ग्राम स्वराज अभियान :  क्या आपने अपने गाँव में ग्राम सभा की बैठक होते देखा है? 

ग्राम स्वराज अभियान :  क्या आपने अपने गाँव में ग्राम सभा की बैठक होते देखा है? अभी भी मूलभूत सुविधाओं से दूर हैं गाँव। 

ग्राम स्वराज इस विषय पर इससे पूर्व भी बहुत कुछ कहा जा चुका है गांधी से लेकर विनोबा तक लोहिया और जेपी ने भी ग्राम स्वराज की विस्तृत तस्वीर समाज के सामने प्रस्तुत की है। इसी अवधारणा के आधार पर 1993 में संविधान का 73वां संशोधन किया गया और सेल्फ गवर्नमेंट की परिकल्पना संविधान में समाहित की गई।

भारत के सभी राज्यों ने अपने अपने सामाजिक और भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार पंचायत राज अधिनियम और नियमावलियों का निर्माण किया। पंचायत राज व्यवस्था के अनुसार ग्राम पंचायत और ग्राम सभा 2 संवैधानिक संस्थाओं का सृजन किया गया जिसके अंतर्गत ग्राम पंचायतें कार्यपालिका और ग्राम सभा विधायिका के रूप में स्थापित की गई।ग्राम पंचायतों का निर्वाचन 5 वर्षों के लिए और ग्राम सभाएं स्थाई रूप से गठित की गई लेकिन जिन राज्यों ने ग्राम सभाओं को विधायिका का सचमुच में अधिकार दे दिया।

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उन राज्यों में ग्राम पंचायतें भ्रष्टाचार और अनियमितता से बची हुई हैं और उन राज्यों में ग्रामीण जनजीवन की गुणवत्ता देश में श्रेष्ठतम से श्रेष्ठतर की ओर बढ़ रही है।ऐसे राज्यों में जहां ग्राम सभा शासन का केंद्र है उन राज्यों में ग्रामीणों की औसत आमदनी देश के अन्य राज्यों से बेहतर है उन राज्यों में मूलभूत सुविधाएं जैसे शिक्षा चिकित्सा आवागमन मनोरंजन और सामाजिक संस्कृति उत्तम है।

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उदाहरण के लिए केरल आंध्र प्रदेश महाराष्ट्र गुजरात हाल ही के दिनों में झारखंड में भी ग्रामीण जीवन की गुणवत्ता और शासन की स्वायत्तता का उदाहरण देखने को मिला है।केंद्र में 2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार आने के बाद ग्रामों को विकसित करने के लिए विशेष योजना पर कार्य आरंभ हुआ जिसके अंतर्गत 2015 में 14वें वित्त आयोग की रिपोर्ट के आधार पर ग्राम पंचायत विकास योजना लागू की गई।

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ग्राम पंचायत विकास योजना ग्राम सभा को शक्तिशाली बनाने और सत्ता का विकेंद्रीकरण करने की दिशा में केंद्र सरकार द्वारा उठाया गया महत्वपूर्ण कदम है।अनेक राज्यों ने ग्राम पंचायत विकास योजना को लागू करने के लिए अच्छी कोशिश किए वही कुछ राज्य इस योजना में भी पलीता लगाने से बाज नहीं आ रहे।जैसे उत्तर प्रदेश प्रदेश जो एक बीमारू राज्य हैं ने ग्राम पंचायत विकास योजना को लागू करने में भारी अनियमितता बरती है।

कच्ची सड़क से गुजरने को मजबूर हैं ग्रामीण।

वर्ष 2016 विधानसभा चुनाव से पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री ने पूरा योजना इसलिए लागू नहीं होने दी की उन्हें डर था की यदि ग्रामीण क्षेत्रों में ग्राम पंचायत विकास योजना के आधार पर विकास आरंभ हो गया तो आगामी विधानसभा चुनाव में इसका लाभ मोदी सरकार को मिल जाएगा। क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करने वाले नागरिकों के जीवन में बदलाव का श्रेय मोदी सरकार को मिल जाएगा मात्र इस राजनीतिक लालच के कारण ग्राम पंचायत विकास योजना को उत्तर प्रदेश में ठीक से लागू नहीं किया गया।

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इसी तरह से ग्रामीण क्षेत्रों मैं मूलभूत सुविधाओं सहित जीवन की गुणवत्ता में सुधार लाने वाली सभी योजनाएं राजनीतिक पार्टियों के आपसी प्रतिद्वंदिता के जाल में फंसकर दम तोड़ती रही हैं।केंद्रीय पंचायत राज मंत्रालय की समीक्षा बैठकों में उत्तर प्रदेश की ओर से भागीदारी करने वाले शासन के उच्च अधिकारी यह दावा करते हैं की उत्तर प्रदेश में ग्राम पंचायत विकास योजना को लागू करने वाली व्यवस्था देश में सबसे आगे है। जबकि 14वें वित्त आयोग द्वारा दी गई गाइड लाइन के अनुसार ग्राम पंचायतों को संक्रमित की गई।

