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लॉकडाउन के चलते प्रदूषण में आयी कमी को स्थाई रखने के लिए बनानी होगी प्रभावी नीति

लॉकडाउन के चलते प्रदूषण में आयी कमी को स्थाई रखने के लिए बनानी होगी प्रभावी नीति

वल्लभाचार्य पांडेय

कोविड-19 महामारी के चलते वैश्विक लॉक डाउन ने भले ही तमाम देशों की अर्थव्यवस्था और सामाजिक ढांचे को अस्त व्यस्त कर दिया हो, लेकिन पर्यावरण के लिए यह काल बहुत सुखद साबित हुआ है। विश्व भर से आ रहे तमाम आंकड़ों से स्पष्ट हो रहा है कि पिछले 60 दिनों में पर्यावरणीय स्थिति में जो सुधार देखने को मिला है वह पिछले 60 वर्षों में किये गये तमाम प्रयासों और जलवायु परिवर्तन के तमाम वैश्विक समझौतों के बावजूद नहीं हो सका था। क्योटो प्रोटोकॉल या पेरिस जलवायु समझौते जैसी कोशिशों का भी कोई विशेष सकारात्मक प्रभाव नहीं मिल पाया था।

प्रकृति में उपस्थित सभी प्रकार के जीवधारी अपनी वृद्धि तथा विकास के साथ साथ सुव्यवस्थित व सुचारू जीवन चक्र को चलाते हैं, इसके लिए उन्हें स्वस्थ वातावरण की आवश्यकता होती है। वातावरण का एक निश्चित संगठन होता है और उसमें सभी प्रकार के जैविक व अजैविक पदार्थ एक निश्चित अनुपात में पाए जाते हैं। ऐसे वातावरण को संतुलित वातावरण कहते हैं। वातावरण में एक या अनेक घटकों की प्रतिशत मात्र किसी कारणवश या तो अत्यधिक बढ़ जाए या कम हो जाए अथवा अन्य हानिकारक घटकों का प्रवेश हो जाए तो हमारा पर्यावरण प्रदूषित हो जाता है। पिछले पांच-छह दशकों में हुए अँधा-धुंध और अनियंत्रित विकास के क्रम में हमारे वातावरण का संतुलन लगातार बिगड़ता ही रहा है।

प्रदूषण, पर्यावरण में दूषक पदार्थों के प्रवेश के कारण प्राकृतिक संतुलन में पैदा होने वाले दोष को कहते हैं। प्रदूषक तत्व पर्यावरण को और जीव-जन्तुओं को नुकसान पहुंचाते हैं। प्रदूषण का अर्थ है: 'हवा, पानी, मिट्टी आदि का अवांछित द्रव्यों से दूषित होना', जिसका सजीवों पर प्रत्यक्ष रूप से विपरीत प्रभाव पड़ता है और पारिस्थितिक तंत्र को नुकसान द्वारा अन्य अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ते हैं। वर्तमान समय में पर्यावरणीय अवनयन का यह एक प्रमुख कारण है, इसकी वजह से मनुष्य के साथ साथ सभी जीव जन्तुओं के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। इन प्रभावों को कम करने के लिए किये जाने वाले उपायों को विश्व स्तर पर कभी इमानदारी या गम्भीरता से नहीं लागू किया जा सका। नतीजा यह हुआ कि वायु, जल, मूमि, ध्वनि और यहां तक कि समुद्र भी प्रदूषित होते चले गये. निस्संदेह इसका बुरा प्रभाव मानव जीवन के साथ साथ, वन्य जीवो और पारिस्थितिकीय तंत्र पर पड़ा।

पृथ्वी का वातावरण स्तरीय है, पृथ्वी के नजदीक लगभग 50 किलोमीटर की ऊँचाई पर स्ट्रेटोस्फीयर है जिसमें ओजोन स्तर होता है। यह स्तर सूर्यप्रकाश की पराबैंगनी किरणों को शोषित कर उसे पृथ्वी तक पहुंचने से रोकता है। आज ओजोन स्तर का तेजी से विघटन हो रहा है, दरअसल वातावरण में स्थित क्लोरोफ्लोरो कार्बन गैस के कारण ओजोन स्तर का विघटन हो रहा है। वाहनों और औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाली जहरीली गैस, रेफ्रिजरेटर और एयरकंडिशनर में से उपयोग में होने वाले फ़्रियोन और क्लोरोफ्लोरो कार्बन गैस, कूड़ा जलाने से निकलने वाली गैस, धूल के कण आदि के कारण आज हमारा वातावरण दूषित हो गया है। विभिन्न औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले कचरे को बिना शोधित किये नदियों में छोड़ा जाता है, जिससे जल प्रदूषण होता है। लोगों द्वारा कचरा फेंके जाने से भूमि (जमीन) प्रदूषण होता है।


