Banana Farming: केले की खेती कर रहे हैं तो ध्यान दें,समय रहते रूट नॉट नेमाटोड रोग को करें दूर
Gaon Connection | Feb 16, 2026, 16:46 IST
अगर आप केले की खेती कर रहे हैं तो केले की पत्तियाों में रोग लगने का डर रहता है। कई बार केले की पत्तियाँ पीली पड़ने लगती है तो कई बार पत्तों के किनारे सूखने लगते हैं। संक्रमित पौधों की वृद्धि रुक जाती है और हल्के पीले रंग की संकरी पत्तियाँ झाड़ीदार दिखाई देने लगती हैं। पौधों पर फल की संख्या कम हो जाती है और फल भी छोटे हो जाते हैं। ये सभी लक्षण हैं रूट नॉट नेमाटोड रोग के। इस रोग को कैसे दूर करना है और कैसे अपनी केले की फसल से बेस्ट क्वालिटी की फसल निकालनी है ये जानिए इस आर्टिकल में।
Banana Farming का दुश्मन 'रूट नॉट नेमाटोड रोग'
Banana mein lagne wala Rog: देश के कई राज्यों में किसान केला की खेती करते हैं, इसकी खेती से किसानों की अच्छी कमाई हो जाती है, लेकिन इसकी फ़सल में कई तरह की बीमारियाँ भी लगती हैं। उन्हीं में से एक रूट नॉट निमेटोड भी है। भारत देश में केले का उत्पादन बड़े लेवल पर होता है। केले की खेती से किसान अच्छी कमाई भी करते हैं, लेकिन केले की खेती में कई तरह के रोग भी आसानी से लग जाते हैं। इन रोगों में से एक रोग हैं 'रूट नॉट निमेटोड'रोग जो केले की खेती को खराब कर देता है। 'रूट नॉट निमेटोड'रोग दुनिया भर की केले की खेती के लिए एक बड़ा खतरा है। ये एक तरा का छोटा राउंड वॉर्म जसा होता है जो केले के पेड़ की जड़ों को संक्रमित करता है। इस रोग में केले में गाँठ बन जाती है, जिससे फल के पोषक तत्व कम हो जाते हैं और केले का विकास रूक जाता है। कई बार इस रोग के कारण 30 प्रतिशत तक की केले की उपज बर्बाद हो जाती है।
केले की फसल नेमाटोड रोग के लिए अतिसंवेदनशील होते हैं, इनमें मेलोइडोगाइन इन्कॉग्निटा और मेलोइडोगाइन जावानिका सबसे अधिक हानिकारक होते हैं। ये नेमाटोड केले की जड़ों में प्रवेश करते हैं, जिससे जड़ों में गाँठ बन जाती है। जैसे-जैसे नेमाटोड की आबाद बढ़ती है वैसे-वैसे फल के बढ़ने की प्रक्रिया धीमी होती जाती है। केले का पत्तों में पीलापन, पत्तों का मुर्झाना और फलों की गुणवत्ता में कमी जैसे लक्षण दिखाई देने लगते हैं।
केले की फसल को नेमाटोड रोग से बचाने के लिए समय रहते रोग से बचाना होता है। समय पर बचाव न करने से जडे़ं पकने लगेंगीं, उनमें बौनापन आ जाएगा, साथ ही पूरे पौधे की क्वालिटी में गिरावट आ जाएगी। माइक्रोस्कोपिक तकनीकों का उपयोग करके नेमाटोड रोग के बारे में पता करने के लिए मिट्टी और जड़ के नमूनों की जाँच की जा सकती है। नियमित निगरानी से नेमाटोड आबादी का आकलन करने और उसके अनुसार रोग को दूर करने के उपाय निकालना बेहद जरूरी है।
केले की फसल में नेमाटोड बड़ी परेशानी बन जाते हैं। ये जड़ों को नुकसान पहुंचाते हैं, जिससे पौधा कमजोर हो जाता है और पैदावार घट जाती है। इसका स्थायी इलाज तभी संभव है, जब एक साथ कई उपाय अपनाए जाएँ, इसे ही एकीकृत नेमाटोड प्रबंधन (आईएनएम) कहते हैं।
