भारत में वैलेंटाइन-डे कितना प्रासंगिक?
Dr SB Misra | Feb 14, 2026, 20:09 IST
हर साल की तरह इस साल भी 14 फरवरी को वैलेंटाइन-डे मनाया जा रहा है। छत्तीसगढ़ सरकार ने वैलेंटाइन-डे को मातृ-पितृ दिवस के रूप में मनाने की बात कही थी। यह तर्कसंगत नहीं लगता, क्योंकि वैलेंटाइन-डे मूलतः स्त्री-पुरुष संबंधों पर आधारित अवसर है, चाहे शादी ब्याह करके या उसके बिना भी। औपचारिक संबंध जरूरी नहीं। पश्चिम में लोग इसे ‘रोमांटिक लव’ का दिन कहते हैं।
हर साल की तरह इस साल भी 14 फरवरी को वैलेंटाइन-डे मनाया जा रहा है। छत्तीसगढ़ सरकार ने वैलेंटाइन-डे को मातृ-पितृ दिवस के रूप में मनाने की बात कही थी। यह तर्कसंगत नहीं लगता, क्योंकि वैलेंटाइन-डे मूलतः स्त्री-पुरुष संबंधों पर आधारित अवसर है, चाहे शादी ब्याह करके या उसके बिना भी। औपचारिक संबंध जरूरी नहीं। पश्चिम में लोग इसे ‘रोमांटिक लव’ का दिन कहते हैं।
हमारे देश के आदिवासी समाज में ऐसी परंपराएं देखने को मिलती हैं। बस्तर के आदिवासी समाज में ‘घोटुल’ नाम से युवक और युवतियां इकट्ठे होकर खुशियां मनाते हैं, और आपस में दोस्ती करके पश्चिमी देशों की ही भांति, स्थायी मित्र यानी पति-पत्नी भी बन जाते हैं। भारत के परिपक्व समाज में प्यार की परख त्याग और एहसास से होती है, जिसमें दिखावा नहीं होता।
वैलेंटाइन-डे कब और कैसे शुरू हुआ? इसके बारे में वो लोग भी ठीक से नहीं जानते, जो इसे धूम-धाम से मनाते हैं। कहते हैं पांचवीं शताब्दी में इटली की राजधानी रोम में एक वैलेंटाइन नाम के संत रहते थे, जो ऐसे युवक-युवतियों को, जिन्हें शादी करने की मनाही थी, साल में एक बार इकट्ठा करके उत्सव मनाते थे। इस उत्सव में युवक-युवतियां अपना साथी चुनते थे, और एक साल तक साथ-साथ रहते थे। अगले साल चाहे तो जोड़ा बदल सकते थे, नहीं तो वही जोड़ा भी रह सकता था। वे एक दूसरे के वैलेंटाइन कहलाते थे, लेकिन यह परंपरा भारत में उचित नहीं मानी जाएगी। जहाँ पति-पत्नी का रिश्ता सात जन्मों का माना जाता है। क्योंकि मरने के पहले संत वैलेंटाइन ने जेलर की बेटी को एक पत्र लिखा था, जिसमें ‘तुम्हारा वैलेंटाइन’ कह कर संबोधित किया था।
पश्चिमी देशों में इस दिन पुरुष और नारी खुलकर प्यार का इज़हार करते हैं, महंगे तोहफे देते हैं, कार्ड और फूल देते हैं, पार्टी करते हैं और होटलों में रात भी बिताते हैं। अमेरिका जैसे धनी देशों में इस दिन अरबों रुपए का व्यापार हो जाता है, इस लिए व्यापारी वर्ग इस परंपरा को विशेष रूप से प्रोत्साहित करता है। रोमांटिक लव का जो भी मतलब होता हो, हवा में भर जाता है। वैसे तो पश्चिम में लड़के-लड़कियां दोस्त बदलते रहते हैं, जब तक वे ‘स्टेडी’ नहीं हो जाते, तब वह विवाह का प्रस्ताव करते हैं।
अनौपचारिक स्त्री-पुरुष संबंधों के उदाहरण भारत में भी मिलते हैं। कहते हैं एक राजपुरोहित का बेटा था अजामिल, जिसका एक गणिका, जो एक नर्तकी थी, उससे अनौपचारिक प्रेम संबंध हो गया था। जिस तरह वैलेंटाइन को नियमों के उल्लंघन के लिए फांसी की सजा दी गई थी। उसी प्रकार अजामिल को भी बहुत यातनाएं झेलनी पड़ी थीं। सच्चाई जो भी हो, आज इमारे देश में 30 लाख से अधिक गणिकाएं हैं, जिन्हें वैश्या कहते हैं, पहले नर्तकीं की भूमिका मिलती थी, अब वह भी नहीं मिलती। हमारे देश में इन्हें अपमानजनक शब्दों से संबोधित किया जाता है परन्तु विदेशों में इनके प्रति तिरस्कार भाव नहीं रहता।