जनवरी माह से ही पूरे विश्व में कई देशों में कोरोना संक्रमण की खबरें आने लगी थी। इसके बाद क्रमशः उन देशों में लॉक डाउन होने लगा। सड़कों पर वाहनों की संख्या 5 प्रतिशत रह गयी, तमाम औद्योगिक इकाइयों के बंद होने से उनसे होने वाला उत्सर्जन शून्य के बराबर हो गया। नगरीय कचरा निकलना काफी कम हुआ साथ ही पानी का उपयोग भी घटा, इससे नदियों में पहुंचने वाले प्रदूषक तत्वों की मात्रा में भारी कमी आयी। निर्माण और खनन कार्य बंद होने से पर्यावरण को राहत मिली। नतीजा आंकड़ों के रूप में सामने आने लगा। वायु गुणवत्ता सूचकांक सामान्य और बेहतर की स्थिति में पहुंचता हुआ दिखा। वहीं नदियों में घुलित आक्सीजन की मात्रा में अपेक्षाकृत उल्लेखनीय वृद्धि हुई। पानी घुलने वाले भारी तत्वों की मात्रा में कमी होने के कारण कई स्थान पर नदियों का जल लगभग पीने के योग्य होने के स्तर तक पहुंच गया। मात्र इन 60 दिनों में पर्यावरण सुधार की दिशा में जो सकारात्मक परिणाम मिला है वैसा अरबों डालर खर्च कर के भी प्राप्त कर पाना संभव नही था।

कोरोना महामारी के इस गंभीर संकट से जूझते हुए हमे पर्यावरण में हुए इस सकारात्मक परिवर्तन को एक उपहार और अवसर के रूप में लेना चाहिए और इससे मिले अनुभव को व्यवहार में लाकर ऐसी नीति बनानी चाहिए। जिससे हम जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए किए जा रहे परम्परागत उपायों के अलावा कुछ व्यवहारिक और स्थाई उपाय करने की दिशा में आगे बढ़ें। कुछ नीतियां वैश्विक स्तर पर बननी चाहिए और कुछ आमजन को व्यवहार में लाने के स्तर की भी। उद्योगों को अनिवार्य रूप से न्यूनतम उत्सर्जन करने वाली तकनीक के प्रयोग की बाध्यता की जानी चाहिए।

प्रत्येक महीने में दो से तीन दिन का एक साथ पूरे विश्व में लॉकडाउन किये जाने की सम्भावना तलाशी जा सकती है, इस दौरान अति आवश्यक सेवाओं और अनरवत चलने वाली इकाइयों के अलावा सभी गतिविधियों को पूरी तरह से बंद रखने के लिए एक वैश्विक समझौते पर कार्ययोजना बनाने चाहिए। बड़े शहरों में वाहन से हो रहे उत्सर्जन को कम करने के लिए सड़कों पर निजी वाहनों की संख्या कम करने के लिए ऑड-इवेन प्रणाली अनिवार्य की जानी चाहिए। यातायात के सार्वजनिक साधनों की सुलभ उपलब्धता इस दिशा में कारगर हो सकती है। जल प्रदूषण और नदियों में गिरने वाले प्रदूषित जल को शून्य के स्तर तक लाने के लिए व्यवहारिक नीति बनानी होगी। जल दोहन को कम करने और वर्षा जल के सौ प्रतिशत संरक्षण के लिए व्यवहारिक नीति बनानी होगी। नदियों पर विद्युत उत्पादन के लिए संचालित बड़ी बांध परियोजनाओं को वापस लेने के लिए समयबद्ध नीति बनाते हुए वैकल्पिक ऊर्जा के तरीके पर काम करना होगा। छोटी नदियों को सदानीरा बनाने की दिशा में प्रभावी योजना कार्यान्वित करनी होगी। शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में तालाबों, कुण्डों और अन्य जल स्रोतों को पुनर्जीवित करना होगा।


इस आलोक में यह संदर्भ देना व्यवहारिक होगा कि भारत में ग्रामीण और शहरी क्षेत्र के तालाबों पर अवैध कब्जे या पट्टे को हटाते हुए उसे साल 1952 (1359 फसली) के राजस्व रिकार्ड में अंकित क्षेत्रफल के अनुसार अतिक्रमण मुक्त करा कर पुनर्जीवित करने के लिए न्यायालय और शासन की तरफ से विभिन्न आदेश किये जाते रहे हैं। माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा हिंचलाल तिवारी बनाम कमला देवी मामले में (अपील (सिविल) 4787 / 2001) आदेश दिनांक 25 जुलाई 2001 और इसके बाद समय समय पर विभिन्न याचिकाओं में इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा भी इस सम्बन्ध में आदेश निर्गत किये हैं।