सकर लगाने से पहले उपचार बहुत जरूरी है। नीम तेल 1–2% घोल में 10 मिनट डुबोएं या मोनोक्रोटोफॉस 5% घोल में 30 मिनट रखकर छोड़ें। 72 घंटे छाया में सुखाएँ, इससे सकर लगभग पूरी तरह रोग-मुक्त हो जाता है। रोपाई से पहले सड़ी-गली जड़ों को काट दें। इसके बाद निम्बू सिडिन 15 मिली प्रति लीटर पानी में कॉर्म को 30 मिनट तक डुबोकर रखें। इससे जड़ों में मौजूद नेमाटोड मर जाते हैं।
क्या होता है 'रूट नॉट नेमाटोड'
नेमाटोड के दूसरे लक्षण
- संक्रमित पौधों की वृद्धि रुक जाना
- हल्के पीले रंग की संकरी पत्तियाँ का झाड़ीदार दिखाई देने लगना
- गंभीर संक्रमण होने पर पत्ती का किनारा सूख जाना।
- पौधों पर फल की संख्या कम हो जाना
- फलों का आकार छोटा हो जाना
- पहचान और निगरानी
केले में नेमाटोड से बचाव: आसान भाषा में समझिए
क्या होता है 'रूट नॉट नेमाटोड'
केले की फसल में नेमाटोड बड़ी परेशानी बन जाते हैं। ये जड़ों को नुकसान पहुंचाते हैं, जिससे पौधा कमजोर हो जाता है और पैदावार घट जाती है। इसका स्थायी इलाज तभी संभव है, जब एक साथ कई उपाय अपनाए जाएँ, इसे ही एकीकृत नेमाटोड प्रबंधन (आईएनएम) कहते हैं।
- फसल चक्र अपनाएँ- नेमाटोड को ख़त्म करने के लिए एक ही खेत में बार-बार केला न लगाएँ। अगर खेत में नेमाटोड ज्यादा हैं, तो धान, गन्ना या चना जैसी फसलें बीच में उगाएँ। इससे नेमाटोड का जीवन चक्र टूट जाता है और उनकी संख्या अपने आप घटने लगती है।
- रोग-रोधी केले की किस्में लगाएँ- आजकल ऐसी केले की किस्में उपलब्ध हैं, जिन पर नेमाटोड का असर कम होता है। इन किस्मों को लगाने से जड़ों में गाँठ नहीं बनती और पौधा मजबूत रहता है।
- ये फसलें लगाकर करें बचाव- खेत में या मेड़ों पर गेंदा और सरसों जैसी फसलें उगाने से भी फायदा होता है। इन पौधों में ऐसे गुण होते हैं, जो मिट्टी में मौजूद नेमाटोड को दबा देते हैं।
- जैव-नियंत्रण अपनाएँ- मिट्टी और जड़ों में अच्छे जीवाणु और फफूंद डालने से नेमाटोड कम होते हैं। पेसिलोमाइसिस लिलासिनस, माइकोराइजा, ग्लोमस फैसिकुलेटम जैसे जैव-एजेंट उपयोगी हैं। प्रति पौधा 200 ग्राम नीम की खली को ग्लोमस मोसी के साथ मिलाकर डालना काफी असरदार पाया गया है।
- जैविक खाद का इस्तेमाल करें- खेत में गोबर की खाद, कंपोस्ट या हरी खाद डालने से मिट्टी की सेहत सुधरती है। अच्छे सूक्ष्म जीव बढ़ते हैं, जो खुद ही नेमाटोड को रोकने लगते हैं।
- गर्मी के मौसम में खेत की जुताई करके
- पारदर्शी प्लास्टिक शीट से ढक दें
- केले की फसल लेने के बाद 3 महीने तक खेत खाली छोड़ दें
- इससे तेज गर्मी में नेमाटोड और उनके अंडे मर जाते हैं।
- रसायन का सही और सीमित उपयोग। रसायन असरदार होते हैं, लेकिन इन्हें सोच-समझकर ही इस्तेमाल करें।
- टिशू कल्चर पौधे लगाते समय कार्बोफ्यूरान 10 ग्राम प्रति पौधा इस्तेमाल करें। तीसरे और पांचवें महीने 20 ग्राम प्रति पौधा इस्तेमाल करें। अगर सकर से रोपाई कर रहे हैं, तो 2 ग्राम कार्बोफ्यूरान प्रति सकर काफी रहता है।