सोशल मीडिया के सही इस्तेमाल से किसान बदल सकते हैं अपनी और देश की तस्वीर

सोशल मीडिया के सही इस्तेमाल से किसान बदल सकते हैं अपनी और देश की तस्वीरकिसानों को सोशल मीडिया में सक्रिय रहने और अपनी बात रखने की सलाह।

उस दिन सहारनपुर के एक किसान रामकुमार ने मुझे फ़ोन किया। वे वर्षों से मुझसे गाहे बगाहे बात करते रहते हैं। उस दिन वो बोले, 'मैंने आज आपका आर्टिकल पढ़ा । बहुत अच्छा लगा पर इसका फ़र्क तो कोई नहीं पड़ता। सरकार तो लगता है आपका आर्टिकल पढ़ती ही नहीं।'

बिना चिड़चिड़ाहट जताए मैंने कहा, 'मैंने तो अपना काम कर दिया पर रामकुमार आपने अपना काम नहीं किया इसलिए सरकार को कोई फ़र्क नही पड़ता।' मुझे लगा है वो थोड़ा हैरान हुए। जब मैंने उन्हें समझाया कि बतौर पाठक ये उनकी जिम्मेदारी थी कि वो आर्टिकल यानि लेखों को अपने साथी किसानों के साथ साझा करते तब जाकर जनमत बनता, वो तब भी कुछ सहमत नहीं हुए। मैंने उन्हें समझाया कि लोकतन्त्र में लोकमत बहुत महत्वपूर्ण है और क्योंकि अधिकांश लोग या तो चुप रहते हैं अथवा सार्वजनिक वादविवाद में भाग नहीं लेना चाहते, इसलिए अच्छे मुद्दे बहुधा हार जाते हैं।

हकीकत में प्रधानमंत्री एक कदम और आगे बढ़ चुके हैं। हाल में बीजेपी नेतृत्व को सम्बोधित करते हुए उन्होंने उनके सोशल मीडिया पर ज्यादा सक्रिय होने के लिए कहा, जिससे सरकारी कार्यक्रमों और योजनाओं की पड़ताल हो सके। पर दुःखद ये है कि जहां प्रधानमंत्री खुद ट्विटर, फ़ेसबुक ,इंस्टाग्राम वगैरह के माध्यम से लोगों तक पहुंचने के लिए सोशल मीडिया का महत्व समझते हैं, वहीं एक औसत व्यक्ति उसी तकनीक का इस्तेमाल करके अपनी बात को वहां तक नहीं पहुंचाता जहां उसे पहुंचना चाहिए।

'मैं क्या कर सकता हूं सर। काश मेरे पास एक अखबार होता तो मैं भी लिखता, काश मुझे टीवी बुलाता तो मैं भी जोरदार तरीके से अपनी बात रखता', वे बोले। मुझे उन्हें समझाना पड़ा कि भले ही मीडिया की मुख्यधारा उनके हाथों में नहीं पर इसका मतलब ये नहीं कि आपके द्वारा जरूरी मुद्दों के बारे में लोगों में जागरूकता न फैलाई जा सके। हमेशा मीडिया पर ही ये सब कहते हुए दोष नहीं मढ़ देना चाहिए कि ये तो बड़े कारोबारियों के खरीदे हुए हैं और इसीलिए ये खेती किसानी की खबरें क्यों छापेंगे। ज्यादातर लोग मीडिया पर दोष लगाकर अपनी नाकामियां छिपाने की कोशिश करते हैं। अपनी गलती न मानना और उसे किसी दूसरे की गलती बना देना ये जिम्मेदारी से बचने का सबसे आसान तरीका है।

खेती-किसानी, कृषि नीति और किसानों की समस्याओं पर आधारित देविंदर शर्मा के अऩ्य लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

वास्तव में गलती हमारी होती है। मैंने रामकुमार से पूछा, 'आपके पास स्मार्टफोन है?' उसका उत्तर सकारात्मक था। मैंने पूछा क्या उसमें व्हाट्सएप है ? और क्या उन्होंने कभी उसपर किसानों से सम्बंधित आर्टिकल या खेती को नुक्सान पहुंचाने वाले कारक आदि की शेयर किया है , तो वो बोले, 'हम तो साब फोटुएं ही भेजते हैं' तो मैंने कहा, 'बस यही तो समस्या है।'

मुझे उसे समझाना था कि भले ही मुख्य मीडिया उनके हाथों में न हो , पर तकनीकी ने सोशल मीडिया उनके हाथों में सौंप दिया था। सोशल मीडिया ज्यादा बड़ा और प्रभावशाली औजार हो सकता है पर ज्यादातर लोग पहुंच से दूर मुख्यधारा मीडिया को भला बुरा कहते रह जाते हैं बजाय अपने हाथों में मौजूद सोशल मीडिया के हथियार को इस्तेमाल करने के। जनसाधारण की आवाज़ क्यों नहीं सुनाई देती इसका कारण ये है कि आम आदमी या किसान सोशल मीडिया का सही इस्तेमाल नहीं जानता। और अगर जानता भी है तो इसे इस्तेमाल नहीं करता। दूसरों को गलत ठहराना बहुत आसान है और अपने अंदर झांककर खुद की गलती देख पाना बहुत मुश्किल।

त्रासदी ये है कि बदलते वक्त के साथ लोग इससे कदम मिलाकर नहीं चल पाए। समझाने के लिए मैंने राम कुमार को अपने प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी का उदाहरण दिया। वो भी सोशल मीडिया का महत्व और ताकत समझते हैं। यद्यपि सारा मीडिया और पूरा सरकारी तन्त्र हमेशा उनके हर निर्णय के बारे में बात करता है, प्रोमोट करता है, उनके हर कार्यकलाप पर पैनी नज़र रखता है। फिर भी मोदी सोशल मीडिया का प्रभावी इस्तेमाल बख़ूबी जानते हैं। शायद ही कोई दिन जाता हो जब तो 8-10 ट्वीट न करते हों , या लोगों तक पहुंचने के लिए कोई एप्लीकेशन इस्तेमाल न करते हों। मैंने रामकुमार से पूछा, 'अगर प्रधानमंत्री ऐसा कर सकते हैं, तो आपको सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर क्यों शर्म महसूस होती है?'

