संवाद

इस लेख को पढ़कर जो रोएगा, पछताएगा

रवीश कुमार

जबसे किसी ने बताया है कि पूरे भारत में सिर्फ 57 लोग ऐसे हुए हैं जिन पर सरकारी बैंकों का 85,000 करोड़ उधार है, तब से मैं ख़ुद को कोस रहा हूं। ये तो वो लोग हैं जिन्होंने 500 करोड़ से कम का लोन लेना अपनी शान के ख़िलाफ़ माना। मने अगर बैंक का लोन लेकर चपत ही होना है तो 500 करोड़ से कम लेकर क्या भागें। दशकों से ये बैंक अपनी वसूली नहीं कर पा रहे हैं। लिहाज़ा दशकों से सही चंद लोग हज़ारों करोड़ बैंक का पैसा लेकर चपत होते जा रहे हैं। कोई तीसरी परेशान आत्मा है कि बैंक इनसे पैसे नहीं ले रहे हैं। वो जाकर केस कर दे रहा है। पैसा नहीं मिल रहा है। दोनों पक्षों को वकील मिल जा रहे हैं। अरबपति क़र्ज़दार हैं ये। किसी ने कहा था कि बैंक से लोन लो तो कम से कम सौ करोड़ का लो। बैंक वाला वसूल नहीं पाएगा। पचास साठ का लाख का लोन तो वो बाउंसर से पिटवा पिटवा कर ले लेगा।

इन्हीं जागरूक मुकदमेबाजों के कारण अदालत को पूछना पड़ रहा है कि कौन लोग हैं जो पचासी हज़ार करोड़ लेकर भी नहीं दे रहे हैं, इनका नाम क्यों न पब्लिक को बता दें। क्यों बता दें? क्या पब्लिक पैसे वसूलेगी? जब सरकार वसूल नहीं सकी, बैंक नहीं सके तो पब्लिक जानकर क्या कर लेगी? अरबपति क़र्ज़दारों के घर जाकर घड़े फोड़ेगी? ये भारतीय समाज है। लोग ऐसे क़र्ज़दारों के यहां रिश्ता जोड़ने पहुंच जाएंगे। इससे भी ज़्यादा ख़ुशी की बात ये है कि इन 57 लोगों में से सिर्फ एक ही विदेश भागा है। इनका नाम विजय माल्या है और सुप्रीम कोर्ट को नाम भी मालूम है। क्या हो गया ? बाकी 56 यहीं भारत में ही हैं। उनको पता है कि जब भागने से भी बैंक वापस नहीं ले सकते, तो क्यों न भारत में ही रहे। यहां रहकर भी तो वे बैंकों को लौटाने नहीं जा रहे।

भारतीय रिज़र्व बैंक ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि हुजूर इनके नाम पब्लिक को न बताएं। किसानों का नाम तो तहसील में चिपका दिया जाता है। सरकार ने रिज़र्व बैंक पर छोड़ दिया कि चलो यही बताओ, क्यों न बताएं। इतना बड़ा सवाल था कि रिज़र्व बैंक को सोचने का टाइम भी दिया गया। चुनाव होता तो जरूर कोई नेता कहता कि जनता के पैसे दो वरना जनता को नाम बता देंगे। बैंक को भले न पैसे मिलते लेकिन नेताजी को चुनाव के लिए चंदे तो मिल ही जाते। लाखों करोड़ का ये उधार उल्टा बैंकों पर उधार हो गया है। विजय माल्या अभी तक भारत नहीं आया। दाऊद की तरह लाया ही जा रहा है। बीच में जब पाकिस्तान से सब ठीक था, केक वेक खाया जा रहा था तब टीवी चैनलों ने कितनी ख़बरें चलाई कि पाकिस्तान दाऊद देने वाला है।

जब से ये ख़बर सुनी है, मारे ख़ुशी के दफ़्तर नहीं गया। 57 लोग मिलकर 85000 करोड़ लेकर यहां भारत में आराम से रह रहे हैं। अगर ये सभी किसान होते तो अकेला तहसीलदार इनसे वसूल लाता। पॉज़िटिव बात ये है कि इन 57 में से किसी ने आत्महत्या नहीं की है। मेरी राय में सरकार को इन्हें ब्रांड अम्बेसडर बनाकर किसानों के बीच ले जाना चाहिए। ये लोग किसानों से कहें कि हम 500 करोड़ का क़र्ज लेकर ख़ुश हैं। नहीं देकर भी ख़ुश हैं। खुदकुशी नहीं कर रहे हैं। एक आप लोग हैं जो दस लाख के लिए आत्महत्या कर लेते हैं। सरकार को कानून बनाकर किसानों और होम लोन वालों को ‘विलफुल डिफाल्टर’ बनने का सुनहरा मौक़ा देना चाहिए। भाई फ़सल डूब गई, नौकरी चली गई तो कहां से क़र्ज देंगे।

गूगल कीजिए। वित्त मंत्री के कितने बयान मिलेंगे कि बैंक आज़ाद हैं पैसे वसूलने के लिए। उन्हें किसी से डरने की ज़रूरत नहीं है। वित्तमंत्री की दी हुई आज़ादी का लाभ बैंक उठा ही नहीं पा रहे हैं। लिहाज़ा एक साल में बैंकों का सकल नॉन प्रॉफ़िट असेट यानी एनपीए दोगुना हो गया है। यानी जून 2015 में 5.4 प्रतिशत था, जून 2016 में 11.3 प्रतिशत हो गया। पैसे लौटाने के बजाए ये जल्दी से जल्दी दिवालिया हो सकें इसके लिए भी इन्हें क़ानूनी सुविधा दी गई है। हाल ही में वित्त मंत्री ने कहा कि भारत को कर चुकाने वाला समाज बनना होगा। क्यों उद्योगपतियों को क्यों नहीं कहा कि भारत को ऋण चुकाने वाला समाज बनना चाहिए। ख़ैर अब टैक्स का नाम ले लिया तो कौन बोलेगा।

ये 57 लोग ही चाहें तो लाखों भारतीय किसानों का क़र्ज माफ़ कर सकते हैं। दो तरह से। एक तो इसी पैसे से किसानों की मदद कर दें या फिर किसानों को आइडिया बता दें कि बैंकों का क़र्ज कैसे पचाया जाता है। सोचिये अगर भारतीय किसान 500 न सही 100 करोड़ का क़र्ज़ लेकर पचा ले तो गाँव गाँव में अमीरी आ जाएगी। जो तुरंत लोन लेने चला जाएगा वो राज करेगा।

(लेखक एनडीटीवी के सीनियर एग्जीक्यूटिव एडिटर हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)