women's Day 2026: महिलाओं का काम, दिखता है, गिना नहीं जाता, समस्या है छिपी बेरोजगारी
Gaon Connection | Feb 21, 2026, 18:14 IST
भारतीय समाज में Hidden Unemployment एक गहरी समस्या बन चुकी है। कड़ी मेहनत करने वाले लोग अक्सर अपनी क्षमताओं का पूरा इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं। खासकर, महिलाओं और LGBTQ+ समुदाय के लोग अधिक प्रभावित हैं। क्यों इन वर्गों का लेबर गिना नहीं जाता? इसके पीछे प्रमुख कारण कौनसे हैं?
hidden unemployment
Women's Day 2026 पर विशेष: भारतीय समाज में एक बड़ी समस्या है छिपी हुई बेरोज़गारी। इसका मतलब यह नहीं कि लोग बिल्कुल काम नहीं कर रहे, बल्कि यह कि वे काम तो कर रहे हैं, लेकिन उस काम से न तो उनकी पूरी काबिलियत इस्तेमाल हो रही है और न ही उसका सही आर्थिक फायदा मिल रहा है। यह समस्या खासकर महिलाओं, क्वीर और ट्रांस समुदाय के बीच बहुत ज़्यादा दिखती है। अक्सर ऐसा होता है कि लोग काम में लगे हुए दिखते हैं, लेकिन अगर वे काम न करें तो भी कुल उत्पादन पर ज़्यादा फर्क नहीं पड़ेगा। यही छिपी हुई बेरोज़गारी है। यह कोई सिर्फ आंकड़ों की बात नहीं, बल्कि हमारे समाज की सोच से जुड़ी समस्या है जहाँ पितृसत्ता, लैंगिक भेदभाव और सामाजिक बहिष्कार गहराई से जमे हुए हैं।
जब तक हम श्रम को सम्मान की नजर से नहीं देखेंगे और अपने आसपास के काम को सही मायने में नहीं समझेंगे, तब तक छिपी हुई बेरोज़गारी हमारे समाज में यूं ही बनी रहेगी। एच. वागीशन और गेडम कमलाकर (2025) की शोध रिपोर्ट बताती है कि भारत में महिलाओं की श्रम भागीदारी पिछले दो दशकों में लगभग 10 प्रतिशत गिरकर 29 प्रतिशत से भी नीचे आ गई है। इसका मूल कारण यह है कि 72 प्रतिशत महिलाएँ अवैतनिक कामों में लगी हैं।
भारत में ज़्यादातर महिलाएँ घर, खेत और परिवार से जुड़े काम करती हैं। वे सुबह से रात तक लगी रहती हैं पशुओं की देखभाल, खाना बनाना, बच्चों और बुज़ुर्गों की जिम्मेदारी, खेतों में काम लेकिन इसके बदले न तो उन्हें वेतन मिलता है और न ही उन्हें “कामकाजी” माना जाता है। हमारी आम सोच यह है कि जिस काम के पैसे मिलें, वही काम है। लेकिन क्या घर चलाना, बच्चों को संभालना या परिवार का पेट भरने में योगदान देना काम नहीं है? यही सोच महिलाओं के श्रम को अदृश्य बना देती है।
गाँवों में तो हालत और साफ दिखती है। पुरुष शहरों में काम की तलाश में चले जाते हैं और खेतों की ज़िम्मेदारी महिलाओं पर आ जाती है। बीज बोना, कटाई, पशुपालन—सब कुछ महिलाएं करती हैं, लेकिन ज़मीन पुरुषों के नाम होती है और “किसान” वही कहलाता है। अगर महिलाएं खेत का काम छोड़ दें, तो खेती ठप हो जाएगी, फिर भी उनका नाम सरकारी आंकड़ों में नहीं आता। एक आम ग्रामीण महिला दिन के 16–18 घंटे काम