पता नहीं गाँवों के कब आएंगे अच्छे दिन।

कुल धनराशि का 10% क्षेत्र पंचायत स्तर पर प्रशासनिक और तकनीकी सहायता के लिए उपलब्ध कराई जाती है इस धनराशि का उपयोग ही नहीं किया गया। यहां ध्यान देना होगा किसी धनराशि से न्याय पंचायत स्तरीय क्लस्टरों पर कंप्यूटर और अन्य सुविधाएं निर्मित करने का प्रावधान है। किंतु उत्तर प्रदेश के किसी भी जनपद में न्याय पंचायत स्तरीय क्लस्टरों के निर्माण का कार्य आज तक नहीं किया गया। वहीं क्षेत्र पंचायत कार्यालय पर अवर अभियंताओं अकाउंटेंट और कंप्यूटर ऑपरेटरों की नियुक्ति की दिशा में भी शासन द्वारा कोई कार्यवाही नहीं की गई।

उपरोक्त तथ्यों के आधार पर यह प्रश्न उठता है कि यदि ग्राम पंचायत विकास योजना निर्माण के लिए न्याय पंचायत और क्षेत्र पंचायत स्तर पर तकनीकी और प्रशासनिक सहायता उपलब्ध कराने वाली व्यवस्था का निर्माण ही नहीं किया गया। तब भारत सरकार के सामने प्रदेश के उच्चाधिकारियों द्वारा किस आधार पर देश में सर्वोत्तम प्रदर्शन करने वाला दावा किया जाता है।वास्तव में सच्चाई यह है की ग्राम पंचायतों में विकास की योजनाएं तैयार करने का घोटाला बड़े पैमाने पर किया जा रहा है।

ग्राम प्रधान और पंचायत सचिव सहित चुनिंदा अधिकारी मनमाने ढंग से प्रस्ताव का निर्माण करा लेते हैं। और फर्जी अंगूठा और दस्तखत करवा कर इन प्रस्तावों को अनुमोदित भी करवा देते हैं। ग्राम सभा की बैठकों के नाम पर जहां फर्जीवाड़ा होता है वही वार्ड सभाओं का अस्तित्व ही नहीं है। इस फर्जीवाड़े के पीछे अरबों खरबों का घोटाला छुपा हुआ है मनमाने प्रस्ताव तैयार करके ग्राम सभाओं को मूलभूत सुविधाओं के निर्माण का जो भ्रम पैदा किया जाता है उस में भारी कमीशनखोरी और रिश्वतखोरी का मकड़जाल फैला दिया गया है।

14वें वित्त आयोग के सिफारिशों के आधार पर वर्ष 2015-16 में केंद्र सरकार द्वारा जारी की गई धनराशि का उपयोग सोलर स्ट्रीट लाइटों के स्थापना के लिए किया गया। जबकि इसका प्रयोग पेयजल जल निकासी स्वच्छता शिक्षा सहित अनेक क्षेत्रों में किया जाना था लेकिन सोलर लाइटों के स्थापना में अधिकतम धनराशि खर्च करना अपने आप में घोटाले का उदाहरण है। वस्तुतः उत्तर प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में सोलर स्ट्रीट लाइटों में भारी गड़बड़ी की गई हैं।

जरुरतमंदों ने नहीं मिल रहा है उनका हक।

जिस गुणवत्ता की स्ट्रीट लाइटें लगाई गई है उसके लिए पंचायतों ने रुपए 21800 की दर से भुगतान किया है। जबकि इसी गुणवत्ता की स्ट्रीट लाइटें खुले बाजार में मात्र 12000 में उपलब्ध है इस पर भी 2 साल की गारंटी भी दी जाती है वही पंचायतों द्वारा लगाई गई स्ट्रीट लाइटें या तो खराब पड़ी हैं या उनका पावर बैकअप 2 से 3 घंटे का ही बचा है।12000 की स्ट्रीट लाइटें 22000 में लगाना केंद्र सरकार के द्वारा जारी की गई धन राशि की खुली लूट है इसके शिकायतें अनेक स्तर पर करने के बावजूद कोई कार्यवाही ना किया जाना इस लूट में शामिल अधिकारियों को अपराधी साबित करने के लिए पर्याप्त उदाहरण है।वास्तव में 14वें वित्त आयोग की गाइड लाइन के अध्याय 3 धारा 2 के बिंदु संख्या 9 में जो व्यवस्था दी गई है यदि उसी का ठीक से अनुपालन करा दिया जाता तो ग्राम सभा को वास्तविक रुप से शासन का अधिकार मिल गया होता।

इस धारा में वार्ड सभाओं के अंतर्गत वार्ड के सदस्यों द्वारा वार्ड में रहने वाले नागरिकों की आवश्यकताएं मांगों और जरूरतों को निर्धारित प्रारूप में भरकर पंचायत सचिव को सौंपा जाना ग्राम पंचायत की समितियां की बैठकों में वार्ड सभा द्वारा प्राप्त प्रस्तावों को सूचीबद्ध किया जाना ग्राम पंचायत की बैठकों में उनका प्राथमिकी करण किया जाना और ग्राम सभा की बैठकों में प्रस्ताव को स्वीकृति किराया जाना प्रावधानित है। किंतु उत्तर प्रदेश के 59,000 ग्राम पंचायतों में से किसी भी ग्राम पंचायत में यह प्रक्रिया नहीं की जाती है।

इसी कारण आगामी 24 अप्रैल को पंचायत राज दिवस जो पूरे देश में धूमधाम से मनाया जाएगा। यह ध्यान में रखना होगा की गांव की सत्ता गांव के लोगों के हाथों में देने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा जितने भी प्रयास किए जा रहे हैं। उनका ईमानदारी के साथ क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जाए अन्यथा यह सत्ता प्रशासनिक अधिकारियों के हाथों में जब तक रहेगी गांव का समुचित और समग्र विकास असंभव है।

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