दिल्ली की देहरी : विपदा को ही भला मानने वाले रहीम

Nalin ChauhanNalin Chauhan   24 Oct 2017 8:46 PM GMT

दिल्ली की देहरी : विपदा को ही भला मानने वाले रहीमहिन्दी काव्य की भाषा तो बन चुकी थी, परन्तु अभी वह मार्ग खोज रही थी।

देश के प्रथम राष्ट्रपति डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद ने 8 अप्रैल 1954 को नयी दिल्ली में आयोजित रहीम समारोह में कहा था कि रहीम की कविता, हिन्दी के प्रति उनके अनुराग और साहित्यिकों के प्रति सद्भावना का स्मरण आते ही हमारा ध्यान मध्य युग में हिन्दी के विकास की ओर बरबस खिंच जाता है। उस समय हिन्दी काव्य की भाषा तो बन चुकी थी, परन्तु अभी वह मार्ग खोज रही थी। इसके साहित्य को रहीम जैसे प्रतिष्ठित और विद्वान राजसेवी का समर्थन प्राप्त हुआ। वे मुसलमान थे और अपनी साहित्य-पिपासा को शान्त करने के लिए अरबी और फारसी के समृद्ध साहित्य से असीम सामग्री पा सकते थे, किन्तु उन्होंने संस्कृत और हिन्दी सीखी और स्थानीय भाषा में उच्च कोटि की कविता की। आज इस बात से कम व्यक्ति ही वाकिफ है कि दक्षिणी दिल्ली के बारापुला पुल के ऊपर से नीचे की ओर दिखने वाली एक उपेक्षित लाल गुम्बद की इमारत अब्दुल रहीम खान की मजार है।

विडम्बना है कि इस हिन्दुस्तानी रंग के (जीनियस) रचनाकार को न जीवित रहते आदर मिला,निजामुद्दीन इलाके के सामने मथुरा रोड के पूर्व में बना यह मकबरा एक विशाल चौकोर इमारत है जो मेहराबी कोठरियों वाले एक ऊंचे चबूतरे पर बनी हुई है। हुमायूं के मकबरे की तर्ज पर बनी इस दोमंजिला इमारत की प्रत्येक दिशा में एक ऊंचे और गहरे मध्यवर्ती मेहराब और हर मंजिल में पिछली तरफ उथले मेहराब बने हैं। "दिल्ली और उसका अंचल" पुस्तक के अनुसार, इस मकबरे के अन्दर का हिस्सा विशेष रूप से अन्दरूनी छतों पर सुन्दर डिजाइनों सहित उत्कीर्ण और चित्रमय पलस्तर से अलंकृत किया गया है। बीच में दुहरे गुम्बद के आस-पास कोनों में छतरियां और बगलों के मध्य में दालान, खुले हाल, तैयार किए गए हैं।

रहीम मध्यकालीन भारत के सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहास का एक अद्भुत व्यक्तित्व है। योद्धा और कवि,दानी और सन्त भक्त का उनके व्यक्तित्व में एक अनुपम सौन्दर्य बोध है। रहीम अकबर के संरक्षक बैरम खां के बेटे थे, जिन्होंने अकबर और जहांगीर दोनों के दरबार में अपनी सेवाएं दी। 17 दिसम्बर 1556 ईस्वी में लाहौर में रहीम का जन्म हुआ था। उनके पिता जब हज करने जाते हुए सपरिवार गुजरात पहुंचे ही थे कि कत्ल कर दिये गए। उसके बाद रहीम अकबर के संरक्षण में रहे और उन्होंने अपने जीवन में काफी उतार-चढ़ाव देखे, जो कम लोगों को देखने को मिलते हैं।

इसी परिस्थिति पर रहीम ने लिखा है

विपदा ही भली, जो थोरे दिन होय

हित अनहित या जगत में, जानि परत सब कोय”

चार वर्ष के रहीम और बारह तेरह वर्ष की सलीमा बेगम को बैरम खां के साथी अहमदाबाद लाये। वहां से परिवार अकबर के पास आया। पांच वर्ष के रहीम को अकबर ने अपने संरक्षण में रख लिया तथा उचित शिक्षा दीक्षा का प्रबंध किया। मिर्जा कोकतलाश की बहिन माहबानू बेगम से रहीम का ब्याह रचवाया।

बीस वर्ष के भी न हुए थे कि गुजरात जीत लिया और वहां की सूबेदारी पायीं कई बार गुजरात में विद्रोह हुआ और हर बार विद्रोह को दबाने में रहीम कामयाब रहे। सिन्ध,अहमदनगर और कई राज्यों पर धावा बोला और विजयश्री मिली। रहीम युद्ध-वीर, कुशल राजनीतिज्ञ, योग्य शासन-प्रबंधक, दानवीर, बहुभाषाविद् तथा उच्च कोटि के कलाकार थे। 1573 ईस्वी गुजरात विजय के पश्चात् उनकी प्रशंसा में अबुल फजल अपनी किताब "मुनशियात अबुल फजल" में लिखता है, इंसाफ की बात तो यह है तुमने अद्भुत वीरता दिखाई। तुम्हारे हौंसले की बदौलत फतह संभव हो पाई। बादशाह ने प्रसन्न होकर बहुत शाबाशी और “खानखाना” की बपौती पदवी तुम्हें दी। उनके योद्धा रूप का इतना यश फैला कि अकबर के लड़के ही उनसे ईर्ष्या करने लगे। जबकि अकबर का ही एक लड़का दानियाल रहीम का दामाद था। दानियाल अतिशय मदिरा पीकर भरी जवानी में मर गया।

