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वित्त मंत्री से एक किसान की गुहार: हमें कुछ नहीं चाहिए बस हमारी फसलों का उचित दाम दे दो

गांव कनेक्शन ने आम बजट से ग्रामीण भारत की उम्मीदों को लेकर एक सीरीज शुरु की है, ये उसका पहला भाग है.. कोविड-19 महामारी, लॉकडाउन के चलते मंदी की चपेट में आई देश की अर्थव्यवस्था को कृषि ने सहारा दिया। अब आम बजट 2021-22 से देश के करोड़ों किसान उम्मीदें लगाए बैठे हैं...

वित्त मंत्री से एक किसान की गुहार:  हमें कुछ नहीं चाहिए बस हमारी फसलों का उचित दाम दे दो

सेवा में,

आदरणीय निर्मला सीतारमण जी, वित्त मंत्री, भारत सरकार

जैसा कि आप जानती हैं कि कोविड-19 महामारी ने देश के हर वर्ग को प्रभावित किया है, किसान भी इससे अछूते नहीं हैं। जैसा कि आप जानती हैं कि किसान पहले से ही दबाव में हैं। आपदा चाहे प्राकृतिक हो या ग़ैर प्राकृतिक उसकी मार किसान पर पड़ती ही है। आप वित्त वर्ष 2021-2022 का बजट पेश करने की तैयारी कर रही हैं, ऐसे में देश के बाकी वर्गों की तरह हमारी भी कुछ अपेक्षाएं आपसे और इस बजट से लगी हैं।

जैसा कि आप जानती ही हैं कि बाज़ार में किसान की फ़सल के उचित दाम नहीं मिलते। कईं बार तो लागत भी नहीं मिल पाती हैं। हमारे देश की खेती मौसम पर निर्भर है तो फ़सलों पर मौसम की मार भी पड़ती रहती है। हमारी अपेक्षा है कि आप किसानों की सभी फ़सलों की सरकारी ख़रीद बढाने के लिए फ़ूड सब्सिडी की राशि को बढ़ाएं ताकि किसानों को खुले बाज़ार का शिकार होने से बचाया जा सके। इसीलिए देश भर का किसान आजकल आंदोलन कर रहा है। अगर हमारी फसलों का उचित लाभकारी रेट मिल जाएगा तो बाकी किसान सब अपने दम पर कर लेगा।

सरकार खेती के नाम पर करोड़ों रुपए की सब्सिडी देती है। सरकार यूरिया कंपनी वालों को सब्सिडी देती है बावजूद इसके हम घंटों लाइन लगते हैं हर साल परेशान होते हैं, इसलिए हमारी गुज़ारिश है कि ये पैसा भी सीधे हमारे खातों में भेजा जाए। कृषि एवं लागत मूल्य आयोग (CACP) ने भी किसानों के खातों में उर्वरक सब्सिडी के नाम पर 5,000 रुपए सालाना भेजने की सिफारिश की थी।

महोदया, किसान एक बीज से 100 दाने पैदा करते हैं, अगर सरकार हमारी मदद को आगे आती हैं तो हम भरोसा दिलाते हैं जो पैसा हमें मिलेगा हम अपने खून पसीने से उसे खेती में लगाकार वापस आपको ही भेजेंगे, ज्यादा पैसा होगा तो ज्यादा सामान खरीदेंगे, अपना कर्ज़ उतारेंगे, बच्चों को पढ़ाएंगे, खेती में नए प्रयोग कर पाएंगे।

हमने कोरोना वायरस के दौरान भी मेहनत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इसीलिए आप जानती हैं कि जब लॉकडाउन के चलते देश की अर्थव्यवस्था की विकास दर शून्य से नीचे चली गई थी, लेकिन लेकिन कृषि विकास दर 3 से 4 फीसदी बनी रही थी