दुर्भाग्य से ये सभी आदेश सम्बंधित जिलाधिकारियों और उप जिलाधिकारियों के कार्यालय की फाइलों में पड़े रह गए। माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद में दाखिल जनहित याचिका सपोर्ट इण्डिया वेलफेयर सोसाइटी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार जनहित याचिका-1474/2019 में आदेश दिनांक 16 सितम्बर 2019 में दिए गये निर्देश के अनुसार सभी जिले के जिलाधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि वे अपने जिले में अपर जिलाधिकारी (वित्त एवं राजस्व) की अध्यक्षता में एक समिति बना कर सभी तालाबों और पोखरों की स्थिति की रिपोर्ट तैयार करें। उसे सभी प्रकार से कब्जा, अतिक्रमण, पट्टा मुक्त कराते हुए सन 1952 के राजस्व अभिलेखों में वर्णित रकबे के अनुसार स्थापित करेंगे और इसकी रिपोर्ट प्रत्येक 6 महीने पर मुख्य सचिव को भेजेंगे।

यह आदेश बहुत ही व्यापक और पूर्व के सभी निर्देशों को सम्मिलित करते हुए दिया गया है. आज के परिदृश्य में समाज के जागरूक लोगों और पर्यावरण के प्रति सचेत लोगों के लिए यह एक बड़ा अवसर है जब लगातार दबाव बनवा कर इस आदेश का अधिकतम संभव अनुपालन कराने की कोशिश की जा सकती है. उक्त जल स्रोतों के पुनर्जीवन से वर्षा के जल का अधिकतम संरक्षण हो पायेगा और भूगर्भ जल स्तर में वृद्धि होगी.

हाल में ही उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री महोदय ने आगामी जुलाई-अगस्त महीने में प्रदेश में 25 करोड़ पौधे लगाये जाने की घोषणा की, इस घोषणा का जमीनी परिणाम थोड़ा संशय वाला लगता है। जुलाई माह में पौधे लगाने के लिए पौधे तैयार करने की व्यवस्था जनवरी से ही करनी होती है जो इस वर्ष बहुत ठीक से नहीं हो पायी और लम्बी अवधि के लॉक डाउन ने आगे भी इस कार्य को नही होने दिया, इससे पौध रोपण के लिए पौधों की उपलब्धता का बड़ा संकट रहेगा, इसके कारण पौधरोपण अभियान में केवल कागजी खानापूर्ति ही हो पाएगी।

इस प्रकार हम अपने पर्यावरण का सही अर्थों में भला नही कर पाएंगे। हमें ऐसी नीति बनानी होगी, जिसमें पौधों की उपलब्धता पंचायत स्तर पर हो जाए। इच्छुक किसानों को नर्सरी का अस्थायी लाइसेंस दिया जाए साथ में उन्हें आर्थिक सहायता देकर उनसे आवश्यक संख्या में पौधे तैयार कराए जाए। इससे पौधों की गुणवत्ता और उपलब्धता दोनों हो पाएगी साथ ही स्थानीय लोगों को रोजगार भी मिलेगा।

पर्यावरणीय एवं औद्ग्योगिक नीतियों में व्यवहारिक परिवर्तन के साथ साथ कोरोना संक्रमण के चलते हुए लॉकडाउन अवधि में आमजन की जीवनचर्या और भौतिक उपभोग के तरीके में हुए परिवर्तन को आदत में शामिल करना होगा, साथ ही धरती माँ के आंचल में स्थाई रूप से सघन हरियाली का रंग भरना होगा, इससे हम विगत 60 दिन में हुए वातावरण के सकारात्मक सुधार को स्थाई रख पायेंगे और यदि प्रति माह पूरे विश्व में एक साथ 3 दिन के लॉकडाउन किये जाने जैसी कोई वैश्विक व्यवस्था निकल पायी तो हम निस्संदेह अपनी अगली पीढ़ियों को कम से कम वैसी आबोहवा दे पायेंगे जैसे हमारे पुरखों ने हमे दी थी।

(लेखक वल्लभाचार्य पाण्डेय वाराणसी में सामाजिक कार्यकर्ता हैं, ये उनके निजी विचार हैं।)

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