उनके सामने ही जहांगीर गद्दी पर बैठा। शुरू में उससे खूब छनी पर जहांगीर के पुत्रों ने बाद में रहीम को नापसन्द किया। समय ने रहीम को शाहजहां से मिलने को विवश किया। नूरजहां बेगम नाराज हो गयीं-क्योंकि वे अपने दामाद शहरयार को सत्ता सौंपने का मन बना चुकी थीं। रहीम को शाहजहां के साथ पाकर नूरजहां बेगम के क्रोध का ठिकाना नहीं रहा। नूरजहां के चक्र ने रहीम को चूर कर दिया। उनके सामने पुत्र-पौत्र मार डाले गये। रहीम ने कैद भोगी। मरने के एक साल पहले जहांगीर ने इन्हें कैद से मुक्त करवाया, पर चैन नहीं लेने दिया। शायद तभी रहीम ने लिखा...

“रहिमन ओछे नरन सो, बैर भली न प्रीत

काटे चाटे स्वान के, दोउ भांति विपरीत”

मरने के एक साल पहले जहांगीर ने इन्हें कैद से मुक्त करवाया,महावत खां के विद्रोह को दबाने के लिए रहीम को भेजा। महावत खां को परास्त कर वे दिल्ली आये और जर्जरित मन और शरीर से टूटकर बहत्तर वर्ष की अवस्था में अल्लाह को प्यारे हो गये। उसकी मृत्यु सन् 1626-27 में हुई। अलबेरूनी ओर अबुल फजल के पश्चात् रहीम ही ऐसे तीसरे मुसलमान थे, जिन्होंने देश की एक जीवित जाति (हिन्दू) के साहित्य का इतना विशद तथा सहानुभूतिपूर्ण अध्ययन किया था।

"आइन-ए-अकबरी" के अनुसार, रहीम ने योरोपीय भाषाओं-फ्रेंच, अंग्रेजी, पुर्तगाली का भी अध्ययन किया था। उन देशों से पत्र-व्यवहार में अकबर खानखानाँ की मदद लेता था। खानखानाँ रहीम के उपनाम से फारसी, अरबी, तुर्की, संस्कृत और हिन्दी में धाराप्रवाह लिखते थे और अपने समय का मैसनास माने जाते थे। उन्होंने रहीम के प्रसिद्व नाम से हिन्दी में दोहों की रचना की। इतना ही नहीं, उनके काव्य के कुछ नमूने देखने से यह पता चलता है कि अवधी और ब्रजभाषा पर उनका पूर्ण अधिकार था। इस तरह से रहीम को उस काल की सामाजिक तथा साहित्यिक प्रवृत्तियों का प्रतिनिधि कवि माना जा सकता है।

कविता के सच्चे ग्राहक होने के नाते कवियों के प्रति रहीम की उदारता इतिहास का विषय बन गयी है। कहते हैं कि उन्होंने गंग कवि को केवल एक छंद पर 36 लाख रूपया पुरस्कार दिया था। रहीम की स्वाभाविक उदारता से परिचित कवि गंग ने एक दिन दोहे में खानखाना से प्रश्न कियाः

सीखे कहां नवाज जू ऐसी देन,

ज्यों-ज्यों कर ऊंचे करो, त्यों-त्यों नीचे नैन।

खानखाना ने तुरंत इसके उत्तर में यह दोहा पढ़ाः

छेनदार कोऊ और है भेजत सो दिन-रैन

लोग भरम हम पर धरें, याते नीचे नैन

"अब्दुर्रहीम खानखाना" पुस्तक में समर बहादुर सिंह लिखते हैं कि ऐसे वातावरण में रहकर भारत की ही मिट्टी में बने रहीम के उदार दिल में हिन्दी-संस्कृत के प्रति अपार अपनापन तथा ममत्व उमड़ आना स्वाभाविक ही था। कविवर रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी पुस्तक "संस्कृति के चार अध्याय" में लिखा है कि यह समझना अधिक उपयुक्त है कि रहीम ऐसे मुसलमान हुए हैं जो धर्म से मुसलमान और संस्कृति से शुद्ध भारतीय थे। वही "रहीम ग्रंथावली" में पंडित विद्यानिवास मिश्र लिखते हैं कि रहीम जन्म से तुर्क होते हुए भी पूरी तरह भारतीय थे। भक्त कवियों जैसे उत्कट भक्ति-चेतना, भारतीयता और भारतीय परिवेश से गहरा लगाव उनके तुर्क होने के अहसास को झुठलाता सा प्रतीत होता है।

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