करती है, लेकिन रिकॉर्ड में वह सिर्फ “गृहिणी” लिखी जाती है। यही छिपी हुई बेरोज़गारी है। अदृश्य श्रम की भी कीमत तय हो क्या होगा। महिलाएं पुरुषों से तीन गुना ज़्यादा देखभाल का काम करती हैं—जिसे अर्थव्यवस्था में गिना ही नहीं जाता। अगर इस काम को भी मान्यता मिले और महिलाओं को बराबरी से रोज़गार मिले, तो देश की अर्थव्यवस्था को बहुत बड़ा फायदा हो सकता है।
छिपी हुई बेरोज़गारी सिर्फ महिलाओं तक सीमित नहीं है। क्वीर और ट्रांस समुदाय के लिए यह समस्या और भी दर्दनाक है। पढ़े-लिखे और काबिल होने के बावजूद, भेदभाव के कारण उन्हें औपचारिक नौकरियां नहीं मिलतीं। कई लोग मजबूरी में परिवार के साथ रहकर दुकान पर बैठ जाते हैं या खेत में हाथ बंटाते हैं। यह काम उनकी पसंद या हुनर के मुताबिक नहीं होता, बस इसलिए करना पड़ता है क्योंकि बाहर की दुनिया उन्हें अपनाने को तैयार नहीं होती। उनका श्रम परिवार के लिए तो उपयोगी हो सकता है, लेकिन उनके अपने सपनों को बांध देता है। जब समाज रोज़गार के रास्ते बंद कर देता है और लोग भीख मांगने या यौन कार्य जैसे कामों की ओर धकेल दिए जाते हैं, तो यह भी बेरोज़गारी और अल्प रोज़गार का ही एक रूप है।
पितृसत्ता सिर्फ महिलाओं और क्वीर समुदाय को ही नुकसान नहीं पहुंचाती, बल्कि पुरुषों पर भी भारी बोझ डालती है। समाज ने पुरुष की एक ही पहचान बना दी है—कमाने वाला। बेरोज़गार कहलाने की शर्म से बचने के लिए कई युवा पुरुष पारिवारिक खेतों या दुकानों में ऐसे काम करते रहते हैं, जिनकी वहां कोई खास ज़रूरत नहीं होती। वे जानते हैं कि वे ज़्यादा उपयोगी नहीं हैं, लेकिन “खाली” दिखने से बेहतर यही समझते हैं। इससे न उन्हें संतोष मिलता है और न अपनी पसंद का करियर चुनने की आज़ादी।
भारत में जाति के बिना श्रम की बात अधूरी है। बहुत बड़ी संख्या में दलित और बहुजन परिवारों के पास अपनी ज़मीन नहीं है। उन्हें दूसरों के खेतों में मजदूरी करनी पड़ती है। वहां जरूरत से ज़्यादा लोग काम करते हैं, फिर भी उन्हें हटाया नहीं जाता—यही छिपी हुई बेरोज़गारी है। दूसरी ओर, ऊंची जातियों में “इज्जत” के नाम पर महिलाओं को घर तक सीमित कर दिया जाता है। वे घर संभालती हैं, लेकिन इसे काम नहीं माना जाता। इस तरह जाति और पितृसत्ता मिलकर महिलाओं को छिपी हुई बेरोज़गारी में धकेल देती हैं।
छिपी हुई बेरोज़गारी सिर्फ आर्थिक समस्या नहीं है, यह सम्मान और इंसान होने की गरिमा का सवाल है। जब कोई दिन-रात काम करे और फिर भी उसे कामकाजी न माना जाए, तो यह बहुत बड़ी नाइंसाफी है। इसे बदलने के लिए आने वाले women's Day 2026 में इन समुदायों के लिए जरूरी पहलें हो सकती है जैसे-
महिलाओं का काम, दिखता है, गिना नहीं जाता
छिपी हुई बेरोज़गारी