ये भी पढ़ें- भारत में अनाज के बंपर उत्पादन का मतलब है बंपर बर्बादी की तैयारी

हकीकत में प्रधानमंत्री एक कदम और आगे बढ़ चुके हैं। हाल में बीजेपी नेतृत्व को सम्बोधित करते हुए उन्होंने उनके सोशल मीडिया पर ज्यादा सक्रिय होने के लिए कहा, जिससे सरकारी कार्यक्रमों और योजनाओं की पड़ताल हो सके। पर दुःखद ये है कि जहां प्रधानमंत्री खुद ट्विटर, फ़ेसबुक ,इंस्टाग्राम वगैरह के माध्यम से लोगों तक पहुंचने के लिए सोशल मीडिया का महत्व समझते हैं, वहीं एक औसत व्यक्ति उसी तकनीक का इस्तेमाल करके अपनी बात को वहां तक नहीं पहुंचाता जहां उसे पहुंचना चाहिए। अगर आम आदमी सोशल मीडिया को सही तरह से इस्तेमाल करे तो शर्तिया तस्वीर बदलेगी।

जहां भी मैं जाता हूं यही सुनता हूं कि मीडिया किसानों की जरूरतों के प्रति उदासीन है। ज्यादातर लोग जिनसे मैं मिलता हूं, मीडिया पर यही आरोप लगा रहे होते हैं लेकिन जब मैं पलट के ये पूछता हूं कि आप खुद क्यों नहीं बन जाते मीडिया ? तो वहां सन्नाटा छा जाता है। क्यों सोशल मीडिया पर लोग अभद्र बातें , धमकियां वगैरह फैला पाते हैं, इसका कारण ये है कि ज्यादातर लोग खामोश रहते हैं। मैं इसे 'चुप्पी का षड्यंत्र' कहता हूं। सिर्फ इसलिए कि हम खामोश रहते हैं, आवाज़ उठाने से इनकार करते हैं, जो चिल्लाते हैं और दूसरों पर दबाव डालते हैं, उनकी आवाज़ सुनी जाती है। हालांकि उनकी संख्या कम है। फिर भी उनका शोर, उनकी गालियां उनकी धमकी इसलिए गूंजती है क्योंकि ज्यादातर लोग शांत रहते हैं।

हर बार जब मैं किसानों की आत्महत्या के बारे में ट्वीट करता हूं, 'ट्रोल' का सामना करता हूं। वो धमकी भरे सन्देश कहते हैं कि क्यों मैं किसानों की मौत के बारे में लिखता हूं, जिन किसानों को वैसे भी मरना ही है। वो तो समाज पर बोझ हैं। वे शराब पीते हैं, बच्चों की कमाई पर ऐश करते हैं और खुद काम नहीं करते। वो इसलिए मर रहे हैं क्योंकि वो आलसी हैं। ऐसा पक्षपाती नज़रिया इसलिए दिखाई पड़ता रहता है क्योंकि किसान खामोश रहते हैं, आवाज ऊंची नहीं करते, और ट्विटर फेसबुक वगैरह पर उनकी आवाज़ सुनाई नहीं देती क्योंकि किसानों को ये लगता है कि सोशल मीडिया उनका काम नहीं है, बदमाशों ने उनकी जगह पर कब्जा कर लिया है।

और भी बुरी बात ये है कि किसान नेता और उनसे सम्बंधित एनजीओ भी सोशल मीडिया से गुरेज़ करते हैं। इसी वजह से अच्छी और समझदार आवाजें गायब हो जाती हैं। इनकी अनुपस्थिति में किसानविरोधी आवाजों ने सोशल मीडिया पर कब्जा जमा लिया है। जो उनकी बुराई करने का एक भी मौका नहीं चूकते। नई दिल्ली में तमिलनाडु के किसानों के आंदोलन का मज़ाक उड़ाया जा रहा है सिर्फ इसलिए कि किसान खामोश हैं। अब ये मत कहियेगा 'हमें तो इंग्लिश में लिखना नहीं आता।' आप हिंदी, पंजाबी या अपनी किसी भी मातृभाषा में लिख सकते हैं लेकिन कृपया सोशल मीडिया पर जरूर आएं और अपनी आवाज़ उठाएं। चलिए, अपने परिवार के युवाओं से कहिये कि फेसबुक, ट्विटर का इस्तेमाल करें। उनसे कहिए कि ट्वीट करें, और हर दिन कम से कम आधा घंटा सोशल मीडिया पर क्या चल रहा है ये देखने में खर्च करें। और कुछ नहीं, तो कम से कम अपने प्रधानमंत्री से ही प्रेरणा लें। दिन की शुरुआत ट्वीट करने से करें और यकीन करें , सरकार आपकी बात जरूर सुनेगी।

(लेखक प्रख्यात खाद्य एवं निवेश नीति विश्लेषक हैं, ये उनके निजी विचार हैं।)

(मेरा ट्विटर हैंडल है @Devinder_Sharma

Share it
Top