Agri Business में किसान सबसे ज़्यादा कहाँ फँसते हैं, क्या हैं वो सात कारण?
Malvika Lal | Oct 12, 2026, 17:54 IST
कृषि में सफलता पाने के लिए सही योजना और तैयारी अत्यंत महत्वपूर्ण है। कई किसान सब्सिडी को तुरंत मिलने वाले पैसे समझते हैं, जो कि गलत है। इसके अलावा, उपयुक्त खरीदारों की पहचान करना भी आवश्यक है ताकि वित्तीय घाटे से बचा जा सके। पहले वर्ष के लिए आवश्यक खर्च का सही आकलन करना और बैंक से संपर्क साधना सफलता की ओर पहला कदम है।
क्या हैं एग्री बिजनेस को सफल बनाने के टिप्स।
गाँव में खेती के साथ कोई छोटा काम शुरू करने का सपना बहुत लोगों का होता है- मशरूम की खेती, तेल घानी, डेयरी, वर्मी कम्पोस्ट या मसाला पिसाई। सरकार की योजनाएँ भी हैं और बैंक भी लोन देते हैं। फिर भी बहुत से लोग बीच रास्ते में अटक जाते हैं। कोई बैंक के चक्कर काटता रह जाता है, कोई मशीन लगाकर ख़रीदार ढूँढता है, तो कोई पहले साल का ख़र्च नहीं निकाल पाता।
पिछले कुछ महीनों में हमने 40 से ज़्यादा एग्री बिज़नेस के सरकारी मॉडल की रिपोर्ट पढ़ीं और किसानों से उनके सवाल सुने। बार-बार वही सात वजह सामने आईं, जहाँ लोग फँसते हैं। नीचे के सभी आँकड़े इन्हीं सरकारी मॉडलों से हैं; आपके ज़िले के भाव से असली नतीजा बदलेगा।
1. सब्सिडी को "पहले मिलने वाला पैसा" समझ लेना
सबसे आम ग़लतफ़हमी यही है। PMFME, PMEGP या MIDH जैसी योजनाओं की सब्सिडी ज़्यादातर लोन से जुड़ी होती है। पहले बैंक लोन मंज़ूर करता है, काम शुरू होता है, और सब्सिडी बाद में लोन खाते में समायोजित होती है। यानी शुरुआत में पूरा पैसा लोन और अपने हिस्से से ही लगता है।
उदाहरण के लिए, KVIC मॉडल में 300 किलो बीज रोज़ाना की कोल्ड-प्रेस्ड तेल घानी लगभग ₹4.4 लाख की है। PMFME में इसकी सब्सिडी लगभग ₹1.2 लाख बनती है और अपना हिस्सा लगभग ₹44 हज़ार। यहां ₹1.2 लाख हाथ में पहले नहीं आते। इसलिए अपनी जेब का हिस्सा (आम तौर पर कुल लागत का लगभग 10%) पहले से तैयार रखें।
2. ग़लत योजना के दरवाज़े पर पहुँचना
हर काम हर योजना में नहीं आता। कई लोग मशरूम को ‘फ़ूड प्रोसेसिंग’ मानकर PMFME में फ़ाइल बनवाते हैं, जबकि सरकारी मॉडल में ऑयस्टर मशरूम (61 किलो रोज़) बाग़वानी का काम है: लागत लगभग ₹5 लाख, MIDH सब्सिडी लगभग ₹1.5 लाख और अपना हिस्सा लगभग ₹50 हज़ार।
इसी तरह AIF (कृषि अवसंरचना कोष) को लोग सब्सिडी समझ लेते हैं। AIF में पूँजी पर सब्सिडी नहीं, बल्कि ₹2 करोड़ तक के लोन पर 3% सालाना ब्याज में छूट मिलती है। 200 टन सालाना का वर्मीकम्पोस्ट यूनिट (लगभग ₹4.9 लाख) या 200 किलो प्रति घंटे की दाल मिल (लगभग ₹17.7 लाख) इसके अच्छे उदाहरण हैं। फ़ाइल बनाने से पहले यह तय करें कि आपका काम किस योजना के नियमों में सीधा बैठता है।