हमारे समाज में दलित, अछूत, अल्पसंख्यक, अबला, भिखारी आदि की चिंता की जाती है। पतियों के लिए, बच्चों के लिए, भाइयों-बहनों के लिए, गायों के लिए दिन निर्धारित हैं, परंतु परित्यक्त लोगों के लिए कोई दिन नहीं। यदि वैलेंटाइन-डे समाज में अलग-थलग पड़े लोग चाहे गणिकाएं, किन्नर और समसैंगिक संबंध रखने वाले लोग हों, उनके लिए निर्धारित कर दिया जाए, तो शायद उचित होगा। ये लोग आबादी में एक करोड़ से अधिक हैं, लेकिन उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं। यदि किसी विदेशी परंपरा को स्वदेशानुकूल बनाकर आवश्यकतानुसार उपयोग किया जा सकता हो, या अतीत की किसी परंपरा को युगानुकूल बनाकर उपयोग हो सकता हो, तो किया जा सकता है।
समाज के समर्थ लोग इतने स्वार्थी हैं, कि तिरस्कृत लोगों को खुशियां मनाने का अवसर नहीं देते। क्या गणिकाएं हमारे समाज में सबके साथ मिलकर होली, दीवाली या अन्य त्योहार मना सकती हैं? किन्नर और समलैंगिक संबंध निभाने वाले लोग खुलकर जी सकते हैं? यदि वैलेंटाइन-डे इन सबके लिए खुशियों का दिन भारतीय संस्कृत और परम्परा भुलाकर मान लिया जाय तो यह दिन सार्थक हो सकता है। वे एक दिन अपने ढंग से जीने का अवसर पा सकेंगे। बाकी लोग भी यदि चाहें, तो उनके साथ घुलमिलकर वैलेंटाइन-डे मना सकेंगे। समाज के अनेक लोग जो ‘रोमान्टिक लव’ निभाने वालों पर हिंसात्मक व्यवहार करते हैं, शायद नहीं करेंगे। भारतीय परिपेक्ष्य में वैलेंटाइन-डे कुछ हद तक प्रासंगिक हो जाएगा।
सच कहा जाए तो वैलेंटाइन-डे भारतीय संदर्भ में सेक्स आधारित प्रेम का दिन है, लेकिन भारत में शुद्ध प्रेम पर अधिक बल दिया गया है, जिसमें सेक्स जैसा कोई स्वार्थ ना शामिल हो। राधा और कृष्ण का प्रेम या फिर सावित्री और सत्यवान अथवा लैला और मंजनू का प्रेम सेक्स आधारित नहीं था, वह शुद्ध प्रेम था। अपना वैलेंटाइन चुनने की जो परंपरा बताई जाती है, उससे मिलती-जुलती भी मैंने आदिवासियों के बीच में बस्तर में देखी थी। जहां घोटुल नाम से नवयुवक और नवयुतियां एकत्रित होकर समूह नृत्य करते हैं और फिर उसमें से एक साथी प्रत्येक नवयुवक चुनता है। अगर यह प्रक्रिया साल दर साल प्रयोग के रूप में की जाए और एक साथ रहने की परंपरा बाद में आए, तो फिर इसे हमारे देश में वेश्यावृत्ति से मिलती--जुलती परंपरा कहा जाएगा। यह प्रैक्टिस और भी वीभत्स हो जाएगी जब हम समलैंगिक संबंध स्थापित करने वाले लोगों को भी वैलेंटाइन संबंध कहेंगे।
कितना अच्छा होता यदि हमारे समाज के लोग अपने देश के इतिहास को ध्यान से समझते और अलग--अलग संबंधों को उजागर करने वाले दिवस मानते। ऐसे दिवस भी मनाए जाते जैसे- भाई दूज और मित्रता निभाने के लिए या एक दूसरे के रक्षा करने का वचन देने का दिन रक्षाबंधन का होता है। इसी तरह बच्चों के प्रति अपने प्रेम को उजागर करने के लिए बाल दिवस और गुरु शिष्य के संबंध को मनाने के लिए गुरु पूर्णिमा तथा पिता के सम्मान में मातृ-पितृ दिवस मनाया भी जाता है। हमारे यहां कृष्ण और सुदामा की मित्रता दिवस के लिए और कृष्ण की जन्म के रूप में जन्माष्टमी मनाई जाती है। मानवीय संबंधों को उजागर करने के लिए यह हमारे देश में बहुत से दिन हैं, और उन्हें मनाते समय हमे ध्यान रखना होता है कि हम स्नेह भाव, सम्मान भाव, मित्र भाव, यह फिर सेक्स भाव, का दिन है। इतने विकल्प होने के साथ हमें विदेशों की नकल करने की आवश्यकता नहीं है।
