभ मिलेगा। मसालों की बात करें तो भारत का मसाला निर्यात 2024-25 में 36,765 करोड़ रुपये का था। अमेरिका में भारतीय मसालों की बड़ी मांग है, खासकर होटल और रेस्तरां उद्योग में। हल्दी, मिर्च, जीरा, काली मिर्च, इलायची - ये सब अब अमेरिकी बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी होंगे। केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु के मसाला किसानों के लिए यह अच्छी खबर है।

फल और मेवे का निर्यात भी बढ़ेगा। अनार, आम, केला, काजू - इन सभी की अमेरिका में अच्छी मांग है। पिछले साल 359 मिलियन डॉलर का निर्यात हुआ था यह भी बढ़ सकता है। समुद्री उत्पाद भी एक बड़ा क्षेत्र है साल 2024-25 में भारत ने 62,625 करोड़ रुपये से अधिक के समुद्री उत्पाद निर्यात किए। हालांकि झींगा और अन्य समुद्री उत्पादों को अभी टैरिफ छूट नहीं मिली है, लेकिन भविष्य में मिल सकती है।

कृषि विशेषज्ञ विजय बताते हैं, "वियतनाम पर 20% टैरिफ है, जबकि भारत पर अब केवल 18% है। यह भारत के लिए एक प्रतिस्पर्धी लाभ है, खासकर टेक्सटाइल निर्यात में। वियतनाम पिछले कुछ सालों में भारत का एक बड़ा प्रतिस्पर्धी बन गया था। लेकिन विजय कहते हैं कि अगर हमारी नीति सही रही, तो हम वियतनाम को पीछे छोड़ सकते हैं। वियतनाम ने अपनी मुद्रा का बहुत devaluation किया है - वहां 24,000 रुपये का एक डॉलर है। लेकिन अब टैरिफ के मामले में हमारी स्थिति बेहतर है।

निर्यात बढ़ने से कृषि क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर बनेंगे। प्रसंस्करण इकाइयों में काम बढ़ेगा, पैकेजिंग की जरूरत होगी, परिवहन और लॉजिस्टिक्स में नौकरियां बनेंगी। यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में मदद कर सकता है।

अमेरिका और भारत की खेती: बराबरी की लड़ाई नहीं

अमेरिका और भारत की खेती की तुलना करना ही अपने आप में असमानता को दिखाता है। अमेरिका में हजारों एकड़ में खेती करने वाले बड़े फार्म हैं, आधुनिक मशीनें हैं और भारी सरकारी सब्सिडी है। भारत में 86 प्रतिशत से ज्यादा किसान छोटे और सीमांत हैं, जिनके पास दो हेक्टेयर से भी कम जमीन है।

विजय समझाते हैं, “अमेरिका में मास प्रोडक्शन है, भारत में प्रोडक्शन बाय मासेस।” यानी वहां उत्पादन बड़े उद्योगों की तरह होता है, जबकि यहां लाखों छोटे किसान मिलकर देश का पेट भरते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि बिना सुरक्षा के ये किसान अमेरिकी सस्ते उत्पादों से कैसे मुकाबला करेंगे?

पोल्ट्री और डेयरी पर सबसे बड़ा खतरा

अगर अमेरिकी पोल्ट्री उत्पाद भारत में सस्ते दामों पर आने लगे, तो देश की पूरी मुर्गी पालन व्यवस्था खतरे में पड़ सकती है। अमेरिका में चिकन के कुछ हिस्सों की खपत कम है, जिन्हें वहां बेहद सस्ते में बेचा जाता है। भारत में वही हिस्से बड़ी मांग में हैं। इससे यहां के पोल्ट्री किसान और उनसे जुड़ी मक्का-सोयाबीन की खेती भी प्रभावित होगी। डेयरी सेक्टर को लेकर विजय की चिंता और गहरी है। उनका कहना है कि अगर अमेरिका से दूध और दुग्ध उत्पाद आने लगे, तो छोटे दुग्ध उत्पादक ही नहीं, बल्कि सहकारी मॉडल पर चलने वाली बड़ी संस्थाएं भी दबाव में आ सकती हैं। डेयरी भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और इससे लाखों परिवारों की रोजी-रोटी जुड़ी है।

कपास, सोयाबीन और दालें

कपास और सोयाबीन जैसे फसलों में अमेरिका की लागत कम है और सरकारी सब्सिडी ज्यादा। अगर ये उत्पाद बिना टैरिफ के भारत में आए, तो घरेलू कीमतें गिरेंगी। विजय याद दिलाते हैं कि जब कपास पर आयात शुल्क हटाया गया था, तब किसानों को नुकसान हुआ और बाद में सरकार को फिर से शुल्क लगाना पड़ा। दालों की स्थिति पहले से ही नाजुक है। सस्ते आयात से घरेलू बाजार में कीमतें गिरती हैं और किसान को लागत भी नहीं निकलती। अगर अमेरिकी दालें बिना शुल्क भारत में आईं, तो दाल उत्पादक किसानों पर और दबाव बढ़ेगा।