3. सरकारी रिपोर्ट के भाव को पत्थर की लकीर मान लेना
मॉडल रिपोर्ट अच्छी शुरुआत हैं, पर उनमें लिखे बिक्री के भाव कई बार पुराने या ज़्यादा होते हैं। बेकरी (लगभग ₹5.4 लाख) और अचार-पापड़ (लगभग ₹6.8 लाख) की रिपोर्ट में बिक्री के भाव कई कस्बों के हिसाब से ऊँचे लगते हैं। हमने कुछ ऐसे मॉडल भी देखे, जो अपने ही भाव पर तीसरे साल तक घाटा दिखाते हैं। इसलिए किसी भी रिपोर्ट को अपनाने से पहले अपने इलाक़े की मंडी में कच्चे माल का भाव और तैयार माल की बिक्री का भाव ख़ुद पूछें। हिसाब अपने भाव पर दोबारा लगाएँ।
4. पहले साल के ख़र्च का अंदाज़ा न होना
मशीन और शेड के लिए लोन मिल जाता है, पर कच्चा माल, पैकिंग, बिजली और मज़दूरी का पहले कुछ महीनों का ख़र्च (चलता पैसा या वर्किंग कैपिटल) अक्सर हिसाब से छूट जाता है। कुछ कामों में पहला साल कमज़ोर रहता है और कमाई बाद में आती है।
जैसे सरकारी मॉडल में 1 एकड़ की नर्सरी पहले साल लगभग ₹1.2 लाख का घाटा दिखाती है, और तीसरे साल लगभग ₹2.2 लाख का मुनाफ़ा। 2,000 लीटर रोज़ का दूध चिलिंग सेंटर पहले साल लगभग ₹2.5 लाख घाटे में और तीसरे साल लगभग ₹1.4 लाख मुनाफ़े में दिखता है। अगर पहले साल का यह अंतर भरने का इंतज़ाम नहीं है, तो अच्छा काम भी बीच में रुक सकता है।
5. मशीन पहले, ख़रीदार बाद में
यह शायद सबसे महँगी ग़लती है। मशरूम दो-तीन दिन ही ताज़ा रहता है, इसलिए होटल, सब्ज़ी मंडी या दुकानदार पहले तय न हों, तो माल ख़राब होता है। वर्मी कम्पोस्ट के लिए भी नर्सरी, बाग़वानी किसान या FPO जैसे ख़रीदार पहले से बात करके रखें। एक अच्छा नियम है: कम से कम दो-तीन पक्के ख़रीदारों से बात किए बिना लोन की फ़ाइल न बनवाएं।
6. सबसे बड़े ख़र्च को छोटा मान लेना
हर काम में एक ख़र्च ऐसा होता है जो पूरा मुनाफ़ा तय करता है। NABARD के मॉडल में 2 पशुओं की डेयरी लगभग ₹2 लाख की है, अपना हिस्सा लगभग ₹20 हज़ार, और पहले साल मुनाफ़ा लगभग ₹55 हज़ार। लेकिन यहाँ सबसे बड़ा ख़र्च चारा है; अपनी चारे की ज़मीन न हो, तो मुनाफ़ा जल्दी घटता है। तेल घानी में सरसों या मूँगफली का भाव, और 1,000 पक्षियों के ब्रॉयलर यूनिट (लगभग ₹4.5 लाख) में चूज़े और दाने का भाव यही भूमिका निभाते हैं। ब्रॉयलर में कंपनी के साथ अनुबंध हो तो उसकी शर्तें ध्यान से पढ़ें।
7. काग़ज़ अधूरे लेकर बैंक जाना
बहुत-सी फ़ाइलें इसलिए लौटती हैं क्योंकि प्रोजेक्ट रिपोर्ट (DPR) अधूरी होती है, या Udyam रजिस्ट्रेशन और खाने के काम में FSSAI लाइसेंस नहीं होता। बैंक अधिकारी को साफ़ दिखना चाहिए कि लागत कितनी है, पैसा कहां से आएगा, बिक्री किसे होगी और किस्त कैसे चुकेगी? साफ़ और पूरी फ़ाइल से बैंक का भरोसा बढ़ता है।
8. शुरू करने से पहले पाँच सवाल
