लोकतंत्र को प्रभावित करने वाले निर्णय  

लोकतंत्र को प्रभावित करने वाले निर्णय  भारत लोकतंत्र को प्रभावित करने वाले निर्णय ।

बहुत बार यह विचार सामने आ चुका है कि क्या लोकतंत्र सभ्य, उदार और नैतिक है जिसमें लोकल्याण, पारदर्शिता और जवाबदेही के अतिरिक्त किसी चीज के लिए जग नहीं है? यदि लोकतंत्र वास्तव में ऐसा है तो फिर ब्रिटेन को सारी दुनिया पर अपनी हुकूमत स्थापित नहीं करनी चाहिए थी। इंदिरा गांधी को अपने देश में आपात की घोषणा नहीं करनी चाहिए थी?

आज जब हमारे देश की सत्ता नरेन्द्र मोदी के हाथ में है, जो यह दावा करते हैं कि उन्होंने यह सफर एक चाय बेचने वाले के घर से 7 रेसकोर्स (अब 7 लोककल्याण मार्ग) तक तय किया, तब फिर उन प्रश्नों का उठना जैसे इंदिरा गांधी के काल को लेकर उठते आए हैं, कुछ असहजता का एहसास दिला जाता है। क्या वास्तव में कुछ ऐसा घटित हो रहा है या फिर बेवजह ही सवाल उठाए जो रहे हैं?

दरअसल कुछ चिंतक एवं संविधानवेत्ता सरकार द्वारा अपनाए जा रहे तरीकों को लेकर प्रश्न उठाते हुए दिख रहे हैं क्योंकि उनकी दृष्टि में लोकतंत्र की समृद्धता और मजबूती के लिहाज से वे तरीके हितकर नहीं हैं। ऐसे में एक सवाल यह भी उठता है कि फिर देश के लोग ऐसे सवालों को लेकर एक बड़ा दायरा निर्मित क्यों नहीं करते?

पिछले दिनों प्रख्यात न्यायविद् फली एस नरीमन सहित जाने माने नागरिकों के एक समूह ने उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी को पत्र लिख कर वित्त विधेयक 2017 को धन विधेयक के रूप में वर्गीकृत किए जाने को लेकर चिंता जाहिर की। पत्र में कहा गया है कि वित्त विधेयक 2017 में कई कानूनों में करीब 40 संशोधन शामिल हैं और न केवल कई कानूनों के लिए इसके दूरगामी परिणाम होंगे बल्कि इनका असर भारतीय लोकतंत्र की प्रकृति और संविधान पर भी पड़ेगा।

सवाल यह उठता है कि केन्द्र सरकार द्वारा वित्त विधेयक की प्रकृति वाले विधेयकों को धन विधेयक के रूप में पेश कर उसे राज्य सभा में बिना बहस के पारित करवा लेना कितना उपयुक्त है? उल्लेखनीय है कि 29 मार्च को जहां लोकसभा में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) विधेयक पारित कराया गया, वह भी धन विधेयक है और राज्यसभा में वित्त विधेयक 2017 पास कराया गया, वह भी धन विधेयक ही है। सीधी सी बात यह है कि यदि सरकार इन्हें धन विधेयक के रूप में लायी है तो इसका मकसद यही है कि उन्हें राज्यसभा में पारित कराने की बाध्यता न रह जाए और सरकार मनमाने फेरबदल करने में कामयाब हो जाए। तो यह मान लें कि सरकार बहस से डरती है?

जीएसटी बिल के बाद धन विधेयक के रूप में पेश किए गये वित्त विधेयक 2017 को लोकसभा के बाद राज्यसभा की भी स्वीकृति मिल गयी है। चूंकि यह एक धन विधेयक था इसलिए राज्यसभा के पास इसे ठुकराने और इसमें संशोधन करने की शक्ति ही नहीं थी। चूंकि राज्य सभा में भारतीय जनता पार्टी एवं उसके सहयोगी दलों को बहुमत हासिल नहीं है इसलिए सरकार ने इस संवैधानिक प्रावधान को हथियार बनाकर अपना उद्देश्य पूरा कर लिया। हालांकि वित्त विधेयक 2017 में राज्यसभा ने कुछ संशोधन सुझाए थे लेकिन लोकसभा ने उन्हें खारिज कर दिया।

वित्त विधेयक के विवादित प्रावधान हैं- प्रथम: कोई भी कंपनी किसी भी राजनीतिक पार्टी को गुप्त दान दे सकती है। विधेयक द्वारा कंपनियों द्वारा पार्टियों को चंदा दिए जाने की ऊपरी सीमा भी खत्म कर दी गई है। द्वितीय: वित्त विधेयक 2017 से केंद्र सरकार को कई प्राधिकरणों (ट्राइब्यूनलों) के चेयरपर्सन और सदस्यों को हटाने, स्थानांतरित करने और नियुक्त करने का अधिकार मिल गया है। तृतीय विधेयक के अनुसार पैन कार्ड बनवाने और इनकम टैक्स रिटर्न भरने के लिए आधार संख्या को आवश्यक बना दिया गया है।

पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर नरेन्द्र मोदी सरकार से बड़ी उम्मीद की जा रही थी, लेकिन वित्त विधेयक में कम्पनियों की ओर से होने वाले पॉलिटिकल फंडिंग सम्बंधी जो परिवर्तन किया गया है, उस पर सरकार का तर्क गले नहीं उतर रहा। ध्यान रहे कि अब तक यह प्रावधान था कि कम्पनियां अपने तीन वर्ष के औसत लाभ का 7.5 प्रतिशत राजनैतिक चंदा दे सकती हैं। लेकिन उन्हें इसका विवरण अपने कर रिटर्न और बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स को देना होगा। लेकिन अब सरकार ने इसे रेट्रोस्पेक्टिव यानि पूर्वप्रभावी करार दे दिया और 7.5 प्रतिशत की ऊपरी सीमा भी हटा दी।

इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकार ने कम्पनियों के लिए यह प्रावधान कर दिया है कि वे टैक्स रिटर्न के समय इस पॉलिटिकल फंडिंग से सम्बंधित जानकारी देना अनिवार्य नहीं होगा। यह कैसी पारदर्शिता है ? क्या सरकार अपने राजनीतिक दल के लिए असीमित फंडिंग की व्यवस्था इस रास्ते से करना चाह रही है? खास बात यह है कि इस कानून के मुताबिक कम्पनी अपने बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स के समक्ष भी इसका खुलासा नहीं करेगी हालांकि कम्पनी एक्ट के तहत उसकी यह बाध्यता है कि वह फंडिंग सम्बंधी निर्णय की जानकारी बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स को दे। यहां दो बातें स्पष्ट तौर पर समझ में आती हैं।

पहली यह कि कोई भी कम्पनी उस राजनीतिक दल को चंदा ज्यादा देती है जो सत्ता में होता है, हम सोच सकते हैं कि इसका तत्काल फायदा किसे होने वाला है। दूसरी यह कि अब कोई भी कम्पनी या कम्पनी मालिक जनमंच से घोषणा कर देगा कि वह देश सेवा के लिए अपनी कम्पनी की सम्पूर्ण कमाई राजनीतिक चंदे के रूप में दान कर रही/रहा है। क्या इससे क्रॉनी कैपिटल का विस्तार नहीं होगा ? हालांकि विधि आयोग और चुनाव आयोग ने सुझाव दिए हैं कि कोई भी कम्पनी यदि पॉलिटिकल फंडिंग करती है तो वह इसकी मंजूरी न केवल बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स से लेगी बल्कि इसकी जानकारी अपने शेयर धारकों को भी देनी होगी।

अब सवाल उठता है कि जब देश के आम नागरिक के लिए लेन-देनों के लिए पैन कार्ड और आधार कार्ड अनिवार्य बना दिए गये हैं, तो फिर कम्पनियों और राजनीतिक दलों के लिए इतनी गुप्त व्यवस्था क्यों ? क्या इस प्रकार गुप्त रूप की जाने वाली पॉलिटिकल फंडिंग क्या क्रॉनी कैपिटल के निर्माण के साथ-साथ सरकार पर बाजार के प्रभुत्व को मजबूत नहीं करेगी?

वित्त विधेयक 2017 में कई ट्रिब्यूनलों का विलय कर दिया गया है। उदाहरणार्थ प्रतिस्पर्धा अपील ट्रिब्यूनल जो प्रतिस्पर्धा अधिनियम 2002 के उल्लंघन के मामलों पर निर्णय देता था, उसका अब राष्ट्रीय कम्पनी कानून अपील ट्रिब्यूनल ने अधिग्रहण कर लिया है। उल्लेखनीय है कि यह ट्रिब्यूनल कम्पनी अधिनियम से जुड़े विवादों की सुनवाई करता था।

इसका सीधा सा तात्पर्य है कि इससे बड़ी कम्पनियों को ताकत मिलेगी और छोटी कम्पनियां हतोत्साहित होंगी। इसलिए इसके विलय से पूर्व संसद में जोरदार बहस की जरूरत थी ताकि देश यह जान सकता कि आखिर सच क्या है? लेकिन इसे भी धन विधेयक की श्रेणी में डालकर सरकार ने बहस के लिए स्पेस ही नहीं रखा। यहां एक बात और बेहद अहम मालूम पड़ती है। वित्त विधेयक 2017 के तहत सरकार ने आयकर खोज एवं जब्ती मामलों में आयकर अधिकारियों को अधिक शक्तियां देने के उद्देश्य से आयकर अधिनियम में संशोधन किया है।

अब आर्थिक अपराधों के मामलों में न्यायालय की स्वीकृति के बिना ही कर अधिकारियों को सम्पत्तियों को जब्त करने की अनुमति होगी। साथ ही रकम की वसूली के लिए उनकी नीलामी करने का अधिकार भी होगा। यानि संशोधन के बाद कर अधिकारी को करदाता एवं अपीलीय ट्रिब्यूनल को यह भी बातने की जरूरत नहीं होगी कि किन कारणों से आयकर तलाशी एवं जब्ती अभियान चलाया गया। नरेन्द्र मोदी ने 2014 के आम चुनावों के समय घोषणा की थी कि वे कर आतंक को समाप्त करेंगे। क्या उक्त कदम कर आतंकवाद को खत्म करने की दिशा में बढ़ रहें हैं या कर आतंकवाद को स्थापित करने की दिशा में?

(लेखक आर्थिक और राजनीतिक विशेषज्ञ हैं)

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