गेहूं का इतिहास - PL-480 की याद

विजय एक बहुत महत्वपूर्ण ऐतिहासिक संदर्भ देते हैं। वे कहते हैं कि पहले हम PL-480 योजना के तहत अमेरिकी गेहूं लेते थे। अब वे फिर से बोलेंगे कि हमारा गेहूं सस्ता है, लो आप। PL-480 क्या था? यह 1950-60 के दशक में अमेरिका की एक योजना थी जिसके तहत भारत को अमेरिकी गेहूं दिया जाता था। उस समय भारत में खाद्य संकट था। लेकिन इस योजना के साथ कई शर्तें भी जुड़ी थीं और भारत अमेरिका पर निर्भर हो गया था। 1960 के दशक में हरित क्रांति आई और भारत ने खाद्य आत्मनिर्भरता प्राप्त की। तब से हमने यह सुनिश्चित किया कि हम गेहूं के लिए किसी पर निर्भर न रहें। अब अगर फिर से सस्ता अमेरिकी गेहूँ आने लगा, तो सरकार कहेगी कि हमारे पास सस्ता गेहूं उपलब्ध है, तो MSP पर क्यों खरीदें? और भारतीय किसान खत्म हो जाएगा। यह इतिहास की पुनरावृत्ति होगी, लेकिन इस बार के परिणाम और भी गंभीर हो सकते हैं।

स्वामीनाथन का सुझाव - असली समाधान की तलाश

विजय ने डॉ. स्वामीनाथन की फार्मर्स कमीशन रिपोर्ट का ज़िक्र किया, जो बहुत महत्वपूर्ण है। डॉ. स्वामीनाथन को सरकार ने भारत रत्न दिया है, और उनकी सिफारिशों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। स्वामीनाथन जी ने कहा था कि WTO (विश्व व्यापार संगठन) में अमीर देश - अमेरिका, यूरोप, यहाँ तक कि चीन भी - "ब्लू बॉक्स", "एम्बर बॉक्स", और "ग्रीन बॉक्स" के नाम पर अपने किसानों को सब्सिडी देते हैं। ये technical terms हैं, लेकिन मतलब साफ है - ये देश अलग-अलग तरीकों से अपने किसानों को आर्थिक मदद देते हैं और WTO के नियम इसकी इजाजत देते हैं। स्वामीनाथन की सिफारिश थी कि भारत को दुनिया के गरीब देशों का नेतृत्व करना चाहिए और WTO में एक "लाइवलीहुड बॉक्स" (जीविका बॉक्स) की मांग करनी चाहिए। यह बॉक्स विशेष रूप से छोटे किसानों के लिए होगा जिनके लिए खेती सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि जीवन जीने का जरिया है।

विजय इस बात पर जोर देते हैं - "Production by masses" को सुरक्षा की जरूरत है। जब लाखों छोटे किसानों की जिंदगी खेती पर निर्भर है, तो उन्हें "mass production" करने वाली बड़ी कंपनियों से बचाना सरकार की जिम्मेदारी है और इसके लिए विजय कहते हैं कि देश की सभी राजनीतिक पार्टियों को राजनीति को एक तरफ रखकर किसानों की अर्थव्यवस्था की सुरक्षा के लिए एक साथ आना चाहिए। यह राष्ट्रीय मुद्दा है, पार्टी का मुद्दा नहीं।

MSP और खाद्य सुरक्षा का सवाल

इस पूरे विवाद का केंद्र न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) है। विजय साफ कहते हैं कि किसी भी व्यापार समझौते में यह शर्त होनी चाहिए कि कोई भी कृषि उत्पाद MSP से नीचे कीमत पर भारत में न आए। अगर ऐसा नहीं हुआ और सस्ता आयात बढ़ा, तो सरकार पर MSP खरीद कम करने का दबाव बनेगा। वे चेतावनी देते हैं कि अगर MSP पर गेहूं और धान की खरीद कमजोर हुई, तो पंजाब-हरियाणा जैसे राज्यों के किसान गंभीर संकट में आ जाएंगे। यह सिर्फ किसानों का नहीं, देश की खाद्य सुरक्षा का भी सवाल है।

कुछ फायदे, लेकिन सीमित

यह कहना भी गलत होगा कि इस समझौते से कोई फायदा नहीं होगा। कुछ निर्यात-उन्मुख किसानों और प्रोसेसिंग यूनिट्स को अवसर मिल सकते हैं। लेकिन यह फायदा सीमित दायरे में रहेगा, जबकि नुकसान का दायरा बहुत बड़ा हो सकता है। विजय का मानना है कि उत्पादन बढ़ाना ही समाधान नहीं है। किसान पहले ही उत्पादन बढ़ा चुके हैं, तभी देश को अनाज आयात नहीं करना पड़ता। असली जरूरत किसानों की आय की गारंटी की है, जैसा अमेरिका अपने किसानों को देता है।

भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर अभी कई सवालों के जवाब आना अभी बाकी है। 18 प्रतिशत टैरिफ राहत जरूर है, लेकिन अगर इसके बदले कृषि आयात बिना सुरक्षा के खोला गया, तो यह भारतीय किसानों के लिए भारी पड़ सकता है। गांव-देहात की खेती सिर्फ एक व्यापार नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की जिंदगी का सहारा है। इसलिए किसी भी समझौते से पहले यह देखना जरूरी है कि उससे छोटे किसान की आय, आजीविका और सम्मान सुरक्षित रहेंगे या नहीं।
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