किसान के हाथ में तीन चीज़ें हैं: सही काम चुनना, सही योजना चुनना और पूरी तैयारी के साथ बैंक जाना। ये तीन ठीक हों तो रास्ता काफ़ी आसान हो जाता है।
(मालविका लाल, Utkrishi (एल्ड्यू डिजिटल प्राइवेट लिमिटेड, पुणे) की सह-संस्थापक हैं। यह स्टार्टअप पूसा कृषि (ICAR-IARI) में RKVY-RAFTAAR के तहत इनक्यूबेटेड है।)
पिछले कुछ महीनों में हमने 40 से ज़्यादा एग्री बिज़नेस के सरकारी मॉडल की रिपोर्ट पढ़ीं और किसानों से उनके सवाल सुने। बार-बार वही सात वजह सामने आईं, जहाँ लोग फँसते हैं। नीचे के सभी आँकड़े इन्हीं सरकारी मॉडलों से हैं; आपके ज़िले के भाव से असली नतीजा बदलेगा।
1. सब्सिडी को "पहले मिलने वाला पैसा" समझ लेना
सबसे आम ग़लतफ़हमी यही है। PMFME, PMEGP या MIDH जैसी योजनाओं की सब्सिडी ज़्यादातर लोन से जुड़ी होती है। पहले बैंक लोन मंज़ूर करता है, काम शुरू होता है, और सब्सिडी बाद में लोन खाते में समायोजित होती है। यानी शुरुआत में पूरा पैसा लोन और अपने हिस्से से ही लगता है।
उदाहरण के लिए, KVIC मॉडल में 300 किलो बीज रोज़ाना की कोल्ड-प्रेस्ड तेल घानी लगभग ₹4.4 लाख की है। PMFME में इसकी सब्सिडी लगभग ₹1.2 लाख बनती है और अपना हिस्सा लगभग ₹44 हज़ार। यहां ₹1.2 लाख हाथ में पहले नहीं आते। इसलिए अपनी जेब का हिस्सा (आम तौर पर कुल लागत का लगभग 10%) पहले से तैयार रखें।
2. ग़लत योजना के दरवाज़े पर पहुँचना
हर काम हर योजना में नहीं आता। कई लोग मशरूम को ‘फ़ूड प्रोसेसिंग’ मानकर PMFME में फ़ाइल बनवाते हैं, जबकि सरकारी मॉडल में ऑयस्टर मशरूम (61 किलो रोज़) बाग़वानी का काम है: लागत लगभग ₹5 लाख, MIDH सब्सिडी लगभग ₹1.5 लाख और अपना हिस्सा लगभग ₹50 हज़ार।
इसी तरह AIF (कृषि अवसंरचना कोष) को लोग सब्सिडी समझ लेते हैं। AIF में पूँजी पर सब्सिडी नहीं, बल्कि ₹2 करोड़ तक के लोन पर 3% सालाना ब्याज में छूट मिलती है। 200 टन सालाना का वर्मीकम्पोस्ट यूनिट (लगभग ₹4.9 लाख) या 200 किलो प्रति घंटे की दाल मिल (लगभग ₹17.7 लाख) इसके अच्छे उदाहरण हैं। फ़ाइल बनाने से पहले यह तय करें कि आपका काम किस योजना के नियमों में सीधा बैठता है।
3. सरकारी रिपोर्ट के भाव को पत्थर की लकीर मान लेना
मॉडल रिपोर्ट अच्छी शुरुआत हैं, पर उनमें लिखे बिक्री के भाव कई बार पुराने या ज़्यादा होते हैं। बेकरी (लगभग ₹5.4 लाख) और अचार-पापड़ (लगभग ₹6.8 लाख) की रिपोर्ट में बिक्री के भाव कई कस्बों के हिसाब से ऊँचे लगते हैं। हमने कुछ ऐसे मॉडल भी देखे, जो अपने ही भाव पर तीसरे साल तक घाटा दिखाते हैं। इसलिए किसी भी रिपोर्ट को अपनाने से पहले अपने इलाक़े की मंडी में कच्चे माल का भाव और तैयार माल की बिक्री का भाव ख़ुद पूछें। हिसाब अपने भाव पर दोबारा लगाएँ।
4. पहले साल के ख़र्च का अंदाज़ा न होना