महोदया, एक और बात ग़ौर करना ज़रुरी है,

हम जितनी सब्जियां फल खेतों में उगाते हैं उनमें बड़ी मात्रा में हर साल बर्बाद हो जाती हैं। अभी पिछले साल प्याज 200 रुपए किलो बिक गया। शहर के लोगों को लगता है कि किसान मालामाल हो गए होंगे, सारा पैसा उनकी जेब में गया होगा। लेकिन महोदय, हमारा आधा प्याज बरसात के चलते खेत में खराब हो गया, जो निकला वो उनसे से आधा रखे-रखे खराब हो गया, फिर हमने तो ज्यादातर प्याज 5 से 20 रुपए ही बेच दिया था, जिनके पास रखने का साधन था उन्होंने पैसे कमाए। यही हाल दूसरी सब्जियों और फलों का होता है।

अगर ग्रामीण इलाकों में कोल्ड स्टोरेज, कोल्ड चेन और भंडारण की ठीक व्यवस्था हो जाए तो न सिर्फ हम किसानों का मुनाफ़ा कई गुना बढ़ जाएगा बल्कि आम आदमी को भी साल भर सही कीमत पर फल-सब्जियां मिलेंगी।

किसानों की आमदनी दोगुनी करने के लिए सरकार की ही बनाई अशोक दलवाई कमेटी ने 2017 में ही बता दिया था कि किसानों को हर साल 63 हजार करोड़ रुपए का नुकसान होता है । सोचिए ये पैसा अगर किसानों को मिल जाए, इसका नुकसान न हो तो खेती और देश के किसानों की समस्याएं हल हो जाएंगी।


कोल्ड चेन के अभाव में हर साल बर्बाद हो जाते हैं करोडो़ं रुपए के फल और सब्जियां। फोटो- अरविंद शुक्ला

तीसरी और अहम बात छुट्टा पशु हैं...

महोदया, ये वो समस्या है- जिसने न सिर्फ हम किसानों की नींद उड़ा रखी है बल्कि हर साल हर किसानों का भारी नुकसान हो रहा है।

यूपी, मध्य प्रदेश, पंजाब, हरियाणा समेत देश के कई राज्य छुट्टा पशुओं के चलते काफी परेशान हैं। किसानों के दिन रात खेतों में बीत रहे हैं। कई किसानों ने इनके डर से खेती तक छोड़ दी है। गोवंश (गाय-बछड़े, सांड) की समस्या इसलिए बढ़ गई है क्योंकि इनका हम बदली परिस्थितियों में इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं लेकिन अगर इऩके गोबर पर आधारित योजनाओं को बढ़ावा दिया जाए तो बड़ी समस्या सुलझ सकती है। हमारी मांग है कि आप देश में गौशालाओं के निर्माण के लिए राशि आवंटित करें ताकि इन पशुओं को वहां रखा जा सके।

पिछले कई वर्षों से देश में जैविक और प्राकृतिक खेती की बात हो रही है। ये अच्छा है कि लोग बिना उर्वरक और कीटनाशकों वाली खेती की तरफ बढे हैं लेकिन सरकार को चाहिए कि जैसे रासायनिक खेती करने वालों को कंपनियों के माध्यम से ही सब्सिडी दी जाती है वैसी ही जैविक खेती करने वालों को भी मिले।

महोदया, एक और समस्या की तरफ आप ध्यान दिलाना चाहते हैं।

प्रधानमंत्री जी के आत्मनिर्भर भारत अभियान, लोकल ऑफ वोकल, स्टार्टअप आदि योजनाओं से प्रेरित होकर किसानों के कई पढ़े लिखे बच्चों ने खेती से संबंधित रोज़गार शुरु किए, या करना चाहते हैं लेकिन बैंक से लेकर तहसील तक इतनी दौड़भाग, कागज़ी कार्रवाई और कानूनी औपचारिकताएं हैं कि वो हिम्मत हारने लगते हैं।

लॉकडाउन में शहरों से लौटे हमारे घरों के कई युवाओं ने बताया कि खेती से जुड़े कई स्टार्टअप अच्छा काम कर रहे, नई तकनीकी किसानों तक पहुंचा रहे हैं, बाजार से जोड़ रहे हैं, ऐसे स्टार्टअप को बढ़ाए जाने की ज़रुरत है। लेकिन ये जो तकनीकी और मशीनें हैं हम लोगों के पास एक साथ इन्हें खरीदने के पैसे नहीं होते इसलिए इन्हें भी सरकारी मदद के जरिए हम लोगों तक पहुंचाया जाए।

भवदीय

भारत देश का एक किसान

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