अम्बेडकर के संविधान में कानून पर्सनल नहीं 

अम्बेडकर के संविधान में कानून पर्सनल नहीं भारतीय संविधान के निर्माता डाॅक्टर अम्बेडकर।

भारतीय संविधान के निर्माता डाॅक्टर अम्बेडकर कानून के ज्ञाता होने के साथ एक पक्के राष्ट्रवादी थे और इतिहासकार दुर्गादास ने अपनी पुस्तक ‘इंडिया फ्राम कर्जन टु नेहरू एंड आफ्टर’ में पृष्ठ 236 पर लिखा भी है ‘ही वाज़ नेशनलिस्ट टु द कोर’। उनका एक बयान कि बकरियों की बलि चढ़ाई जाती है, शेरों की नहीं, बहुत कुछ कहता है। उनकी सबसे बड़ी चिन्ता थी भारत के दलितों और अछूतों को समाज में सम्मान दिलाना।

इस विषय पर उन्होंने किसी से समझौता नहीं किया। जब 1932 में अंग्रेजी हुकूमत ने हरिजनों के लिए अलग मतदाता सूची और मतदान व्यवस्था करके हिन्दू समाज को बांटना चाहा तो अम्बेडकर ने मदनमोहन मालवीय और गांधी जी से सहमति जताते हुए समझौता किया था। उन्होंने दलितों के हितों की रक्षा करते हुए हिन्दू एकता को बनाए रखा। गांधी जी के साथ एक समझौता किया जिसे पूना पैक्ट के नाम से जाना जाता है। अम्बेडकर हिन्दू कट्टरता से खिन्न होकर बौद्ध बन गए। वह सच्चे अर्थों में सेकुलरवादी थे।

मुहम्मद अली जिन्ना ने कहा कि मुसलमानों को अपना अलग देश चाहिए, चाहे जो कीमत चुकानी पड़े। महात्मा गांधी का निश्चित मत था कि भारत का बंटवारा किसी हालत में नहीं होना चाहिए चाहे जिन्ना को पूरे भारत का प्रधानमंत्री बनाना पड़े। अम्बेडकर की सोच थी कि बंटवारा हो लेकिन दंगे और खूनखराबा हमेशा-हमेशा के लिए समाप्त होना चाहिए।

जवाहर लाल नेहरू, मुहम्मद अली जिन्ना और वाइस राय माउन्टबेटेन ने राउन्ड टेबल काॅन्फ्रेंस में पाकिस्तान निर्माण को स्वीकार कर लिया। नेहरू पाकिस्तान देकर भी भारत में ऐसी व्यवस्था चाहते थे जैसे बंटवारा हुआ ही नहीं। कहते हैं गांधी जी बहुत नाराज हुए थे तो नेहरू ने कहा था तब बापू आप ने मुझे भेजा ही क्यों था राउन्ड टेबल काॅन्फ्रेंस में।

अम्बेडकर कुशाग्र बुद्धि और व्यावहारिक सोच के धनी थे। अम्बेडकर ने दुनिया का इतिहास देखा और पढ़ा था। दुनिया के अन्य देशों से सीख लेकर ग्रीस, टर्की और बुल्गैरिया का उदाहरण देते हुए उन्होंने बंटवारे के बाद आबादी की अदला बदली के पक्ष में विचार रखे थे। उन्होंने यह बात अपनी पुस्तक ‘पाकिस्तान आॅर दि पार्टीशन आफ इंडिया’ में लिखी है।

यदि अम्बेडकर की बात मान ली जाती तो क्या भारत में केवल गैर मुस्लिम और पाकिस्तान में केवल मुस्लिम होते। जो भी हो हिन्दू समाज ऐसा नहीं होता जिसमें गाँव के तालाब से भी पानी लेने में दलितों को कठिनाई होती जैसी स्वयं उन्हें हुई थी। समाज में छुआछूत, ऊंच-नीच और पोंगापंथी के विचार नहीं हेाते। अम्बेडकर को हिन्दू, बौद्ध, जैन और सिख धर्मों में अनेक समानताएं लगती थीं और उन्होंने स्वयं बौद्ध धर्म स्वीकार किया था।

नेहरू और जिन्ना ने मिलकर बंटवारे का जो भी फार्मूला सोचा होगा, भारत का एक चौथाई भाग पाकिस्तान को गया शायद इसलिए कि मुसलमानों की आबादी देश की एक चौथाई थी। अब तक जिन्ना की समझ में आ गया होगा कि पाकिस्तान बनने से मुसलमानों की समस्याएं हल नहीं होंगी। बंटवारे के बाद भी दंगे समाप्त नहीं हुए और जिन्ना को चिन्ता हुई कि भारत में बचे मुसलमानों की सुरक्षा कैसे हो। अम्बेडकर ने अपने त्यागपत्र के भाषण में खुलकर कहा था कि पाकिस्तान में छूट गए हिन्दुओं और विशेषकर दलितों का जिक्र करते हुए कभी भी नेहरू को न सुना, न पढ़ा।

अम्बेडकर ने बड़े स्पष्ट शब्दों में दलित समाज से कहा था कि जिन्ना को इसलिए अपना मत समझो कि वह हिन्दू विरोधी हैं। जब जरूरत होती है तब दलितों को हिन्दुआें से अलग मान लेते हैं और जब जरूरत नहीं तो उन्हें हिन्दुओं के साथ मान लेते हैं। मत समझो कि वे तुम्हारे मित्र हैं। उन पर विश्वास मत करो। अम्बेडकर ने कहा था पाकिस्तान में छूट गए दलितों से, जैसे भी हो सके भारत आ जाओ।

अम्बेडकर और नेहरू में गहरे मतभेद हो गए थे और उन्होंने 1951 में कैबिनेट से त्यागपत्र दे दिया था। त्यागपत्र देने के बाद उन्होंने जो भाषण दिया था उसमें जो कारण बताए उनमें प्रमुख थे मुसलमानों की सुरक्षा की बहुत चिन्ता और दलितों की सुरक्षा के विषय में चिन्ता न होना, नेहरू सरकार में दलितों को नौकरियों में भेदभाव, विदेश नीति जिसने भारत को अलग-थलग कर दिया, बंगाल के हिन्दुओं की दुर्दशा।

महिलाओं को पैतृक सम्पत्ति में हिस्सा देने को लेकर भी मतभेद था। अम्बेडकर वास्तव में समान नागरिक संहिता के पक्षधर थे और कश्मीर के मामले में धारा 370 का विरोध करते थे। अम्बेडकर का भारत आधुनिक, वैज्ञानिक सोच और तर्कसंगत विचारों का देश होता, उसमें पर्सनल कानून की जगह नहीं होती।

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