वैलेंटाइन-डे के विरोध में प्रेमी युगल को प्रताड़ित करने या समाज में अशांति फ़ैलाने की आवश्यकता नहीं है। यदि हम विरोध करना ही चाहते हैं, तो वैचारिक स्तर पर सामाजिक जागरूकता पैदा करके विरोध करना चाहिए।
हमारे देश के आदिवासी समाज में ऐसी परंपराएं देखने को मिलती हैं। बस्तर के आदिवासी समाज में ‘घोटुल’ नाम से युवक और युवतियां इकट्ठे होकर खुशियां मनाते हैं, और आपस में दोस्ती करके पश्चिमी देशों की ही भांति, स्थायी मित्र यानी पति-पत्नी भी बन जाते हैं। भारत के परिपक्व समाज में प्यार की परख त्याग और एहसास से होती है, जिसमें दिखावा नहीं होता।
वैलेंटाइन-डे कब और कैसे शुरू हुआ? इसके बारे में वो लोग भी ठीक से नहीं जानते, जो इसे धूम-धाम से मनाते हैं। कहते हैं पांचवीं शताब्दी में इटली की राजधानी रोम में एक वैलेंटाइन नाम के संत रहते थे, जो ऐसे युवक-युवतियों को, जिन्हें शादी करने की मनाही थी, साल में एक बार इकट्ठा करके उत्सव मनाते थे। इस उत्सव में युवक-युवतियां अपना साथी चुनते थे, और एक साल तक साथ-साथ रहते थे। अगले साल चाहे तो जोड़ा बदल सकते थे, नहीं तो वही जोड़ा भी रह सकता था। वे एक दूसरे के वैलेंटाइन कहलाते थे, लेकिन यह परंपरा भारत में उचित नहीं मानी जाएगी। जहाँ पति-पत्नी का रिश्ता सात जन्मों का माना जाता है। क्योंकि मरने के पहले संत वैलेंटाइन ने जेलर की बेटी को एक पत्र लिखा था, जिसमें ‘तुम्हारा वैलेंटाइन’ कह कर संबोधित किया था।
पश्चिमी देशों में इस दिन पुरुष और नारी खुलकर प्यार का इज़हार करते हैं, महंगे तोहफे देते हैं, कार्ड और फूल देते हैं, पार्टी करते हैं और होटलों में रात भी बिताते हैं। अमेरिका जैसे धनी देशों में इस दिन अरबों रुपए का व्यापार हो जाता है, इस लिए व्यापारी वर्ग इस परंपरा को विशेष रूप से प्रोत्साहित करता है। रोमांटिक लव का जो भी मतलब होता हो, हवा में भर जाता है। वैसे तो पश्चिम में लड़के-लड़कियां दोस्त बदलते रहते हैं, जब तक वे ‘स्टेडी’ नहीं हो जाते, तब वह विवाह का प्रस्ताव करते हैं।
अनौपचारिक स्त्री-पुरुष संबंधों के उदाहरण भारत में भी मिलते हैं। कहते हैं एक राजपुरोहित का बेटा था अजामिल, जिसका एक गणिका, जो एक नर्तकी थी, उससे अनौपचारिक प्रेम संबंध हो गया था। जिस तरह वैलेंटाइन को नियमों के उल्लंघन के लिए फांसी की सजा दी गई थी। उसी प्रकार अजामिल को भी बहुत यातनाएं झेलनी पड़ी थीं। सच्चाई जो भी हो, आज इमारे देश में 30 लाख से अधिक गणिकाएं हैं, जिन्हें वैश्या कहते हैं, पहले नर्तकीं की भूमिका मिलती थी, अब वह भी नहीं मिलती। हमारे देश में इन्हें अपमानजनक शब्दों से संबोधित किया जाता है परन्तु विदेशों में इनके प्रति तिरस्कार भाव नहीं रहता।