जब तक हम श्रम को सम्मान की नजर से नहीं देखेंगे और अपने आसपास के काम को सही मायने में नहीं समझेंगे, तब तक छिपी हुई बेरोज़गारी हमारे समाज में यूं ही बनी रहेगी। एच. वागीशन और गेडम कमलाकर (2025) की शोध रिपोर्ट बताती है कि भारत में महिलाओं की श्रम भागीदारी पिछले दो दशकों में लगभग 10 प्रतिशत गिरकर 29 प्रतिशत से भी नीचे आ गई है। इसका मूल कारण यह है कि 72 प्रतिशत महिलाएँ अवैतनिक कामों में लगी हैं।
भारत में ज़्यादातर महिलाएँ घर, खेत और परिवार से जुड़े काम करती हैं। वे सुबह से रात तक लगी रहती हैं पशुओं की देखभाल, खाना बनाना, बच्चों और बुज़ुर्गों की जिम्मेदारी, खेतों में काम लेकिन इसके बदले न तो उन्हें वेतन मिलता है और न ही उन्हें “कामकाजी” माना जाता है। हमारी आम सोच यह है कि जिस काम के पैसे मिलें, वही काम है। लेकिन क्या घर चलाना, बच्चों को संभालना या परिवार का पेट भरने में योगदान देना काम नहीं है? यही सोच महिलाओं के श्रम को अदृश्य बना देती है।
गाँवों में तो हालत और साफ दिखती है। पुरुष शहरों में काम की तलाश में चले जाते हैं और खेतों की ज़िम्मेदारी महिलाओं पर आ जाती है। बीज बोना, कटाई, पशुपालन—सब कुछ महिलाएं करती हैं, लेकिन ज़मीन पुरुषों के नाम होती है और “किसान” वही कहलाता है। अगर महिलाएं खेत का काम छोड़ दें, तो खेती ठप हो जाएगी, फिर भी उनका नाम सरकारी आंकड़ों में नहीं आता। एक आम ग्रामीण महिला दिन के 16–18 घंटे काम करती है, लेकिन रिकॉर्ड में वह सिर्फ “गृहिणी” लिखी जाती है। यही छिपी हुई बेरोज़गारी है। अदृश्य श्रम की भी कीमत तय हो क्या होगा। महिलाएं पुरुषों से तीन गुना ज़्यादा देखभाल का काम करती हैं—जिसे अर्थव्यवस्था में गिना ही नहीं जाता। अगर इस काम को भी मान्यता मिले और महिलाओं को बराबरी से रोज़गार मिले, तो देश की अर्थव्यवस्था को बहुत बड़ा फायदा हो सकता है।
क्वीर और ट्रांस समुदाय: मजबूरी का काम
पुरुषों पर भी दबाव
जाति और बेरोज़गारी
छिपी हुई बेरोज़गारी
भारत में जाति के बिना श्रम की बात अधूरी है। बहुत बड़ी संख्या में दलित और बहुजन परिवारों के पास अपनी ज़मीन नहीं है। उन्हें दूसरों के खेतों में मजदूरी करनी पड़ती है। वहां जरूरत से ज़्यादा लोग काम करते हैं, फिर भी उन्हें हटाया नहीं जाता—यही छिपी हुई बेरोज़गारी है। दूसरी ओर, ऊंची जातियों में “इज्जत” के नाम पर महिलाओं को घर तक सीमित कर दिया जाता है। वे घर संभालती हैं, लेकिन इसे काम नहीं माना जाता। इस तरह जाति और पितृसत्ता मिलकर महिलाओं को छिपी हुई बेरोज़गारी में धकेल देती हैं।
समाधान क्या है?
- महिलाओं के घरेलू और देखभाल के काम को भी “काम” माना जाए
- क्वीर और ट्रांस समुदाय के लिए भेदभाव-विरोधी कानून सख्ती से लागू हों
- कौशल विकास और रोज़गार नीतियाँ जेंडर और पहचान के आधार पर भेदभाव न करें