मशीन और शेड के लिए लोन मिल जाता है, पर कच्चा माल, पैकिंग, बिजली और मज़दूरी का पहले कुछ महीनों का ख़र्च (चलता पैसा या वर्किंग कैपिटल) अक्सर हिसाब से छूट जाता है। कुछ कामों में पहला साल कमज़ोर रहता है और कमाई बाद में आती है।
जैसे सरकारी मॉडल में 1 एकड़ की नर्सरी पहले साल लगभग ₹1.2 लाख का घाटा दिखाती है, और तीसरे साल लगभग ₹2.2 लाख का मुनाफ़ा। 2,000 लीटर रोज़ का दूध चिलिंग सेंटर पहले साल लगभग ₹2.5 लाख घाटे में और तीसरे साल लगभग ₹1.4 लाख मुनाफ़े में दिखता है। अगर पहले साल का यह अंतर भरने का इंतज़ाम नहीं है, तो अच्छा काम भी बीच में रुक सकता है।
5. मशीन पहले, ख़रीदार बाद में
यह शायद सबसे महँगी ग़लती है। मशरूम दो-तीन दिन ही ताज़ा रहता है, इसलिए होटल, सब्ज़ी मंडी या दुकानदार पहले तय न हों, तो माल ख़राब होता है। वर्मी कम्पोस्ट के लिए भी नर्सरी, बाग़वानी किसान या FPO जैसे ख़रीदार पहले से बात करके रखें। एक अच्छा नियम है: कम से कम दो-तीन पक्के ख़रीदारों से बात किए बिना लोन की फ़ाइल न बनवाएं।
6. सबसे बड़े ख़र्च को छोटा मान लेना
हर काम में एक ख़र्च ऐसा होता है जो पूरा मुनाफ़ा तय करता है। NABARD के मॉडल में 2 पशुओं की डेयरी लगभग ₹2 लाख की है, अपना हिस्सा लगभग ₹20 हज़ार, और पहले साल मुनाफ़ा लगभग ₹55 हज़ार। लेकिन यहाँ सबसे बड़ा ख़र्च चारा है; अपनी चारे की ज़मीन न हो, तो मुनाफ़ा जल्दी घटता है। तेल घानी में सरसों या मूँगफली का भाव, और 1,000 पक्षियों के ब्रॉयलर यूनिट (लगभग ₹4.5 लाख) में चूज़े और दाने का भाव यही भूमिका निभाते हैं। ब्रॉयलर में कंपनी के साथ अनुबंध हो तो उसकी शर्तें ध्यान से पढ़ें।
7. काग़ज़ अधूरे लेकर बैंक जाना
बहुत-सी फ़ाइलें इसलिए लौटती हैं क्योंकि प्रोजेक्ट रिपोर्ट (DPR) अधूरी होती है, या Udyam रजिस्ट्रेशन और खाने के काम में FSSAI लाइसेंस नहीं होता। बैंक अधिकारी को साफ़ दिखना चाहिए कि लागत कितनी है, पैसा कहां से आएगा, बिक्री किसे होगी और किस्त कैसे चुकेगी? साफ़ और पूरी फ़ाइल से बैंक का भरोसा बढ़ता है।
8. शुरू करने से पहले पाँच सवाल
- मेरे काम के लिए सही योजना कौन-सी है, और वह सब्सिडी देती है या ब्याज में छूट?
- अपना हिस्सा और पहले छह महीने का चलता पैसा कहाँ से आएगा?
- मेरे ज़िले के भाव पर हिसाब बैठता है या नहीं?
- मेरे दो-तीन पक्के ख़रीदार कौन हैं?
- मेरी DPR, Udyam और ज़रूरी लाइसेंस तैयार हैं या नहीं?
किसान के हाथ में तीन चीज़ें हैं: सही काम चुनना, सही योजना चुनना और पूरी तैयारी के साथ बैंक जाना। ये तीन ठीक हों तो रास्ता काफ़ी आसान हो जाता है।
(मालविका लाल, Utkrishi (एल्ड्यू डिजिटल प्राइवेट लिमिटेड, पुणे) की सह-संस्थापक हैं। यह स्टार्टअप पूसा कृषि (ICAR-IARI) में RKVY-RAFTAAR के तहत इनक्यूबेटेड है।)