हमारे समाज में दलित, अछूत, अल्पसंख्यक, अबला, भिखारी आदि की चिंता की जाती है। पतियों के लिए, बच्चों के लिए, भाइयों-बहनों के लिए, गायों के लिए दिन निर्धारित हैं, परंतु परित्यक्त लोगों के लिए कोई दिन नहीं। यदि वैलेंटाइन-डे समाज में अलग-थलग पड़े लोग चाहे गणिकाएं, किन्नर और समसैंगिक संबंध रखने वाले लोग हों, उनके लिए निर्धारित कर दिया जाए, तो शायद उचित होगा। ये लोग आबादी में एक करोड़ से अधिक हैं, लेकिन उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं। यदि किसी विदेशी परंपरा को स्वदेशानुकूल बनाकर आवश्यकतानुसार उपयोग किया जा सकता हो, या अतीत की किसी परंपरा को युगानुकूल बनाकर उपयोग हो सकता हो, तो किया जा सकता है।
समाज के समर्थ लोग इतने स्वार्थी हैं, कि तिरस्कृत लोगों को खुशियां मनाने का अवसर नहीं देते। क्या गणिकाएं हमारे समाज में सबके साथ मिलकर होली, दीवाली या अन्य त्योहार मना सकती हैं? किन्नर और समलैंगिक संबंध निभाने वाले लोग खुलकर जी सकते हैं? यदि वैलेंटाइन-डे इन सबके लिए खुशियों का दिन भारतीय संस्कृत और परम्परा भुलाकर मान लिया जाय तो यह दिन सार्थक हो सकता है। वे एक दिन अपने ढंग से जीने का अवसर पा सकेंगे। बाकी लोग भी यदि चाहें, तो उनके साथ घुलमिलकर वैलेंटाइन-डे मना सकेंगे। समाज के अनेक लोग जो ‘रोमान्टिक लव’ निभाने वालों पर हिंसात्मक व्यवहार करते हैं, शायद नहीं करेंगे। भारतीय परिपेक्ष्य में वैलेंटाइन-डे कुछ हद तक प्रासंगिक हो जाएगा।
सच कहा जाए तो वैलेंटाइन-डे भारतीय संदर्भ में सेक्स आधारित प्रेम का दिन है, लेकिन भारत में शुद्ध प्रेम पर अधिक बल दिया गया है, जिसमें सेक्स जैसा कोई स्वार्थ ना शामिल हो। राधा और कृष्ण का प्रेम या फिर सावित्री और सत्यवान अथवा लैला और मंजनू का प्रेम सेक्स आधारित नहीं था, वह शुद्ध प्रेम था। अपना वैलेंटाइन चुनने की जो परंपरा बताई जाती है, उससे मिलती-जुलती भी मैंने आदिवासियों के बीच में बस्तर में देखी थी। जहां घोटुल नाम से नवयुवक और नवयुतियां एकत्रित होकर समूह नृत्य करते हैं और फिर उसमें से एक साथी प्रत्येक नवयुवक चुनता है। अगर यह प्रक्रिया साल दर साल प्रयोग के रूप में की जाए और एक साथ रहने की परंपरा बाद में आए, तो फिर इसे हमारे देश में वेश्यावृत्ति से मिलती--जुलती परंपरा कहा जाएगा। यह प्रैक्टिस और भी वीभत्स हो जाएगी जब हम समलैंगिक संबंध स्थापित करने वाले लोगों को भी वैलेंटाइन संबंध कहेंगे।
कितना अच्छा होता यदि हमारे समाज के लोग अपने देश के इतिहास को ध्यान से समझते और अलग--अलग संबंधों को उजागर करने वाले दिवस मानते। ऐसे दिवस भी मनाए जाते जैसे- भाई दूज और मित्रता निभाने के लिए या एक दूसरे के रक्षा करने का वचन देने का दिन रक्षाबंधन का होता है। इसी तरह बच्चों के प्रति अपने प्रेम को उजागर करने के लिए बाल दिवस और गुरु शिष्य के संबंध को मनाने के लिए गुरु पूर्णिमा तथा पिता के सम्मान में मातृ-पितृ दिवस मनाया भी जाता है। हमारे यहां कृष्ण और सुदामा की मित्रता दिवस के लिए और कृष्ण की जन्म के रूप में जन्माष्टमी मनाई जाती है। मानवीय संबंधों को उजागर करने के लिए यह हमारे देश में बहुत से दिन हैं, और उन्हें मनाते समय हमे ध्यान रखना होता है कि हम स्नेह भाव, सम्मान भाव, मित्र भाव, यह फिर सेक्स भाव, का दिन है। इतने विकल्प होने के साथ हमें विदेशों की नकल करने की आवश्यकता नहीं है।
वैलेंटाइन-डे के विरोध में प्रेमी युगल को प्रताड़ित करने या समाज में अशांति फ़ैलाने की आवश्यकता नहीं है। यदि हम विरोध करना ही चाहते हैं, तो वैचारिक स्तर पर सामाजिक जागरूकता पैदा करके विरोध करना चाहिए।